यूजीसी के प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट का रोक: क्या है आगे की राह ( सांस्थानिक हत्या से समता तक)

तमाम विरोध-प्रदर्शन, हंगामे के बाद अंततः सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए प्रावधानों पर रोक लगा दी है। कथित रूप से अब अगली सुनवाई में इस पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। लेकिन इस प्रावधान के गजट नोटिफिकेशन आने के बाद ही जिस तरह से सवर्ण तबको में विरोध देखा गया, अनपढ़ से लेकर पढ़े लिखे लोगों तक ने इसका एकजुट होकर विरोध किया। और विडंबना देखिए कि जिस एससी एसटी ओबीसी समाज के लिए यह प्रावधान लाया गया था उसके अधिकांश तबके इस कानून के बारीकियों को तो छोड़िए उसके मूल प्रावधानों को भी शायद ही समझते हैं! इसके विरोध में जैसे जैसे कुतर्क गढ़े गए सोचकर हंसी और आंसू दोनों आते हैं। मूल रूप से जातिगत भेदभाव को मिटाने के लिए लाए गये  इस प्रावधान में कथित रूप से सवर्णों के के द्वारा यह कहा गया है कि यह सवर्ण को घोषित अपराधी बनता है जबकि तथ्य और सच्चाई यह है जिस पिछड़े और दलित समाज को कोटा वाला कहकर, तरह-तरह के गालियां और नारे संबोधित करके अपमानित और उत्पीड़न किया जाता है  तो क्या इस प्रावधान में उत्पीड़क समाज को ही शामिल किया जाएगा? दूसरा तर्क यह है कि इसमें सवर्ण को अपनी बात रखने और कमेटी में शामिल होने का हक नहीं दिया गया है जबकि सच्चाई यह है कि इसमें सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को भी शामिल किया गया है जिसमें 10% सवर्ण ही पिछले दरवाजे से आते हैं।
अब जातिगत भेदभाव की परिभाषा में स्पष्ट रूप से कहा गया है-
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी नई विनियमावली के अनुसार, जाति-आधारित भेदभाव का आशय उन सभी अनुचित, असमान या पक्षपातपूर्ण व्यवहारों से है, जो केवल किसी व्यक्ति की जाति या जनजाति के आधार पर अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) अथवा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से संबंधित छात्रों, शिक्षकों या कर्मचारियों के साथ किए जाते हैं। इन प्रावधानों में स्पष्ट किया गया है कि यदि किसी उच्च शिक्षण संस्थान में किसी SC, ST या OBC व्यक्ति को उसकी जातिगत पहचान के कारण प्रवेश, मूल्यांकन, पदोन्नति, शोध अवसर, प्रशासनिक निर्णय या सामाजिक व्यवहार में नुकसान पहुँचाया जाता है, तो उसे जाति-आधारित भेदभाव माना जाएगा। 
इंडिया टीवी की रिपोर्ट की मानें तो राज्यसभा सांसद प्रोफेसर मनोज झा के सवालों के क्रम में सरकार ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के आंकड़ों के हवाले से जानकारी दी है। इसके मुताबिक इस साल 30 जून 2025 तक देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर के 2537 पद स्वीकृत थे. इनमें सामान्य वर्ग के 1538 पद थे. वहीं एससी के लिए 308, एसटी के लिए 144 और ओबीसी के लिए 423 पद आरक्षित थे. इनमें से 1157 पदों पर ही नियुक्तियां हुई थीं. इनमें सामान्य वर्ग के 935, एससी के 111, एसटी के 24 और ओबीसी के 84 प्रोफेसर नियुक्त किए गए. मतलब केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के आधे से अधिक पद खाली पड़े हुए हैं. इस आंकड़ों में चौकाने वाला आंकड़ा यह है कि आरक्षित वर्गों में हुई नियुक्तियां सबसे कम हैं. उदाहरण के लिए प्रोफेसर पद पर करीब 20 फीसदी ही नियुक्तियां हो पाई हैं और करीब 80 फीसदी पद अभी भी खाली हैं. यह हाल एससी और एसटी वर्ग के लिए आरक्षित पदों का है‌।
 और यूजीसी के नए दिशा निर्देश में जिस समता समिति की बात की गई है उसका पदेन अध्यक्ष संस्थान का प्रमुख होगा तो अब बताइए क्या सवर्ण बहुल संस्थाओं के प्रमुख दलित पिछड़ों और ओबीसी के हक में फैसला दे पाएंगे ?
 एक कुतर्क यह भी गढ़ा गया कि मान लीजिए एससी एसटी और ओबीसी का लड़का अगर किसी सवर्ण लड़की को प्रपोज करता है तो यदि वह रिजेक्ट करती है तो वह उसे झूठे मामले में फंसा कर जातिगत भेदभाव का आरोप लगा देगा जबकि तथ्य एवं सच्चाई यह है कि तमाम विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय में  महिलाओं के लिए वुमन डेवलपमेंट सेल ( WDC) में महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान किया गया है,जिसमें हर वर्ग की महिला को शामिल किया गया है। 
और सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही कार्यस्थल पर महिलाओं के विरुद्ध दुर्व्यवहार के विशाखा गाइडलाइन ( 1997-98) यहां भी लागू होते हैं। और इसके अलावा कानूनी प्रावधानों को छोड़ भी दें तो अभी शायद ही किसी विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय में दलित एससी एसटी , एवं अति पिछड़ा वर्ग की इतनी हैसियत है कि वह इस तरह के दुर्व्यवहार को अंजाम दे? एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के छात्र होने के नाते मुझे इसका अनुभव है।
  दिल्ली विश्वविद्यालय से निष्कासित प्रोफेसर लक्ष्मण यादव (DrLaxman Yadav) भी अपने यूट्यूब चैनल एवं अपनी पुस्तक 'प्रोफेसर की डायरी' एवं 'जातिगत जनगणना' में इसका विस्तार से उल्लेख करते हैं। रही बात कानून के दुरुपयोग की तो देश में हर वह कानून दुरुपयोग करने वाले दुरुपयोग तो कर रहे हैं लेकिन क्या उसे देखकर पूरे कानून को ही समाप्त किया जाए या उन दुरुपयोग करने वालों की पहचान कर उन्हें निस्तारित किया जाए।
पत्रकार नवल किशोर अपने लेख में लिखते हैं कि
दरअसल, ऊंची जातियों के लोगों को ऐतराज इस बात से है कि भेदभाव की परिभाषा में ओबीसी को शामिल क्यों किया गया। उन्हें ऐसा लगता है कि ऐसा किए जाने से यह स्थापित हो गया है कि भेदभाव करने वालों में केवल ऊंची जातियाें के लोग हैं और इस विनियम से यह बात अब सांस्थानिक रूप से स्थापित कर दी गई है।
जबकि उन्हें यह बात समझ में आनी चाहिए कि यदि एससी और एसटी के खिलाफ भेदभाव करने वाले ओबीसी भी होंगे तो उनके ऊपर भी यह रेगुलेशन प्रभावी होगा।

एक आवाज यह भी उठती है कि पहले प्रावधान में शिकायत करने वालों में झूठी शिकायत करने वालों को भी सजा की प्रावधान थी जबकि हकीकत और सच्चा यह है कि इस तरह के प्रावधान होने से अधिकांश शोषित समाज इसको साबित ही नहीं कर पाता था और झूठी शिकायत एवं दुर्भावना के आधार पर इसे अस्वीकार कर दिया जाता था या उसके विरुद्ध सजा भी दे दिया जाते थे।क्योंकि कोई भी अगर सवर्ण समाज का लड़का सवर्ण प्रोफेसर के सामने अगर उसी की शिकायत करेगा तो क्या उसका फैसला निष्पक्ष रूप से न्योयोजित ढंग से होकर देगा आप स्वयं इसकी कल्पना कर सकते हैं! विश्वविद्यालय में जातिगत भेदभाव के मामले को इस रूप में भी समझा जा सकता है की रोहित वेमुला सांस्थानिक हत्या, पायल तडवी सांस्थानिक हत्या इस तरह से न जाने कितने संस्थानिक हत्या के बाद समता हेतु यह प्रावधान आया था उसमें अगर कानून को ही कमजोर कर दिया जाए तो क्या यह अपने उद्देश्यों को पूरा करपाएगा ?
अभी हाल ही फिलहाल में यूजीसी द्वारा संसदीय समिति और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों से पता चला है कि देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों में पिछले पांच वर्षों में 118.4% की वृद्धि हुई है। इस संबंध में दर्ज की गई घटनाओं की संख्या 2019-20 में 173 से बढ़कर 2023-24 में 378 हो गई। यह तो वह मामले हैं जिनके शिकायत दर्ज हुए ऐसे कितने शिकायत दर्ज नहीं हुए हैं जो हंसी ठिठोली में ही जाति सूचक शब्दों से सुशोभित कर दिया जाता है जिनका मैं भी भुक्त भोगी रहा हूं। 
हालांकि अभी यह प्रावधान उस तरह से एससी एसटी एवं ओबीसी के पक्ष में नहीं है जैसा इसमें होना चाहिए लेकिन इससे यह बात तो साफ हो गई कि हिंदू को एकजुट करने वाले हमारा यह सवर्ण समाज अपना असली रूप में आ गया !  वर्ण 'स' से आनेवाले कथित कवि,लेखक, पत्रकार, वकील, सामाजिक कार्यकर्ता, कथावाचक अधिकारी सभी ने इसका इस कदर विरोध किया जिससे उनकी जातिगत मानसिकता और संकीर्णता साफ दिख गई। उनकी घृणा और नफरत  इस एक्ट के खिलाफ न होकर समूचे एससी एसटी और ओबीसी के खिलाफ ही हो गया जिसमें आरक्षण तक के प्रावधान को भी सामने ला दिया गया । उसी आरक्षण का जो सदियों से एकच्छत्र राज करते हुए भी सात वर्षों से पिछले दरवाजे से 10% का लाभ उठा रहे हैं।इसका किसी समाज में विरोध नहीं किया गया उन्हें खुद आकर आगे बढ़ना चाहिए था कि नहीं हम कोटा का लाभ नहीं उठाएंगे ।
जब बात कथित रूप से सवर्ण के हित की आती है तो हिंदुत्व खिड़की से बाहर चला जाता है और जब बात सत्ता एवं वर्चस्व की आती है तो अगले दरवाजे से हिंदुत्व का भूत सामने आता है और एससी एसटी और ओबीसी वर्ग को बरगला देता है ।
यूजीसी का विरोध तो उन्होंने किया ही प्रधानमंत्री,गृह मंत्री को भी उनके जातिगत पहचान को दिखाते हुए जाति सूचक गालियां दी गई। संघ का सच्चा स्वयंसेवक और घोषित रूप से हिंदू हृदय सम्राट होते हुए भी उनका गुनाह सिर्फ यह था 'तेली'( बनिया)जाति में जन्म लिए? क्या नहीं किया इस सवर्ण हिंदू समाज के लिए प्रधानमंत्री ने लेकिन बदले में क्या मिला? जातिसूचक गालियां, अपमान, जूते-चप्पल!
यह दिखाता है कि चाहे आप कितना भी 'हिंदू' बनें अपनी जातिगत औकात को मत भूलें ! 
अंत मेंं यह भी स्पष्ट करना चाहूंगा  हमारी लड़ाई सवर्ण विरोधी नहीं हैं अपितुु उस  सामंती मनुवादी सोच के विरुद्ध है जो जन्म के आधार पर श्रेष्ठता साबित करते हुए अपना वर्चस्व और अन्याय को  दलितों- पिछड़ों को शोषित करते हुए करना चाहता है ‌।
बहरहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी है अब देखना यह है कि आगे आगे होता क्या है? संक्रमण के इस दौर में सतर्कता एवं जागरूकता आवश्यक है

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