कहां चूके तेजस्वी, कहां लुढ़के प्रशांत, दस हजारी नीतीश के आगे सभी दिखे आक्रांत
तो बिहार विधानसभा चुनाव-2025 के परिणाम आ चुके हैं, आज से कई दिनों तक चुनावी विश्लेषक, टीवी रिपोर्टर, पार्टियां ,पार्टियों के प्रवक्ता, नेता और आम कार्यकर्ता भिन्न-भिन्न एंगल से इसकी जांच पड़ताल जरूर करेंगे, चलिए एक एंगल से जांच-पड़ताल हम भी करते हैं!
रिजल्ट के बाद नेताओं से ज्यादा जनता में जीत की खुशी की लहर है। किस बात की खुशी है उन्हें अगले 5 वर्षों में पता चल जाएगा!बहरहाल आइए हम चुनाव की थोड़ी पड़ताल करते हैं- तो बात दरअसल यह है कि बिहार की जनता ने एनडीए गठबंधन को पूर्ण बहुमत दी है। सत्ता विरोधी लहर, युवाओं में मौजूदा सरकार के प्रति आक्रोश जो हम स्थानीय पत्रकार, यूट्यूबर द्वारा साथ ही साथ विभिन्न न्यूज़ चैनलों के माध्यम से सोशल मीडिया के साथ-साथ जमीन पर भी देख रहे थे। अब तक के परिणाम के अनुसार उसका कुछ असर नहीं दिखा! राहुल-तेजस्वी के नेतृत्व में चलाए गए वोटचोरी, युवाओं के रोजगार,शिक्षा, स्वास्थ्य के मुद्दे धरे के धरे रह गए। वहीं चुनावी रणनीतिकार से सीधे चुनावी मैदान में उतरने वाले जन सुराज के सारथी प्रशांत किशोर के पलायन, बेरोजगारी,गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य के मुद्दे भी पीछे की खिड़की से निकल गए जैसे ही दरवाजे से सांप्रदायिकता एवं जाति-पाति के दूत सामने आए। उनकी जनसभाओं में, रोड यात्राओं में काफी भीड़ जुटी लेकिन बिहार में भीड़ वोट में बदल जाएगा ऐसा कहां होने वाला था! प्रशांत किशोर अच्छी बात करते हैं पलायन की बात करते हैं,गरीबी की बात करते हैं। ठीक है सुनने में अच्छा लगता है। भाई जरूर पलायन रुकनी चाहिए, गरीबी रुकनी चाहिए लेकिन वोट तो हम अपने जात वाला को देंगे ना, वोट तो हम मोदी जी के ही नाम पर देंगे ना ,हिंदुत्व को ही जिताएंगे ना!
प्रशांत किशोर की राजनीतिक विफलता के चार कारणों का जवाब बिहार का आठवीं कक्षा में पढ़ने वाला राजनीति शास्त्र का विद्यार्थी भी दे देगा।
नीतीश कुमार के चुनाव से एक महीना पहले के कार्यों का ही नतीजा है (चाहे वह जीविका दिदियों १०-१० हजार व्यवसाय करने के नाम पर रेवड़ी बांटना हो, बिजली मुफ्त करनी हो या राज्य सरकार के विभिन्न कर्मियों को वेतन एवं भत्ते को अंतिम दिनों में बढ़ाना हो) कि न सिर्फ उनका स्ट्राइक रेट सुधरा अपितु सीटों की संख्या में भी पिछले विधानसभा चुनाव से लगभग दोगुनी बढ़त हुई। अच्छा!भाजपा और संघ को जनता दल यूनाइटेड की अप्रत्याशित सफलता पर अंदर-अंदर मिर्च ही लग रहा होगा! कहां सोची थी कि अपने बल पर मुख्यमंत्री बनाएंगे, वह भी किसी खास तबके से! और अब नीतीश कुमार के करिश्माई नेतृत्व के आगे सपना धारा का धारा ही रह जाएगा। भले ही यहां के नेता बिहार के लोगों को राजनीतिक रूप से सशक्त मानें लेकिन पिछले दो चुनावों ने यह सिद्ध कर दिया है कि जनता मुद्दे पर वोट नहीं देगी,जनता को इस कदर पेट के बल मार दिया जाएगा की 5 किलो राशन को ही अपना विकास समझेगी! महागठबंधन से भी कुछ मूलभूत चुकें हुई हैं वे नीतीश कुमार के रेवड़ियों का बेहतर तरीके से जवाब शायद ना दे पाए, और इसी का नतीजा है कि शायद वह यूथ को बूथ तक न ले आ पाए! दूसरी बात यह है कि भाजपा के बड़े नेताओं प्रधानमंत्री सहित गृह मंत्री द्वारा राजद के शासनकाल को कथित 'जंगल राज' के दुष्प्रचार भी इसमें एक अपनी अलग अलग भूमिका निभाई! जिसका तोड़ विपक्षी गठबंधन उतनी कारगर तरीके से न दे पाई, पारिवारिक आंतरिक कलह, सीट बंटवारोंं को लेकर खींचतान, अंत अंत तक कई सीटों पर आपसी सहमति न बनने के कारण महागठबंधन के नेताओं में कथित फ्रेंडली फाइट एवं साथ ही मुख्यमंत्री का चेहरा आनन-फानन मेंं अंतिम दोनों में घोषित करना; इससे स्पष्ट रूप से जनता में एक नकारात्मक संदेश गई हो,इनकार नहीं सकते! जिसे सत्ता पक्ष ने दोनों हाथों से लपका ।
ओवैसी की पार्टी भी सीमांचल क्षेत्र में महागठबंधन का खेल बिगाड़ी इससे भी आप मुकर नहीं सकते, ख़ैर कारण चाहे जो भी हो यह संगठन के साथ कार्यान्वयन पर भी सवालिया निशान उठाते हैं।
वहीं इन सब से इतर प्रशांत किशोर पिछले तीन-चार वर्षों से जिस तरह से बिहार में मेहनत किए हैं, पसीना बहाए हैं जनता के मुद्दे की बात की है ; अगर यही विदेश के किसी देश में मेहनत करते तो जोहरान ममदानी की तरह शिक्षा, स्वास्थ्य एवं जनता के मुद्दे पर अब तक जनप्रतिनिधि चुन लिए जाते (आप कहेंगे कि अपने देश में भी तो केजरीवाल ने ऐसा संभव किया है जी हां बिल्कुल किया है लेकिन बंदूक अन्ना के कंधे पर रखकर ! प्रशांत किशोर के पास ऐसा कोई अन्ना नहीं मिला, जिसका वरद हस्त उन्हें प्राप्त हुआ।) या उनकी सरकार बन जाती! पूरी बातों का सार यह है कि बिहार का चुनाव नेताओं द्वारा जीत लिया गया है, जनता फिर से ठगी गई है। 5 वर्षों में मौका-बे- मौका इसका एहसास जरूर होगा!
~ Brijlala Rohan
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