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Showing posts from October, 2024

इलेक्ट्रिक लाइटों के चका- चौंध में मिट्टी के दीये का वजूद

ठहरिए ठहरिए, मैं यहां ऑनलाइन माध्यम से मिट्टी के दीये बनाने वाले किसी ब्रांड का प्रचार- प्रसार या आसान भाषा में कहें तो प्रमोशन नहीं कर रहा हूं! अपितु समाज की कड़वी सच्चाई लेकर प्रस्तुत हो रहा हूं जैसा की पोस्ट के माध्यम से आप देख रहे होंगे कि विदेशी कंपनियों के द्वारा ऑनलाइन माध्यम से हमारे गांव घर में बनने वाले मिट्टी के दीये की कीमत को ! किस प्रकार से मनमाफ़िक मुनाफा पर विदेशी कंपनियां हमारे ही कुम्हार भाइयों के द्वारा बनाए गए मिट्टी के दीयों को औने-पौने दामों में खरीदकर बेच रहे हैं । और हम भी कितने गर्व से ब्रांडेड दीये खरीद रहे हैं ! तथाकथित शहरी एवं सभ्य सोच रखने वाले रईसगण भी शहर के किसी कोने पर ठेले पर लगाए हुए वाले हमारे गांव घर के कुम्हार भाई के दीये की कीमत को मोल- भाव करने में हर बेशर्मी की हदें पार कर देंगे मगर वही दिए ऑनलाइन माध्यम से बेतहाशा कीमत पर भी बड़े गर्व से खरीदेंगे और खुद को प्रकृति के संरक्षक और स्वदेशी प्रकृति का व्यक्तित्व बनाने में जरा भी पीछे नहीं हटेंगे ।। सारी बातों का सार यह है स्वदेशी एवं स्थानीय कलाकारों का समर्थन जमीनी स्तर पर भी होना जरूरी है लिए...

नवरात्र में कन्या पूजन के मायने

 नवरात्र में कन्या - देवी पूजन के विधान पर अपनी बात रखना चाहूंगा, जिस प्रकार से नवरात्र के अवसर पर कन्या पूजन का विधान है! क्या हम अपने दैनिक जीवनचर्या में इस तरीके से उनका आदर कर पाते हैं इसका उत्तर बिल्कुल नहीं में है! नकारात्मक है!  आज महिलाओं के प्रति बढ़ रही हिंसक प्रवृत्ति इस और इशारा करती है कि हमें उन्हें पूजने की आवश्यकता नहीं है हमें उन्हें समाज में प्रेमपूर्वक उनके अधिकार, उनके कर्तव्य के प्रति जागरूक करने की है, उन्हें सशक्त करने की है । क्योंकि बेटियां समाज रूपी गाड़ी के एक पहिए के समान है, वह न सिर्फ लक्ष्मी की अपितु शक्ति की भी प्रतीक है।🌻🙏

विजयादशमी एवं रावण वध के मायने

आज फिर हम हर वर्ष की भांति जब हम विजयादशमी के शुभ अवसर पर रावण के पुतले का दहन करेंगे, तब मेरे मन में कई सवाल उत्पन्न होते हैं  1.पहला सवाल व्यक्तिगत स्तर पर क्या हम हर वर्ष अपने अंदर के रावणत्व का थोड़ा बहुत भी दहन कर पाते हैं, हमारे अंदर लोभ, ईर्ष्या, घृणा, नफरत प्रतिशोध, किसी के प्रति मनसा -वाचा- कर्मणा हिंसक प्रवृत्ति को क्या हम दहन कर पाते हैं? 2. दूसरा सवाल सामाजिक स्तर की है आज भी हमारे समाज में असमानता किसी ने किसी रूप में धर्म ,भाषा, क्षेत्र, भाषा, लिंग आदि आदि के आधार पर विद्वेष एवं भेदभाव बरकरार है ! इसीके साथ-साथ चाहे वह अमीर गरीब के बीच की खाई हो या दलित और सवर्ण के बीच की ऐतिहासिक गहराई क्या हम उसको पाटने में अपना कुछ योगदान दे पाए हैं, ऐसी भेदभावपूर्ण एवं नकारात्मक प्रवृत्ति का दहन कर पाए हैं? 3. और तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण बात राष्ट्र के स्तर पर बेरोजगारी ,अशिक्षा, महंगाई, भ्रष्टाचार, चाटुकारितारूपी रावण हर शैक्षणिक संस्थान से लेकर सरकारी कार्यालय तक अपना आतंक फैलाए हुए है! क्या हम इस रावण को दहन कर पाए हैं ? क्या इसके लिए सकारात्मक प्रयास कर पा रहे हैं जिससे सभी को...