नज़रिया
नज़रिया अर्थात हमारा दृष्टिकोण इसे हम अपने जीवन का अहम सरोकार कहें तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।ये हमें अपने घर ,परिवार और समाज से ही मिलती है जिनके जरिये ही हमारे व्यक्तिव का निर्माण होता है । किसी भी सभ्य समाज के निर्माण में हमारे व्यक्तित्व का परिष्कृत होना अपरिहार्य है। इसमें कोई दो राय नहीं की हमारे देखने के नज़रिये पर ही हमारी नियति भी निर्धारित होती है ।इसको अभिव्यक्त करने वाली एक लघु- कथा कुछ इस प्रकार है -- एक बार की बात है एक माँ अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने बस स्टाॅप ला रही होती है तभी रास्ते में बच्चे को कचरा ( प्लास्टिक की बोतलें , कबाड़ी का समान )बिनने वाला फटे- पुराने कपड़ों में पसीने से लथपथ एक युवक दिखता है ।बालक जिज्ञासावश माँ से पूछ बैठता है ,माँ ! ये कचरा क्यों उठा रहा है ? माँ इसपर बच्चे से कहती है , इसीलिए तुझसे कहती हूँ कि पढ़ाई कर लिया करो ।देखो अगर तुम ढंग से पढ़ाई नहीं करोगे तो कल इसके जगह तुम भी हो सकते हो ! वहीं ...