भारत की सांस्कृतिक विविधता : एक ताकत या एक चुनौती ?
हिंद देश के निवासी सभी जन एक हैं ,
रंग ,रूप , वेश, भाषा चाहे अनेक हैं
बेला,गुलाब, जूही ,चंपा ,चमेली
प्यारे प्यारे फूल गूंथे माला में एक हैं ।
प्रस्तावना : भारत की सांस्कृतिक विविधता
किसी भी देश की सांस्कृतिक विविधता उस देश की समुन्नत संस्कृति का वाहक होती है। भारत शब्द अपने आप में एक विशेष विचार का वाचक है । इस शब्द का विश्लेषण करें तो इसमें ‘भा’ और ‘रत’ का मेल दिखाई पड़ता है ‘भा’ अर्थात प्रकाश यानी ज्ञान को प्रकाशवान कहा गया है , की खोज में ‘रत’ अर्थात निरंतर अन्वेषण करता हुआ, निरंतर लगा हुआ ; इसका अभिप्राय हुआ कि निर्मल ज्ञान की खोज में लगा हुआ चिंतनशील देश भारत है और विविधता में भी एकता भारतवर्ष की सबसे बड़ी विशेषता है ।
भारत जिसे प्रकृति का सर्वोत्तम उपहार प्राप्त है , उत्तर में पर्वतराज हिमालय से दक्षिण में भारत मां को चरण पखारती हिंद महासागर, पश्चिम में विशाल थार का मरुस्थल तो पूर्वोत्तर में पर्वत पहाड़ियों से समृद्ध हमारा विराट प्रदेश , उत्तर में जहां विशाल मैदान तो पश्चिमी एवं पूर्वी तट पर समृद्ध तटवर्ती मैदान। वर्ष भर में छह ऋतुओं एवं हर मौसम का आनंद भारत में आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। जिस प्रकार विविध प्रकार की प्राकृतिक विविधताएं हैं ठीक उसी प्रकार पंथ , क्षेत्र, भाषा, संस्कृति की भी अपनी विशेषताएं हैं। यह सब मिलकर भारतवर्ष की समृद्ध संस्कृति के वाहक हैं जो भारत को एक भारत श्रेष्ठ भारत के रूप में समुन्नत करते हैं । भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं का उल्लेख किया गया है एवं अन्य प्रकार की अधिसूचित बोलियां एवं उपभाषाएं भी दर्ज हैं जिनका भारत की सांस्कृतिक योगदान में संवैधानिक मान्यता के साथ इसकी स्वीकृति प्रदान है।
भारत की सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए सही ही कहा गया है,
कोस कोस पर पानी बदले , सात कोस पर बानी
भारतवर्ष की सांस्कृतिक विविधता : एक ताकत
प्राचीन काल से ही भारत ने समन्वयवादी संस्कृति का अनुसरण किया है, अपने में अनेक भाषा-भाषियों धर्म, पंथ,समुदाय के लोगों को अपना बनाया है एवं उसे आत्मसात भी किया है ।उत्तर भारत में प्रचलित महान ‘गंगा जमुनी’ संस्कृति की परंपरा हो जो अविच्छिन्न रूप से समस्त भारतवर्ष में प्रवाहित हुई है जिसमें हिंदू एवं मुसलमान साथ-साथ अन्य धर्मावलबियों को भी साथ लेकर चले हैं । चाहे हम प्रथम स्वाधीनता संग्राम को देखें चाहे देश की आजादी के बाद भारत को पुनः नए मार्ग पर प्रशस्त करने में हो, कुछ अपवादों को छोड़ दें तो प्रत्येक भारतवासी पहले भारतवासी होता है बाद में वह धर्म एवं मत को देखता है ।
भारत की इसी सर्व समावेशी संस्कृति से प्रभावित होकर महान कवि पाश ने लिखा है कि
‘भारत’
मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द
जहाँ कहीं भी प्रयोग किया जाए
बाक़ी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं।
भारत की सांस्कृतिक विविधता एवं एक तत्व की भावना से अभिभूत होकर ही माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने जब लाल किले के प्राचीर से विकसित भारत के पांच प्राण तत्वों को आह्वान किया था तो उसमें तीसरे एवं चौथे प्राण तत्व के रूप में क्रमशः अपनी विरासत पर गर्व करना और एक एकतत्व की भावना रखने पर जोर दिया था ।
समृद्ध संस्कृति समरसता का अमूर्त प्रतिरूप
भारतीय संस्कृति समरसता का अमूर्त प्रतिरूप है। भारत में विभिन्न प्रकार के पर्वत -त्योहार अपने आप में न सिर्फ प्रकृति से जुड़ती है अपितु प्रकृति के साथ वैज्ञानिक महात्म्य को स्वीकार करते हुए यह विश्व को सद्भाव एवं सहिष्णुता का संदेश देती है। हमारे यहां ईद में अगर हिंदू भाई मुसलमान भाइयों के यहां सेवई खाने आते हैं तो होली में मुसलमान भाई भी संग संग अबीर - गुलाल लगाते हैं। क्रिसमस में ईसा मसीह का भी हम साधुवाद देते हैं ,महात्मा बुद्ध का मध्यम मार्ग एवं महावीर का ‘जीयो एवं जीने दो’ की समृद्ध जीवन परंपराएं हमारे विविधता का आधार है, एकता के वाहक हैं।
समृद्ध साहित्यिक परंपरा
हमारे यहां आर्यों एवं द्रविडों की समृद्ध साहित्यिक परंपरा है जिसमें संस्कृत में वैदिक साहित्य है वहीं तमिल में संगम साहित्य प्रचलित है ।इसके अलावे भी स्मृति एवं स्मरण पर भी आधारित साहित्यिक परंपराएं मौखिक रूप से आदिवासी समाज से होते हुए भिन्न-भिन्न भागों में प्रचलित है।
हिंदी साहित्य के प्रख्यात साहित्यध्येता आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं कि
“भारत का सच्चा लोकनायक वही हो सकता है जिसमें समन्वय का दृष्टिकोण हो”
सांस्कृतिक धरोहर : खानपान, संस्कृति ,पहचान
भारतीय सांस्कृतिक विविधता का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू उसकी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर है। भारत की कला, संगीत, नृत्य, साहित्य, वास्तुकला और काव्य की परंपरा विश्वभर में प्रसिद्ध है। भारतीय शास्त्रीय संगीत, कथक, भरतनाट्यम, ओडीसी, कुचिपुड़ी जैसे नृत्य रूप, ताज महल, कुतुब मीनार, कांची का मंदिर जैसी वास्तुकला की कृतियाँ, इन सभी ने भारत की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत किया है। इस सांस्कृतिक समृद्धि ने भारत को वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है।
संयुक्त राष्ट्र संघ की यूनेस्को की सूची में भी पूरे भारतवर्ष से विभिन्न प्रकार के धरोहर स्थल संरक्षित श्रेणी में रखे गए हैं जो की मानवता के विकास के अद्भुत उदाहरण हैं। अपनी कला, वास्तुशिल्प एवं इंजीनियरिंग में यह वर्तमान पीढ़ी को भी टक्कर देती है।
खानपान में भी अलग-अलग भौगोलिक परिवेश के अनुसार अलग-अलग व्यंजन है जहां दक्षिण भारत में इडली डोसा प्रसिद्ध है वहीं उत्तर भारत में लिट्टी-चोखा एवं चावल दाल लोग बड़ी चाव से खाते हैं।
वर्तमान समय की भी बात करें तो भारतीय फिल्म उद्योग, खासकर बॉलीवुड, ने विश्वभर में अपनी छाप छोड़ी है। भारतीय सिनेमा और भारतीय संस्कृति ने लाखों लोगों को आकर्षित किया है और भारत को वैश्विक सांस्कृतिक मानचित्र पर प्रमुख स्थान दिलाया है।
निष्कर्ष
निष्कर्ष स्वरूप हम नि: संदेह कह सकते हैं कि भारत विविधताओं का देश है और विविधता में एकता ही भारत की सबसे बड़ी विशेषता है। भारत की सर्व समावेशी संस्कृति एवं बहुलतावादी दृष्टिकोण का अनुसरण करते हुए सभी लोगों में धर्म,पंथ,जाति,वर्ग , वर्ण,लिंग, वेशभूषा, नस्ल, क्षेत्र से परे होकर परस्पर सद्भाव एवं आपसी प्रेम, बंधुता का भाव रखकर ही हम सांस्कृतिक विविधता को एक चुनौती के रूप में नहीं अपितु एकता के रूप में स्थापित कर सकते हैं क्योंकि यदा कदा देश विरोधी आवाज़ भी आते हैं लेकिन अगर हम विज्ञान की भाषा में देखें तो हाइड्रोजन जो कि स्वयं जलता है और ऑक्सीजन जो जलने में मदद करता है अगर दोनों एक हो जाए तो वह जल का निर्माण करता है जो शीतलता का प्रतीक होता है अर्थात जो एकता का प्रतीक होता है। हमने बचपन में किसान के चार बेटों की कहानी तो सुना ही है जिसमें से किस प्रकार चारों लकड़ी के डंठल को अलग-अलग कर देने पर तोड़ देते हैं अपितु जब एक होता है तो वह तोड़ नहीं पाते हैं ठीक उसी प्रकार हमें भी अपनी सांस्कृतिक विविधता को एक तत्व की भावना में रखकर ही विश्व के सामने भारत की ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का सद्विचार का साक्षात परिचय देने की परम आवश्यकता एवं समय की मांग है। स्वामी विवेकानंद से लेकर महात्मा गांधी जी, पंडित नेहरू ने एवं अब्दुल कलाम आजाद से लेकर एपीजे अब्दुल कलाम एवं अटल बिहारी वाजपेई जी ने भी इसी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का अनुसरण भारतवर्ष को सुंदर बनाने में किया है।
गांधी जी बतौर जीवन भर हिंदू मुस्लिम एकता को पुनर्स्थापित करने के लिए अपना जीवन त्याग दिया और जीवन के अंतिम क्षणों में भी वे इसी प्रयास में लग रहे दुर्भाग्यवश सांप्रदायिक तत्वों ने उनकी जीवन लीला समाप्त कर दी, लेकिन हिंदू मुस्लिम एकता के लिए किए गए उनके रचनात्मक प्रयास भारत की बहुलतावादी संस्कृति एवं समाज को संजोने हेतु सदैव अनुकरणीय है ।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने भारत की सामासिक संस्कृति पर बल देते हुए लिखा है कि भारत का सच्चा लोकनायक वही हो सकता है जिसमें समन्वय की अपार धैर्य क्षमता हो।
अपनी कृति 'संस्कृति के चार अध्याय' में वे लिखते हैं
हिंदुत्व और इस्लाम ने एक दूसरे को प्रभावित तो किया, किंतु यह प्रभाव सतह के नीचे नहीं पहुंच सका। औसत हिंदू का लक्षण यह है कि मानसिक धरातल पर वह अत्यंत उदार होता है किंतु आचरण के स्तर पर उसकी संकीर्णता भी भयानक होती है ।इसके प्रतिकूल सामाजिक आचारों में मुसलमान की उदारता उदारणीय है किंतु मानसिक धरातल पर मुसलमान कट्टर होते हैं ।अन्य धर्मों को अपने ही धर्म के समान पवित्र धर्म भी इस्लाम के ही समान पवित्र हैं। दुर्भाग्य की बात यह हुई कि हिंदुओं ने सामाजिक आचरण में मुसलमानों की उदारता का अनुकरण नहीं किया, न मुसलमानों ने हिंदुओं से यह सीखने का प्रयास किया कि हमें दूसरे धर्म का भी उतना ही सम्मान करना चाहिए जितना सम्मान करना चाहिए जितना हम अपने धर्म का करते हैं। यदि मुसलमानों ने यह शिक्षा ली होती तो अकबर का वे विरोध नहीं करते ,न औरंगजेब के समय में मंदिरों का फिर नाश हुआ होता।~
संदर्भ सूची
1. हिंदी साहित्य संवेदना एवं विकास : रामस्वरूप चतुर्वेदी
2. हिंदी साहित्य का सरल इतिहास : विश्वनाथ त्रिपाठी
3. भारतीय साहित्य - डॉ. नागेंद्र
4रामधारी सिंह दिनकर (संस्कृति के चार अध्याय, कृति से)
5.स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, एपीजे अब्दुल कलाम अटल ,बिहारी वाजपेई जी के भारतीय संस्कृति के एकता के संबंध में दिए गए मौलिक विचार
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