छठ महापर्व : विधि से विधान तक, आस्था से अनुष्ठान तक
"कांच ही बांस के बहंगिया,बहंगी लचकत जाय ...
पेन्हीं न बलम जी पियरिया दउरा घाटे पहुंचाये"
कार्तिक मास,शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि ;
नहाय - खाय के साथ चार दिनों तक चलने वाला महान छठ पर्व आस्था इमोशन और विज्ञान का अद्भुत संगम है। दुर्गा पूजा के बाद से ही दीपावली के आगमन एवं शारदा सिन्हा के सुमधुर गीतों से मन अपने गांव, अपने घर ,अपनी माटी की याद में भावुक हो जाता है पल भर में वह सारी स्मृतियां आंखों के सामने चलचित्र की भांति चलने लगती है ,कैसे छठ घाटों की साफ सफाई के साथ-साथ अपने गांव, घर ,मोहल्ले में साफ-सफाई करना , कुदाल से घास पतवार छीलकर पानी छींटकर कूड़ा करकट साफ करके झाड़ू लगाना साफ सफाई करना,ताकि छठ व्रतियों को कोई असुविधा न हो, उनका आशीर्वाद स्वरुप प्रेम हमें मिले। हर परदेसी का मन अपने गांव घर शहर की ओर खिंचा चला आता है अपनी जड़ों से दूर रहने का सारा दुख सारी कसक इसी महापर्व के द्वारा मिट्टी है यह एक बहाना होता है जिसमें हम घर जाते हैं और घर से घर नहीं होता हमारे घर के कितने कोने हमारी संवेदनाओं से जुड़ते हैं।
मन पल भर को ठहर-सा जाता है, चले जाना चाहता है वहीं जहां हमें इस वक्त होना चाहिए था। अगर हम बिहारियों से कोई पूछे की छठ पर्व तुम्हारे लिए क्या है ? हमारा उत्तर होगा~ इमोशन
पूर्वांचल सहित अखिल भारतीय स्तर के साथ विश्व के कोने-कोने में चाहे वह मॉरीशस, त्रिनिदाद, फिजी, पेरिस ,लंदन, अमेरिका,सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया आदि आदि देशों में बिहारी अस्मिता की पहचान छठ महापर्व हर वर्ष हमें देखने को मिलती है।
छठ महापर्व वैज्ञानिकता समावेशिता का प्रतीक~
इस महापर्व का न सिर्फ सामाजिक,सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं पारंपरिक महत्व है अपितु यह वैज्ञानिकता के साथ प्रकृति से जुड़ाव को समेटे हुए हमें एक- दूसरे के परस्पर सहयोग पर आधारित सर्व -समावेशी समाज बनाने का भी संदेश देता है। यह इस पर्व की खासियत भी है इस महापर्व में जाति ,धर्म ,पंथ ,संप्रदाय से इतर सभी लोग सहभाग कर छठी माई एवं भगवान भास्कर की आराधना व्रत को संपन्न करते हैं। इसमें डोम भाई कलसूप, दौरा ,बनाते हैं तो बनिया भाई पियरी धोती, साड़ी बेचते हैं। कुम्हार भाई दीया- ढकना बनाते हैं, तो हमारे पासी भाई ताड़ पेड़ के पत्तों से बनी चटाई , झाड़ू बनाते हैं। छठी माई के प्रसाद के लिए दूध एवं अन्न यादव(अहीर) भाई के यहां से आता है, तो पूजा के अन्य समान फल- फूल मुसलमान भाई लाकर बेचते हैं, यह हमारे गांव- शहर - क़स्बे की खासियत है,छठ महाव्रत की समावेशिता की कहानी है। गांव घर में यदि किसी के घर में छठ में प्रयुक्त होने वाले कोई नया फल या किसी के यहां अन्न-दूध हो तो एक दूसरे को आदान- प्रदान करते हैं।
छठ महापर्व का विधि- विधान, चार दिवसीय अनुष्ठान
चार दिनों तक चलने वाला यह महापर्व विश्व का सबसे पवित्रतम एवं साधना से युक्त कठिनतम त्यौहार है जिसमें 36 घंटे निर्जला उपवास की महत्ता है। छठ महापर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है पहला चैत्र षष्ठी तिथि को और दूसरा कार्तिक षष्ठी तिथि को, हालांकि प्रधानता शारदीय कार्तिक मास में मनाए जाने वाले छठ महापर्व की अधिक है। यह दोनों महापर्व ऋतु परिवर्तन अर्थात ऋतु बदलने के संक्रमण काल में मनाए जाते हैं जिसमें पहले ग्रीष्म से शरद ऋतु के संक्रमण काल में तो दूसरा वर्षा से शरद के संक्रमण काल में मनाया जाता है और संक्रमण काल में शरीर में अनेक प्रकार की व्याधियां उत्पन्न होती हैं और इन व्याधियों से मुक्ति हेतु विज्ञान में भी उपवास की महत्ता को बताया गया है । नहाए खाए से शुरू होने वाला यह व्रत चार दिनों तक चलता है । पहला दिन नहाए कैसे प्रारंभ होता है , इस दिन व्रती गण शौच- स्नान से निवृत होकर भगवान भास्कर एवं छठी माई को पवित्र मन से नमन करते हुए खेतों में पककर धान से तैयार चावल एवं सेंधा नमक युक्त लौकी की सब्जी एवं दाल ग्रहण करते हैं। तत्पश्चात घर के अन्य सभी सदस्यों को भी प्रसाद के रूप में परोसा जाता है।दूसरा दिन, कार्तिक मास शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि।
छठ महापर्व के दूसरे दिन को *'खरना'* के रूप में जानते हैं ; इस दिन व्रतिगण पूरे दिन उपवास करके संध्या पहर से आम के दतवन से दातुन कर तत्पश्चात स्नान के बाद मिट्टी के चूल्हे पर गन्ने से गुड़ बनाने में प्रयुक्त ईख के बचे हुए अवशेष जिसे स्थानीय भाषा में 'चेपुआ' भी कहते हैं, एवं आम की लकड़ी का जलावन के रूप में उपयोग कर पीतल की हांडी में नये अन्न, अर्थात खेतों से पककर तैयार धान से चावल, गाय के दूध एवं गुड़ का पवित्र प्रसाद *'खीर'* बनता है । छठ व्रतिगण पूरे सात्विकता से भगवान भास्कर एवं छठ माई को स्मरण करते हुए अचवन देकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। तत्पश्चात परिवार के अन्य सदस्य सहित आसपास के लोगों मे प्रसाद वितरित किया जाता है। इस दिन सुबह से ही गांव में जिनके यहां छठ महाव्रत हो रहा होता है घूम घूम कर दूध इकठ्ठा करते हैं, गांव में जिनके जिनके यहां भी दुधारु गाय होती है वह इस दिन दूध ग्रहण नहीं करते हैं। ग्वाले दूध दुहकर वह उन छठ व्रत धारियों के यहां प्रसाद हेतु श्रद्धा भाव से वितरित कर देते हैं।
तीसरे दिन, दिन भर निर्जला उपवास कर व्रतीगण संध्याकाल में डूबते हुए सूर्य का नए फल-सब्जी एवं सिंदूर से तिलकित कलसुप लेकर जल स्रोत नदी तालाब पोखर इत्यादि में अर्घ्य देते हैं । तत्पश्चात प्रात उषा का ल में प्रतिज्ञा पुनः उसी घाट पर आकर उगते हुए सूर्य का अर्घ्य देकर इस महान व्रत को संपन्न करते हैं।
उपसंहार एवं महत्व
छठ महापर्व का न सिर्फ प्राकृतिक संस्कृत वैज्ञानिक महत्व है अपितु यह लैंगिक दृष्टिकोण से भी समावेशी समाज के निर्माण को आगे बढ़ता है इस महापर्व से संतान की उत्पत्ति हेतु छठी माई एवं भगवान भास्कर से प्रार्थना की जाती है, जिसमें बेटी की कामना भी की जाती है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार
छठ महापर्व का आरंभ रामायण और महाभारत दोनों कालों से जुड़ा हुआ है। जब भगवान राम 14 वर्ष का वनवास काटकर अयोध्या लौटे, तो उनके राज्याभिषेक के बाद माता सीता ने सूर्यदेव की पूजा करते हुए छठ व्रत रखा। उन्होंने संतान, परिवार और राज्य की सुख-शांति के लिए षष्ठी तिथि को सूर्य को अर्घ्य दिया। यही परंपरा आगे चलकर पर्व बन गई।
महाभारत में कर्ण, जो सूर्यदेव का पुत्र था, प्रतिदिन उगते सूर्य को अर्घ्य देता था। उसने जीवन भर सूर्य की उपासना की। कहा जाता है कि उसने भी षष्ठी तिथि पर विशेष व्रत किया। उसकी यह परंपरा बाद में आम लोगों ने अपनाई।
इस महापर्व की खासियत यह भी है कि इसमें किसी भी प्रकार के पंडित-पुरोहित या बिचौलिए शामिल नहीं होते हैं यह भगवान का सीधे भक्त से या यूं कहें कि मनुष्य का प्रकृति से संवाद और सह संबंधों पर आधारित महापर्व है।
परस्पर एक -दूसरे के सहयोग से ही इस महापर्व को संपन्न किया जाता है, यही इसकी प्रमुख विशेषताओं में से एक है। आज मनुष्य लोभ -लिप्सा एवं अंध- उपभोक्तावादी रवैया के कारण दिन प्रतिदिन संकीर्ण होते जा रहा है ऐसे में छठ महापर्व हमें परस्पर सहयोग पर आधारित सद्भावनापूर्ण सर्व- समावेशी समाज बनाने की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है।
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