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Showing posts from November, 2024

कहां नहीं है वर्ग संघर्ष .....!

"कहां नहीं है वर्ग संघर्ष"!!... दुनिया हमेशा वर्गों में बंटी ही रही है, काल मार्क्स के अनुसार मानें तो दुनिया अमीर और गरीब या दूसरे शब्दों में कहें तो शोषक और शोषित वर्गों में बंटी हुई है, बिल्कुल सही है।  हालांकि यही केवल एक वर्ग नहीं है अपितु इसके अलावा भी कई वर्ग हैं अगर आप संजीदगी से देखना चाहें , तो हर जगह यह वर्ग आपको दिख जाएंगे। अकादमिक जगत में यह सच्चाई और क्रूर हो जाती है, जैसे-जैसे हम उच्च शिक्षा की तरफ आगे बढ़ते हैं वहां पर यह परिस्थिति अपने पूरे लाव-लश्कर ,ताने बाने के साथ दिखती है। एक स्थापित वर्ग जिसका प्राचीन काल से ही शिक्षा पर प्रभुत्व रहा है, जिसके अनुसार अन्य के लिए वहां जगह ही नहीं है वह तो भला मानो अंबेडकर साहब एवं अन्य समाज सुधारकों का जिनके सत्प्रयासों के कारण हम हौसले पाकर आज ऊंचे सपने भी देख रहे हैं और साथ ही साथ अपनी प्रतिभा और मेधा के बदौलत उसे प्राप्त भी कर रहे हैं। कॉलेज के विभिन्न डिपार्टमेंट से लेकर विभिन्न प्रकार की सोसाइटीज तक , साथ ही साथ प्रोफ़ेसर के जमात तक हर जगह ये चीज आपको आसानी से दिख जाएंगे।  कुछ गिने चुने लोग ही आपको वहां प्रभा...

डॉ राजेंद्र प्रसाद का जीवन दर्शन और आज का भारत

राजेंद्र प्रसाद का जीवन दर्शन और आज का भारत  “जो बात सिद्धांत में गलत है, वह बात व्यवहार में भी सही नहीं है” उपर्युक्त कथन महान स्वतंत्रता सेनानी , महात्मा गांधी के सच्चे अनुयायी, भारतीय संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष ,विद्वान विधिवेत्ता ,भारतीय संस्कृति के प्रबल पैरोकार, दार्शनिक, शिक्षाविद एवं विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति ,प्रबल मेधा के धनी एवं कुशाग्र बुद्धि के धनी डॉ. राजेंद्र प्रसाद की है। उनका जीवन एवं दर्शन , सादगी पूर्ण जीवन मूल्य आज के भारत के नवनिर्माण में ज्यादा प्रासंगिक है। राष्ट्रपति पद पर रहते हुए भी अपनी संपूर्ण सादगी, ईमानदारी कर्तव्य निष्ठा के लिए हमेशा स्मरण किए जाएंगे। उपर्युक्त कथन की अगर विवेचना करें तो हम पाते हैं जो बात सिद्धांत में सही नहीं है, वह व्यवहार में भी सही नहीं हो सकती । यह ठीक महात्मा गांधी के उस साध्य एवं साधन के विचार को प्रमुखता से उद्घाटित करते हैं। अपने संपूर्ण जीवन में उन्होंने इसका बखूबी पालन किया है एवं अपने जीवन के मूल्यों से हम सभी भारत वासियों को प्रेरित किया है और आज भी उनके विचार हमारे लिए प्रेरणा के शब्...

बटेंगे के बरक्स

*बटेंगे के बरक्स* एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी एवं सरकार द्वारा महाराष्ट्र एवं झारखंड जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव *बटेंगे तो कटेंगे* ,*एक हैं तो सेफ हैं* के बैनर तले लड़े जा रहे हैं! जनता के वास्तविक मुद्दे यथा शिक्षा, स्वास्थ्य , महंगाई, बेरोजगारी दूर-दूर तक किसी उल्का पिंड की यात्रा की भांति जमीन पर उतरने से पहले ही नष्ट हो जाते हैं। इन्हीं नारों के तले वोट भी मांगा जा रहा है, और जीता भी जा रहा है।  उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों के बेरोजगार युवाओं को शोभायात्रा, डीजे पर डांस, भिन्न-भिन्न प्रकार के सांप्रदायिक नारों के आड़ में उनके भविष्य को अंधेरे में रखकर सरकार भी बनाया जा रहा है । और अपने बेटे बेटियों को विदेश में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात ब्रिटेन, अमेरिका शिक्षा के लिए भेजा जा रहा है !  विडंबना देखिए यहां के डीजे पर नारे लगाने वाले भक्तों को थर्ड क्लास के स्कूल कॉलेज के फोर्थ क्लास के क्लासरूम में पांचवें दर्जे के शिक्षा को परोसा जा रहा है, डिग्रियां पैसों से खुलेआम बांटी जा रही है, ना तो समय पर वैकेंसी आ रहे हैं, न ही नियमित तौर पर परीक्षाएं आयोजित हो रही हैं...

शोध पत्र का विषय _ क्रांति, विद्रोह और विप्लव का स्वर : राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा

बृजलाला कुमार स्नातक हिंदी (प्रतिष्ठा)द्वितीय वर्ष  हिंदू महाविद्यालय दिल्ली विश्वविद्यालय शोध पत्र का विषय _ क्रांति, विद्रोह और विप्लव का स्वर : राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा प्रस्तावना : भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को आगे बढ़ाने में, पराधीनता की बोध को दर्शाने एवं स्वाधीनता की बोध को जगाने में जितनी भूमिका क्रांतिकारियों की रही है, उतनी ही भूमिका कलमकारों की भी रही है। जितने भी क्रांतिकारी रहे हैं वह कलमकार भी रहे हैं जिन्होंने अपने विचार, अपनी शब्द शक्ति एवं अपने सृजनशील कौशल से जन-जन में स्वाधीनता की बोध को जगाया और भारतीयों को स्वाधीनता के प्रति एक नई दिशा में अग्रसर होने हेतु प्रेरित किया। उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक, पूर्व में अरुणाचल से लेकर पश्चिम में गुजरात के तटवर्ती इलाकों तक विभिन्न प्रकार के लेखकों, कवियों, नाटककारों, गीतकारों ने धर्म, भाषा ,क्षेत्र, संस्कृति, जातीय अस्मिता से इतर भारतीय संस्कृति की समरसता का बोध जगाते हुए अपनी रचना के माध्यम से स्वाधीनता की प्रज्वलित मसाल को और भी प्रदीप्त किया है। अगर हिंदी साहित्य की समृद्ध ऐतिहासिक ,सांस्कृ...

पर्व त्यौहार में यात्रियों की दुरवस्था: भारतीय रेलवे की पोल खोलती वायरल तस्वीरें

इस तस्वीर को गौर से देखिए, हालांकि सोशल मीडिया के माध्यम से आप इस तरह के तस्वीर को देख ही चुके होंगे ! यह तस्वीर है छठ महापर्व के अवसर यूपी-बिहार जाते हुए किसी शहर (संभवत: दिल्ली) से अपने घर जाते हुए दो कामगार प्रवासियों की जिसमें देखा जा सकता है किस प्रकार दोनों रेलगाड़ी के डिब्बे की दरवाजे बंद होने के बाद दोनों दरवाजों के डोर से अपनी गमछी को बांधकर खुद को थोड़ा बहुत सुरक्षित महसूस करते हुए अपने बैग को पास वाले खिड़की से लटकाते हुए अपने घर की ओर रवाना हो रहे हैं। जरा सोचिए रेलगाड़ी की थोड़ी सी अनियंत्रित स्थिति इनके लिए कितनी भयावह एवं खतरनाक साबित हो सकती है ? इसकी कल्पना आप स्वयं कर सकते हैं! हालांकि इनकी इसमें उतनी गलती नहीं है जितनी गलती भारत सरकार और रेलवे मंत्रालय की है, चूंकी भारतीय रेलवे भी जानती है दिवाली एवं छठ महापर्व के अवसर पर विभिन्न शहरों से कितने यात्रीगण अपने घर की ओर रवाना होते हैं। ऐसे में रेलगाड़ियों का सही परिचालन न होना , घटते जनरल बोगी की संख्या इस ओर सवालिया निशान खड़े करते हैं कि रेल मंत्री जहां एक तरफ कहते हैं कि त्यौहार स्पेशल इस वर्ष 7000 ट्रेन चल...

छठ महापर्व की सुमधुर स्मृतियां ( भाग २) द्वितीय दिवस खरना

छठ महापर्व का दूसरा दिन, कार्तिक मास शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि।   छठ महापर्व के दूसरे दिन को *'खरना'* के रूप में जानते हैं ; इस दिन व्रतिगण पूरे दिन उपवास करके संध्या पहर से आम के दतवन से दांतुन कर तत्पश्चात स्नान कर मिट्टी के चूल्हे पर गन्ने से गुड़ बनाने में प्रयुक्त ईख के बचे हुए अवशेष जिसे स्थानीय भाषा में 'चेपुआ' भी कहते हैं, एवं आम की लकड़ी का जलावन के रूप में उपयोग कर पीतल की हांडी में नये अन्न, अर्थात खेतों से पककर तैयार धान से चावल, गाय के दूध एवं गुड़ का पवित्र प्रसाद *'खीर'* बनता है । छठ व्रतिगण पूरे सात्विकता से भगवान भास्कर एवं छठ माई को स्मरण करते हुए अचवन देकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। तत्पश्चात परिवार के अन्य सदस्य सहित आसपास के लोगों को प्रसाद वितरित किया जाता है। इस दिन सुबह से ही गांव में जिनके यहां छठ महाव्रत हो रहा होता है घूम घूम कर दूध इकठ्ठा करते हैं, गांव में जिनके जिनके यहां भी दुधारु गाय होती है वह इस दिन दूध ग्रहण नहीं करते हैं। ग्वाले दूध दुहकर वह उन छठ व्रत धारियों के यहां प्रसाद हेतु श्रद्धा भाव से वितरित कर देते हैं। मेरे नि...

छठ महापर्व की सुमधुर स्मृतियां( भाग १ ) प्रथम दिवस~ नहाय- खाय

*कांच ही बांस के बहंगिया,बहंगी लचकत जाय ...  पेन्हीं न बृज जी पियरिया दउरा घाटे पहुंचाये*।  कार्तिक मास,शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि ;  नहाय - खाय के साथ चार दिनों तक चलने वाला महान छठ पर्व का आज से प्रारंभ हो चुका है। मन अपने गांव, अपने घर ,अपनी माटी की याद में भावुक है। इस बार छठ महापर्व पर घर न जा सका । पल भर में वह सारी स्मृतियां आंखों के सामने चलचित्र की भांति चलने लगती है ,कैसे छठ घाटों की साफ सफाई के साथ-साथ अपने गांव, घर ,मोहल्ले में साफ-सफाई करना , कुदाल से घास पतवार छीलकर पानी छींटकर कूड़ा करकट साफ करके झाड़ू लगाना साफ सफाई करना ।ताकि छठ व्रतियों को कोई असुविधा न हो, उनका आशीर्वाद स्वरुप प्रेम हमें मिले। स्वच्छता एवं पवित्रता यही तो छठ महाव्रत की खासियत है।  मन पल भर को ठहर-सा जाता है, चले जाना चाहता है वहीं जहां हमें इस वक्त होना चाहिए था। अगर कोई एक शब्द में पूछे की छठ तुम्हारे लिए क्या है ? तो हमारा बेझिझक अंतर्मन की पुकार स्वरूप उत्तर होगा  _ *इमोशन।*                     पूर्वांचल सहित अखिल भार...

पर्व त्यौहार में भी घर ना पहुंचने की पीड़ा

आज दीपावली है,                चारों तरफ शोर है, आतिशबाजियां हैं!                शहर इलेक्ट्रिक लाइटों के चका चौंध में घुप्प अंधेरा -सा दिख रहा है                     लोग दीपावली का जश्न दिल खोलकर मना रहें हैं,            मगर मेरे दिल के अंदर एक गहरा सन्नाटा सा है! पिछली बार की तरह इस बार भी घर नहीं जा सका, सपनों के बोझ तले दिल्ली के किसी किराए के कमरे में अपने स्मार्टफोन के सोशल मीडिया पर चारों तरफ देखता हूं तो जश्न ही जश्न नज़र आता है।           अयोध्या में देखता हूं तो भगवान राम चंद्र जी के आगमन में दीये जलाने का विश्व रिकॉर्ड बन रहे हैं टूट रहे हैं, अपने शहर दिल्ली को देखता हूं तो सरकार की तरफ से पटाखे पर कथित ठोस सख्ती एवं प्रतिबंध के बावजूद दीपावली के दो दिन पहले से ही धूम- धड़ाका के आगे सरकार की नीतियां एवं अपील अपराधबोध लिए दीपावली के जश...

क्यों घरेलू सरजमीं पर ही सुपड़ा साफ हुआ? क्या ऐसे बनेंगे टेस्ट विश्व चैंपियन

किवियों(न्यूजीलैंड) के हाथों घर में ही टीम इंडिया का पहले सीरीज गंवाने, बाद में घरेलू मैदान पर ही 0-3 से सूपड़ा साफ होने (क्लीन स्वीप होने )की चर्चा आज विश्व के किसी भी क्रिकेट प्रेमी से आपको सुनने को मिल जाएगा। वाकई यह भारतीय क्रिकेट प्रेमियों के लिए सदमे जैसा है , चुकीं तकरीबन एक दशक से भी ज्यादा घर में सीरीज न हारने का अजेय क्रम टूट गया, वहीं अगर क्लीन स्वीप की बात करें देश की धरती पर यह 1969 के बाद टेस्ट क्रिकेट में दूसरी बार ऐसा इतिहास रचा जा रहा है जब भारत ने अपनी घरेलू सरजमीं पर चार टेस्ट मैच गंवाए (1इंग्लैंड से और 3 न्यूजीलैंड से)   साथ ही साथ घरेलू मैदान पर 2000 के बाद 24 साल पुराना रिकॉर्ड टूटा है जब हम क्लीन स्वीप भी हुए।   इसके पहले बांग्लादेश को घर में 2-0 हराने के बाद टीम इंडिया के हौंसले सातवें आसमान पर थे, लेकिन न्यूजीलैंड ने उसे धरती पर लाकर यह साबित कर दिया मुकाबला टक्कर का होना जरुरी है । स्पीन को खेलने में कभी माहिर माने जाने वाली भारतीय टीम आज स्पीन आक्रमण से ही जूझती नजर आ रही है। क्या कोहली, क्या रोहित, गिल , सरफराज सभी घुटने टेकते नजर आए।...