शोध पत्र का विषय _ क्रांति, विद्रोह और विप्लव का स्वर : राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा

बृजलाला कुमार
स्नातक हिंदी (प्रतिष्ठा)द्वितीय वर्ष
 हिंदू महाविद्यालय दिल्ली विश्वविद्यालय
शोध पत्र का विषय _ क्रांति, विद्रोह और विप्लव का स्वर : राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा
प्रस्तावना :
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को आगे बढ़ाने में, पराधीनता की बोध को दर्शाने एवं स्वाधीनता की बोध को जगाने में जितनी भूमिका क्रांतिकारियों की रही है, उतनी ही भूमिका कलमकारों की भी रही है। जितने भी क्रांतिकारी रहे हैं वह कलमकार भी रहे हैं जिन्होंने अपने विचार, अपनी शब्द शक्ति एवं अपने सृजनशील कौशल से जन-जन में स्वाधीनता की बोध को जगाया और भारतीयों को स्वाधीनता के प्रति एक नई दिशा में अग्रसर होने हेतु प्रेरित किया। उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक, पूर्व में अरुणाचल से लेकर पश्चिम में गुजरात के तटवर्ती इलाकों तक विभिन्न प्रकार के लेखकों, कवियों, नाटककारों, गीतकारों ने धर्म, भाषा ,क्षेत्र, संस्कृति, जातीय अस्मिता से इतर भारतीय संस्कृति की समरसता का बोध जगाते हुए अपनी रचना के माध्यम से स्वाधीनता की प्रज्वलित मसाल को और भी प्रदीप्त किया है। अगर हिंदी साहित्य की समृद्ध ऐतिहासिक ,सांस्कृतिक परंपरा की बात करें तो हिंदी साहित्य के आधुनिक जनक कहे जाने वाले पितामह भारतेंदु से लेकर बाद के कवियों में मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी , अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध,’ रामनरेश त्रिपाठी, श्रीधर पाठक, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, सुभद्रा कुमारी चौहान, जयशंकर प्रसाद, सियाराम शरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर आदि आदि कवियों ने अपनी प्रखर रचनाशीलता के बदौलत राष्ट्र को उसकी सोयी हुई राष्ट्रीय भावना एवं राष्ट्र के प्रति कृतकृत संकल्प को पुनः जगाया है।
भारतेंदु युग : राष्ट्रीय काव्यधारा की जमीन
 भारतेंदु युग जहां राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा की जमीन तैयार करने का काम किया तो वही द्विवेदी युग आते-आते यह जमीन एक इमारत का रूप लेने लगा जिसे अंततः छायावादी काव्यधारा में अपने प्रखरतम रूप में राष्ट्र के प्रति आह्वान को लेकर सामने आया।
 भारतेंदु जी लिखते हैं
“अंग्रेज राज सुख साज सजै सब भारी पै धन विदेश चलि जात यह अति ख्वारी”
इन पंक्तियों के माध्यम से ही वह भारत में अवैध रूप से धन के निष्कासन को और अंग्रेजों की दोहरी नीति को उद्घाटित करते हैं जिसमें से किस प्रकार से भारतीय संसाधनों का अंग्रेज के उद्योगों की संपन्नता में बर्बरता से दोहन और निष्कासन किया जा रहा था।
भारतेंदु जी जिनसे आधुनिक गद्य साहित्य का प्रादुर्भाव हुआ, उन्होंने भारतीय एवं पाश्चात्य संस्कृति की विशेषताओं को भारतीय संदर्भ में पिरोकर अंग्रेजों को उनकी नीतियों के खिलाफ आईना दिखाने का काम किया। भारत दुर्दशा नाटक इसका ज्वलंत उदाहरण है; जिसमें भारत की दुर्दशा को पूरे मार्मिकता से सबके समक्ष सामने लाया है। यद्यपि भारतीय संदर्भ में सुखांत नाटकों का प्रचलन था लेकिन भारतेंदु जी ने दुखांत रचना लिखकर अंग्रेजों की बर्बरता को सत्य प्रमाणित रूप में सामने लाया। गद्य एवं काव्य दोनों माध्यम से उन्होंने राष्ट्रवादी काव्य भावना को जीवंत किया जो आगे के राष्ट्रवादीसाहित्यकारों के लिए आधार का काम करता है। क्योंकि भारतेंदु जी का अवतरण भारतीय राष्ट्रीय सांस्कृतिक फलक पर ऐसे समय में हुआ जब देश 1857 की क्रांति की पहली लड़ाई हार चुका था! और जनमानस में एक निराशा की भावना भी थी अतः इस निराशा की भावना को पाटने का काम भारतेंदु जी करते हैं। अपने भारतेंदु मंडल के माध्यम से विभिन्न साहित्यकारों को मार्गदर्शन एवं दिशा निर्देशन देते हैं। जो बाद में महावीर प्रसाद द्विवेदी के निर्देशन में सरस्वती पत्रिका के माध्यम से द्विवेदी युग में राष्ट्रीय सांस्कृतिक कवियों एवं साहित्यकारों का प्रादुर्भाव भारतीय फलक पर उन्नत रूप में सामने आता है।
द्विवेदी युग(१९००_१९१८ : राष्ट्रवादी कविता के प्रादुर्भाव का स्वर्णिम काल
आमतौर पर देखने पर द्विवेदी युग की कविता राष्ट्र की बाहरी शक्तियों से लड़ती हुई प्रतीत होती है लेकिन अगर इसकी मूल संवेदना को देखें तो यह न सिर्फ विदेशी पराधीनता की भावना को जगाने की कविता थी अपितु यह भारतीयों में व्याप्त विभिन्न प्रकार के अंधविश्वास, कुरीतियों को मिटाने का भी काम कर रही थी एक तरफ जहां भारत में अंग्रेजों के बर्बर शासन को अपने कलम के माध्यम से अभिव्यक्त कर रही थी तो दूसरी तरफ नारियों के साथ किए गए अत्याचार को ,पिछड़े, दबे ,दलित वंचित वर्ग के साथ किए गए सदियों से अत्याचार , किसानों की दयनीय स्थिति इन सभी को समेट कर एक सामंजस्य पूर्ण साहित्य को रच रही थी।
 राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने स्त्रियों के नए पात्र एवं उनकी भूमिका को गढ़ा, एक तरफ साकेत में जहां साहित्य में अपेक्षित उर्मिला की भावना को उजागर करने का काम किया तो वहीं दूसरी तरफ यशोधरा में नारी के उन्नत स्वरूप का प्रभावपूर्ण चित्रण किया। इनसे पूर्व भी अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध ने अपनी उन्नत लेखनी के माध्यम से राष्ट्रवादी भावना को उजागर करने का अपना ओजस्वी योगदान दिया।
 भारत भारती में गुप्त जी लिखते हैं
“हम कौन थे ,क्या हो गए और क्या होंगे अभी
आओ विचारे आज मिलकर यह समस्याएं सभी”।
 इन पंक्तियों के माध्यम से वे स्पष्ट करते हैं कि किस प्रकार से भारत की जो आज जर्जर एवं पराधीनता पूर्ण दशा हुई है, उस पर हम सभी को यानि धर्म, भाषा, नस्ल, लिंग, क्षेत्र, संस्कृति से परे अखिल भारतीय स्तर पर एक सामंजस्य स्थापित करते हुए बैठकर चिंतन मनन करने की आवश्यकता पर बल दिया है तथा अकर्मण्यता को दूर कर स्वयं को कर्तव्यनिष्ठ बनाकर राष्ट्र को पुनः अपने प्रगति पथ पर चलायमान करने के लिए आह्वान किया है।
यशोधरा में भगवान बुद्ध से संबंधित अपने शिकायत एवं मन में कसक को लेकर अपनी सखी मित्र को संबोधित यशोधरा के चरित्र के माध्यम से लिखते हैं की जो अब तक स्त्रियां पुरुषों के कर्तव्य मार्ग में बाधा बनती थी ; इन पंक्तियों के माध्यम से आप देख पाएंगे कि किस प्रकार से स्त्रियां स्वयं पुरुषों को अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ाने के लिए न सिर्फ प्रेरित करती हैं अपितु अपना सर्वोच्च त्याग भी करती हैं और वे इसे अपना कर्तव्य समझती हैं ना कि उनके मार्ग में किसी प्रकार की बाधा !
“सखि, वे मुझसे कह कर जाते
 कह ,तो क्या मुझको वे अपनी पथ- बाधा ही पाते ?
सखि, वे मुझसे कह कर जाते”
~मैथिलीशरण गुप्त
भारत के वर्तमान समय की आलसीपन, अकर्मण्यता एवं दयनीय दशा को पुनः जागरूक करने हेतु कर्तव्य पथ पर आरूढ़ करने हेतु राष्ट्रवादी स्वच्छंद कवि ‘श्रीधर पाठक’ लिखते हैं_
उठ उठ भारतवर्ष आलसी ,आलस तज रे
 कर धारण रण वस्त्र अस्त्र शस्त्रों से सज रे।
अंग्रेजों की फूट डालो और शासन करो की नीति का जिस प्रकार से भारतीय जमींदार एवं कथित संभ्रांत वर्ग के लोग शब्दश: अनुसरण कर रहे थे, उन गद्दारों एवं देश के प्रति वफा ना रखने वाले तथा कथित भारतीयों को संबोधित करते हुए राय देवी प्रसाद ‘पूर्ण’ लोभी ,पाखंडी,अवसरवादी एवं अपने मदांध व्यक्तियों को महत्वाकांक्षा को त्यागने एवं भारत की वर्तमान दशा को देखकर अपनी आंख खोलने की बात को इन पंक्तियों के माध्यम से स्पष्ट किया है:
 “जरा फुट की दशा खोलकर आंखें देखो। खुदगर्जी का नशा खोलकर आंखें देखो”।
 किसानों की दुर्दशा एवं आम जनमानस की दशा को अभिव्यक्त करते हुए ‘रामनरेश त्रिपाठी’ जी लिखते हैं:
 “अन्न नहीं है वस्त्र नहीं है रहने का ना ठिकाना कहीं
कोई नहीं किसी का साथी अपना और बिगाना”
 अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध के शब्दों में जिसमें संध्या के प्राकृतिक दृश्य प्रतिक के माध्यम से देश की दशा एवं पराधीनता द को स्वाधीनता प्राप्ति तक रेखांकित करते हुए उसे राष्ट्रवादी स्वर देते हैं :
दिवस का अवसान समीप था ।
गगन था कुछ लोहित हो चला ।।
 तरु शिखा पर थी अब लाजमी।
 कमलिनी - कुल - वल्लभ की प्रभा
(प्रियप्रवास ) अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
गया प्रसाद शुक्ला ‘त्रिशूल’ राष्ट्र प्रेम की भावना को अपने हृदय में रखना इतना जरूरी मानते हैं कि राष्ट्र प्रेम के बिना यह हृदय जो है पत्थर के समान है। क्योंकि जिस महर्षि वाल्मीकि अपने रामायण में स्वर्ग से भी बढ़कर माता और मातृभूमि को मानते हैं ठीक उसी प्रकार:
वह हृदय नहीं है पत्थर है
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं
(स्वदेश ,कविता) गया प्रसाद शुक्ल ‘त्रिशूल’
 और अंत में अपने विराट व्यक्तित्व वाले महान राष्ट्रवादी कवि ‘मैथिलीशरण गुप्त’ राम के चरित्र के माध्यम से यह उद्घाटित करते हैं, की कर्म की महत्ता क्या है? इसे स्वाधीनता आंदोलन के संदर्भ से जोड़कर हम अवलोकन कर सकते हैं कि किस प्रकार से अगर भारत को स्वाधीनता प्राप्त करनी है तो अकर्मण्यता को त्याग कर कर कर्मनिष्ठ एवं संघर्षशील बनकर अंग्रेजों के साथ-साथ देश के अंदर वर्तमान अंधविश्वासों एवं कुरीतियों से लड़ने की आवश्यकता है।
“ भव में नव वैभव व्याप्त करने आया
 नर को ईश्वरता प्राप्त करने आया
संदेश यहां मैं स्वर्ग का नहीं लाया
 इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया”
(साकेत) मैथिलीशरण गुप्त
छायावाद ( १९१८_१९३४): बिंब ,प्रतीक एवं प्राकृतिक उपादानों के माध्यम से राष्ट्रवाद की प्रखर चेतना का उद्गार
छायावाद युग भी राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा की दृष्टि से महत्वपूर्ण काल रही है।
 छायावाद के चार स्तंभ सुमित्रानंदन पंत जयशंकरप्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ महादेवी वर्मा इन चारों कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज की विभिन्न सूक्ष्म से सूक्ष्म एवं विराट भावों को अभिव्यक्त किया है। देश प्रेम भी उनमें एक है यद्यपि आगे चलकर कुछ कवियों ने समष्टि की जगह व्यष्टि की अवधारणा को आगे बढ़ाया एवं व्यक्ति सत्ता के माध्यम से कालजयी रचना कर राष्ट्र की उन्नति में योगदान दिया।
जयशंकर प्रसाद जहां एक और अपनी कविताओं के माध्यम से राष्ट्रवाद की भावना को जगा रहे थे एवं वहीं दूसरी तरफ अपने नाटकों के माध्यम से (यथा चंद्रगुप्त ,स्कंद गुप्त, ध्रुवस्वामिनी ) देश की उन्नत संस्कृति में गौण पड़े पात्रों को वापस उभार कर उसे नए संदर्भ में उद्घाटित कर रहे थे।
 देश के वीर पुत्रों को संबोधित यह कविता आज भी हमारे अंदर एक नई ऊर्जा एवं प्रेरणा से ओतप्रोत कर देती है :
हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती
‘अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो।
~जयशंकर प्रसाद
वहीं दूसरी तरफ ‘जागो जीवन के प्रभात’ अरुण यह मधुमय देश हमारा के माध्यम से भारतवर्ष की उन्नत संस्कृति परंपरा एवं प्राकृतिक सौंदर्य को अपने सृजनशील काव्य के माध्यम से सौंदर्य प्रदान कर उसे प्रस्तुत करते हैं।
जलियांवाला बाग में जिसमें 13 अप्रैल सन 1919 ई को शांतिपूर्ण चल रही सभा पर निहत्थे भारतीय पर अंग्रेजी सेनानायक जनरल डायर के आदेश पर अंधाधुंध गोलियां चलाई जाती है जलियांवाला बाग लाशों से भर जाता है निर्ममता की हदें पार कर दी जाती है मानवता कराह रही होती है ।अंग्रेजों के बर्बर व्यवहार से रुह कांप जाता है। इन सभी निर्मम दृश्यों को संबोधित करते हुए प्रख्यात राष्ट्रवादी कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान अपनी कविता ‘जालियांवाला बाग में बसंत’ में लिखती हैं :
यह सब करना किंतु यहां मत शोर मचाना,
 यह है शोक स्थान बहुत धीरे से आना ।
तो वहीं प्रथम स्वाधीनता संग्राम में झांसी की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की प्रखर सैन्य संचालन, नेतृत्व शक्ति, साहस एवं सामर्थ्य को संबोधित करते हुए झांसी की रानी कविता में लिखती हैं :
“बुंदेले हर बोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी”
 सुभद्रा कुमारी चौहान
 ‘एक भारतीय आत्मा’ के नाम से ख्यात माखनलाल चतुर्वेदी जी ‘पुष्प की अभिलाषा’ के माध्यम से देश पर मर मिटने वाले वीर जवानों की महत्ता को स्वीकार करते हुए लिखते हैं,
 चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ।
“चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ॥
चाह नहीं, सम्राटों के शव पर, हे हरि, डाला जाऊँ।
चाह नहीं, देवों के सिर पर चढूँ, भाग्य पर इठलाऊँ॥
मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ में देना तुम फेंक॥
मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने।
जिस पथ जावें वीर अनेक॥
 _ माखनलाल चतुर्वेदी
आज एवं राग के कवि ‘राष्ट्रकवि’ रामधारी सिंह दिनकर भी अपनी प्रखर राष्ट्रीय चेतना एवं विलक्षण काव्य प्रतिभा के धनी व्यक्तित्व को अपनी लेखनी के माध्यम से राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना को नई ऊर्जा ,नई प्रेरणा, नया उत्साह नई उमंग के माध्यम से सृजन करते हैं।
“ प्यार स्वदेश के हित अंगार मांगता हूं। चढ़ती जवानियों कि श्रृंगार मांगता हूं”।
रामधारी सिंह दिनकर जी
अपने काव्य संकलन ‘हुंकार’ के माध्यम से वे स्वयं को अभिव्यक्त करते हुए राष्ट्र की खोई हुई चेतना एवं सामर्थ्य को जगाने का प्रयास करते हैं।
सुनु क्या सिंधु, मैं गर्जन तुम्हारा
 स्वयं युग- धर्म की हुंकार हूं मैं
कठिन निर्घोष हूं भीषण अशनि का
 प्रलय गांडीव की टंकार हूं मैं।
( ‘परिचय’ कविता ‘हुंकार’ कविता संकलन रामधारी सिंह दिनकर)
 निष्कर्ष :
 क्रांति, विद्रोह और विप्लव का स्वर: राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा शीर्षक के अंतर्गत हमने भारतीय स्वाधीनता संग्राम में राष्ट्रीय सांस्कृतिक भावना जगाने वाले हिंदी साहित्य के उन विभिन्न रचनाकारों कवियों संपादकों की रचना सीता सृजनशीलता एवं राष्ट्र के उत्थान हेतु उनके किए गए योगदान योगदानों की संक्षिप्त किंतु सारगर्भित विवेचना की। आज के संदर्भ में जहां राष्ट्र को तोड़ने हेतु विभिन्न प्रकार के प्रयास किया जा रहे हैं, भारत की समरस संस्कृति , एवं बहुलतावादी दृष्टिकोण को नष्ट करने हेतु विदेशियों के साथ-साथ अपने घर में छिपे हुए उन अवसरवादी लोगों को चिन्हित करने की आवश्यकता है, साथ ही साथ उन्हें पुनः वापस राष्ट्र प्रथम की भावना से अपने राष्ट्र के प्रति योगदान देने की आवश्यकता है। एवं यह शोध पत्र इस और भी हमारा ध्यान आकर्षित करता है कि आज जो कुछ भी लिखा जा रहा है पढ़ा जा रहा है उनमें राष्ट्र की भावना राष्ट्र प्रेम की भावना का होना अवश्यंभावी है। हमारे लेखक को कवियों एवं रचनाकारों को राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा से प्रेरणा लेते हुए अपने पुरखों के पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए हमें अखंड भारत की परिकल्पना को संकल्पना में बदलना होगा तभी हम भारत को एक पुनः विश्व गुरु के साथ-साथ जाति, क्षेत्र लिंग ,भाषा, धर्म, पंथ से मुक्त बिना भेदभाव के समाज बनाने में हम योगदान दे पाएंगे। यही भारत की राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा की विशेषता भी है ,प्रेरणा भी है और इसका सारगर्भित उद्देश्य भी है।
आभार :
राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा हमारे हृदय के निकटतम स्थल बिंदु से जुड़ता है। अतः राष्ट्र के प्रति इस उत्कट प्रेम को अभिव्यक्त करने में मैं उन सभी पुस्तकों, रचनाकारों संकलनकर्ताओं का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं जिनकी सहायता के बिना यह कार्य संभव न था।
 एवं अपने आदरणीय गुरु जनों के प्रति आभार व्यक्त करता हूं जिन्होंने इस अल्प समय में शोध कार्य को संपन्न कराने में मेरी सहृदय , सुझाव एवं मार्गदर्शन किया । आभार व्यक्त करता हूं काशी हिंदू विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग को जिन्होंने इस संवेदनशील विषय पर शोध पत्र जमा करने हेतु हमें आमंत्रित किया।
 पुनः सभी साथियों का हृदय से आभार‌।।
 संदर्भ सूची ~
भारतेंदु रचना संचयन _ ‘भारतेंदु हरिश्चंद्र’ ( चयन एवं संपादन : गिरीश रस्तोगी)
भारतीय साहित्य के निर्माता_ ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी’ नंदकिशोर नवल (साहित्य अकाडेमी)
 भारतीय साहित्य के निर्माता _ ‘मैथिलीशरण गुप्त ’रेवती रमण (साहित्य अकादमी)
 रामधारी सिंह दिनकर ‘रचनावली’_ रामधारी सिंह दिनकर
 भारतीय साहित्य के निर्माता_ ‘ जयशंकर प्रसाद’ रमेश चंद्र शाह (साहित्य अकादमी)
भारतीय साहित्य के निर्माता _ रामधारी सिंह ‘दिनकर’ विजेंद्र नारायण सिंह (साहित्य अकादमी)
 हिंदी साहित्य का इतिहास _ आचार्य रामचंद्र शुक्ल
हिंदी साहित्य का सरल इतिहास _विश्वनाथ त्रिपाठी
हिंदी साहित्य : संवेदना एवं विकास _ रामस्वरूप चतुर्वेदी

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