छठ महापर्व : विधि से विधान तक, आस्था से अनुष्ठान तक
"कांच ही बांस के बहंगिया,बहंगी लचकत जाय ... पेन्हीं न बलम जी पियरिया दउरा घाटे पहुंचाये" कार्तिक मास,शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि ; नहाय - खाय के साथ चार दिनों तक चलने वाला महान छठ पर्व आस्था इमोशन और विज्ञान का अद्भुत संगम है। दुर्गा पूजा के बाद से ही दीपावली के आगमन एवं शारदा सिन्हा के सुमधुर गीतों से मन अपने गांव, अपने घर ,अपनी माटी की याद में भावुक हो जाता है पल भर में वह सारी स्मृतियां आंखों के सामने चलचित्र की भांति चलने लगती है ,कैसे छठ घाटों की साफ सफाई के साथ-साथ अपने गांव, घर ,मोहल्ले में साफ-सफाई करना , कुदाल से घास पतवार छीलकर पानी छींटकर कूड़ा करकट साफ करके झाड़ू लगाना साफ सफाई करना,ताकि छठ व्रतियों को कोई असुविधा न हो, उनका आशीर्वाद स्वरुप प्रेम हमें मिले। हर परदेसी का मन अपने गांव घर शहर की ओर खिंचा चला आता है अपनी जड़ों से दूर रहने का सारा दुख सारी कसक इसी महापर्व के द्वारा मिट्टी है यह एक बहाना होता है जिसमें हम घर जाते हैं और घर से घर नहीं होता हमारे घर के कितने कोने हमारी संवेदनाओं से जुड़ते हैं। मन पल भर को ठहर-सा जाता है, चले जाना चाह...