दमघोंटू दिलपुर की दास्तां
दमघोंटू दिलपुर की दास्तां ( व्यंग्य रचना) ( नोट-यह रचना सामाजिक एवं पर्यावरणीय संवेदनशील मुद्दे को हंसी व्यंग के रूप में सामने लाता है रचना में प्रयुक्त कथानक काल्पनिक है। किसी भी प्रकार के जीवित एवं मृत्त व्यक्ति , वस्तु, स्थान से मेल होना मात्र संयोग हो सकता है ) “देख रहे हो भाई सुबह से ही सांस लेने में तकलीफ महसूस हो रही है” रोहन ने कहा, इस पर रोहन के मित्र मुकेश कहता है हां भाई मेरे तो आंख में भी जलन महसूस हो रही है। बीच में ही दोनों को टोकते हुए रिक्शा चालक कहता है आप लोग नए-नए गांव से आए हैं क्या बाबू दिलपुर में ? हां ! चाचा हम अपने गांव से दिलपुर में इस साल ही पढ़ने के लिए आए हैं लेकिन यहां देख रहे हैं कि सांस लेने में भी दिक्कत हो रहा है और तो और आंख कान लग रहा है आंख कान जल के राख हो जाएगा । तो साथियों देखा आपने दमघोंटू दिलपुर की एक झलक , दिलपुर हां वही अपने देश की राजधानी, जिसे राजनेताओं ने कबड़खानी बना दिया है। हर नेता आता है अपना बात कह कर के चला जाता है ना तो दिलपुर की दशा सुधरती है और ना यहां रहने वाले दिलपुरवासियों की दिशा !रोज वही जाम का दाम और स्याही तमाम ...