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Showing posts from October, 2025

छठ महापर्व : विधि से विधान तक, आस्था से अनुष्ठान तक

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"कांच ही बांस के बहंगिया,बहंगी लचकत जाय ...  पेन्हीं न बलम जी पियरिया दउरा घाटे पहुंचाये"  कार्तिक मास,शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि ;  नहाय - खाय के साथ चार दिनों तक चलने वाला महान छठ पर्व आस्था इमोशन और विज्ञान का अद्भुत संगम है। दुर्गा पूजा के बाद से ही दीपावली के आगमन एवं शारदा सिन्हा के सुमधुर गीतों से मन अपने गांव, अपने घर ,अपनी माटी की याद में भावुक हो जाता है पल भर में वह सारी स्मृतियां आंखों के सामने चलचित्र की भांति चलने लगती है ,कैसे छठ घाटों की साफ सफाई के साथ-साथ अपने गांव, घर ,मोहल्ले में साफ-सफाई करना , कुदाल से घास पतवार छीलकर पानी छींटकर कूड़ा करकट साफ करके झाड़ू लगाना साफ सफाई करना,ताकि छठ व्रतियों को कोई असुविधा न हो, उनका आशीर्वाद स्वरुप प्रेम हमें मिले। हर परदेसी का मन अपने गांव घर शहर की ओर खिंचा चला आता है अपनी जड़ों से दूर रहने का सारा दुख सारी कसक इसी महापर्व के द्वारा मिट्टी है यह एक बहाना होता है जिसमें हम घर जाते हैं और घर से घर नहीं होता हमारे घर के कितने कोने हमारी संवेदनाओं से जुड़ते हैं।  मन पल भर को ठहर-सा जाता है, चले जाना चाह...

तालिबानी प्रमुख का रेड कार्पेट पर स्वागत,महिला पत्रकारों पर बैन: भारत सरकार आखिर क्या संदेश देना चाहती है?

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अफगानिस्तान के तालिबानी सरकार के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी भारत के दौरे पर हैं । जिसकी चर्चा भारत-पाकिस्तान सहित पूरे विश्व की मीडिया में है। ऐसे समय में जब पाकिस्तान अफगानिस्तान के रिश्तों में अफगानिस्तानी शरणार्थियों एवं अन्य समस्याओं के कारण खटास है उस परिस्थिति में तालिबानी सरकार के प्रमुख शख्स का भारत दौरा कूटनीतिक रूप से एक संदेश भी है।  इस दौरे की खासियत यह रही कि भारत सरकार ने तत्कालीन वैश्विक हलचलों को देखते हुए कूटनीतिक स्तर पर तालिबान सरकार के लिए औपचारिक मान्यता भले ही न दी हो लेकिन रिश्ते धीरे-धीरे बहाल किए हैं।  तालिबान के सत्ता में आने के बाद भारत-अफगानिस्तान संबंधों में बदलाव आया। 2021 में तालिबान के अफगानिस्तान पर नियंत्रण के बाद भारत की परियोजनाओं को सुरक्षा चिंताओं के कारण अवरुद्ध किया गया। लेकिन 2025 में विक्रम मिस्री ने दुबई में तालिबान के विदेश मंत्री मौलवी आमिर खान मुत्तकी से मुलाकात की। इसमें भारत ने अफगानिस्तान में 20 रुकी परियोजनाओं को फिर से शुरू करने की प्रतिबद्धता जताई। सलमा डेम, काबुल संसद भवन, ज़रनज-डेलरम हाइवे, पावर ट्रांसमिशन ...

गांधी भारतीय राजनीति में तो कब के अप्रासंगिक हो चुके हैं,पर वे आज भी पॉलिटिक्स के पावर हाउस हैं

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आज 2 अक्टूबर है, मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म दिवस!आज न तो मैं गांधी की प्रासंगिकता पर बात करूंगा और नहीं गांधी के मूल्यों पर क्योंकि गांधी की प्रासंगिकता उसी दिन खत्म हो गई थी जिस दिन देश का विभाजन हुआ या यूं कहें की भारत छोड़ो आंदोलन के बाद क्रिप्स मिशन, कैबिनेट मिशन के आगमन, सांप्रदायिक तत्वों का मुखरता से उभार और बंटवारे की सुगबुगाहट जैसे-जैसे बढ़ने लगी धीरे-धीरे उनकी प्रासंगिकता समाप्त होने लगी और एक सिरफिरे के नृशंसता ने उस जर्जर देह को भी समाप्त कर दिया! बाद में जो शेष बच गईं वह उनकी वैचारिकी है जिसे उनके अनुयायियों ने 'गांधीवादी मूल्य' का नाम दिया! भोजपुरी का एक मशहूर डायलॉग है "पावर ऐहिजे से शुरू होला,ऐहीजे से खतम होई, पावर दोसर केहू कहां से ले ली" महात्मा गांधी के बारे में आधुनिक भारतीय राजनीति में यह बिल्कुल सटीक बैठता है। 'गांधी' आधुनिक भारतीय राजनीति के 'पावर हाउस' हैं, इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। कितनेे लोग आएंगे, कितनेे लोग जाएंगे वे गांंधी थोड़े ही बन जाएंगे। संपूर्ण भारत से लेकर पूरे विश्व भर में विभिन्न भाषाओं में जि...