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यदि गांधी बच गए होते तो कैसा होता तब का आज़ाद भारत : वाया असगर वजाहत 'गांधी और गोडसे की वैचारिकी'

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 ‘गोडसे@गांधी.कॉम’ प्रतिष्ठित लेखक, नाटककार असग़र वजाहत विरचित महात्मा गांधी के हत्यारे गोडसे के सांप्रदायिक मनोविज्ञान एवं गांधी के अहिंसक विचारों के परस्पर टकराहट पर लिखी गई प्रमुख कृति है। वैचारिक विषाक्त वातावरण में धार्मिक विद्वेष,असहिष्णुता एवं सांप्रदायिकता के भंवर जाल में फंसे हमारी पीढ़ी को नाटक गांधीवाद की सीमाओं के साथ सभ्यता की मानव एवं मानवतेर संभावनाओं को तलाशने का प्रयास करता है बकौल नाटककार “नाटक के मनोवैज्ञानिक आवरण में यह दर्शाने का प्रयास किया गया है कि महात्मा गांधी गोडसे को समझना चाहते थे ताकि यह जान पाएं कि गोडसे की उनसे नफ़रत करने की वजह आखिर क्या है? और गोडसे की मनोदशा में निहित सूक्ष्म आंतरिक द्वंद कितने गहरे हैं। इसके लिए गांधी संवाद का रास्ता अख्तियार करते हैं।“  संदर्भ कुछ इस प्रकार है की गांधी के हत्या करने के प्रयास में गोडसे असफल रहता है और गांधी किसी तरह बच जाते हैं, अस्पताल से इलाज के बाद वह सीधे गोडसे से मिलने जेल जाते हैं और यहीं से संवादों का सिलसिला आरंभ होता है। इसमें एक तरफ महात्मा गांधी सत्य एवं अहिंसा के विचार से सटीक तर्कपूर्ण ...

यूजीसी के प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट का रोक: क्या है आगे की राह ( सांस्थानिक हत्या से समता तक)

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तमाम विरोध-प्रदर्शन, हंगामे के बाद अंततः सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए प्रावधानों पर रोक लगा दी है। कथित रूप से अब अगली सुनवाई में इस पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। लेकिन इस प्रावधान के गजट नोटिफिकेशन आने के बाद ही जिस तरह से सवर्ण तबको में विरोध देखा गया, अनपढ़ से लेकर पढ़े लिखे लोगों तक ने इसका एकजुट होकर विरोध किया। और विडंबना देखिए कि जिस एससी एसटी ओबीसी समाज के लिए यह प्रावधान लाया गया था उसके अधिकांश तबके इस कानून के बारीकियों को तो छोड़िए उसके मूल प्रावधानों को भी शायद ही समझते हैं! इसके विरोध में जैसे जैसे कुतर्क गढ़े गए सोचकर हंसी और आंसू दोनों आते हैं। मूल रूप से जातिगत भेदभाव को मिटाने के लिए लाए गये  इस प्रावधान में कथित रूप से सवर्णों के के द्वारा यह कहा गया है कि यह सवर्ण को घोषित अपराधी बनता है जबकि तथ्य और सच्चाई यह है जिस पिछड़े और दलित समाज को कोटा वाला कहकर, तरह-तरह के गालियां और नारे संबोधित करके अपमानित और उत्पीड़न किया जाता है  तो क्या इस प्रावधान में उत्पीड़क समाज को ही शामिल किया जाएगा? दूसरा तर्क यह है कि इसमें सवर्ण को अपनी बात रखने और कम...

क्या अब इस देश में महिलाओं के साथ बर्बरता न्यू नॉर्मल है?

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इस देश में अब रोज ही किसी- न- मंदिर का उद्घाटन हो रहा है धर्म के नाम पर रोज ही उन्माद हो रहे हैं सांप्रदायिकता चरम पर है।इसी देश के सबसे गरीब राज्य में विश्व का सबसे बड़ा शिवलिंग खड़ा किया जा रहा है! नारी के नाम पर तरह-तरह के आयोजन किया जा रहे हैं लेकिन इसके बरक्स जो वस्तुस्थिति है महिलाओं की सुरक्षा को लेकर वह अभी हम सबके सामने है। आए दिन इस तरह की वीभत्स घटनाएं हम विभिन्न माध्यमों से देख रहे हैं कि किस तरह से सत्ता के संरक्षण में इस तरह के अपराधों को अंजाम दिया जा रहा है और विरोध करने वालों को या तो सलाखों के पीछे भेज दिया जा रहा है या उन्हें मार दिया जा रहा है। राज्य बदल दीजिए, राजनीतिक दल बदल दीजिए, सरकार बदल दीजिए आज देश के किसी भी राज्य बंगाल से लेकर बिहार,उत्तर प्रदेश से लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों तक में भी में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। अभी हाल फिलहाल ही बिहार की राजधानी पटना एवं उसके बाद औरंगाबाद से नीट की तैयारी करने वाली छात्रा के साथ जिस प्रकार से बलात्कार एवं हत्या की बर्बरतापूर्ण कुकृत्य सामने आ रही है मन को सिहरा देने वाला है।  और उसके बाद पुलिस प्रशा...

क्या होता है जब किसी भू-भाग में बहुसंख्यक अल्पसंख्यक बन जाता है और अल्पसंख्यक बहुसंख्यक?

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बांग्लादेश में सप्ताह भर के भीतर दो हिंदू युवकों की हत्या और क्रिसमस के मौके पर दक्षिणपंथी गुंडों के द्वारा भारत जैसे  कथित विश्व गुरु देश में अराजकता और बर्बरतापूर्ण तोड़फोड़ ! इस प्रकरण में धर्म और हत्या को छोड़ दें तो आपको क्या नजर आता है? आपको नजर आएगा अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का समीकरण;जिसकेे केंद्र में धर्म और सत्ता है। आज अपनी लेख में हम इसी पर बात करेंगे कि जब बहुसंख्यक अल्पसंख्यक बन जाता है तब क्या होता है? किस तरह से हो-हल्ला मचाया जाता है और वही बहुसंख्यक अपने देश के अल्पसंख्यकों के साथ किस प्रकार से दोहरा व्यवहार करता है और जब वह बहुसंख्यक आबादी किसी देश में अल्पसंख्यक बन जाता है तब उसके साथ बर्बरता की जाती है तब उसे कैसा महसूस होता है ? क्या इसे अपने देश का बहुसंख्यक समझता है? बांग्लादेश में सप्ताह भर के भीतर दो हिंदू युवकों की हत्या निश्चित रूप से बांग्लादेश की कट्टर इस्लामी तत्वों के उभार का चरम स्तर है। यह न सिर्फ अपने देश के भीतर हिंदुओं के उबाल लाने का और यहां के अल्पसंख्यक मुसलमानों के विरुद्ध नफरत पैदा करने का समय है अपितु यह समय अपनी सरकार की विदेश नीति पर भी ...

'घूंघट' और 'हिजाब' के बहाने, कहां तक सिमटी है स्त्री के आशियाने

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इन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा नियुक्ति पत्र वितरित करते समय एक मुस्लिम महिला के हिजाब को खींचने को लेकर वीडियो बड़ी तेजी वायरल हो रही है।पक्ष और विपक्ष, तथाकथित इस्लाम धर्म के ठेकेदार, बुद्धिजीवी वर्ग, स्त्री सशक्तिकरण के पैरोकार से लेकर राष्ट्रीय -अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक में अनेक तर्क और कुतर्क गढे जा रहे हैं। कोई कह रहा है यह शरीयत के खिलाफ,कोई कह रहा है यह इस्लाम के मूल्यों के खिलाफ है, कोई कह रहा है स्त्री की गरिमा के खिलाफ है। जितनी मुंह उतनी बातें, वायरल वीडियो के आधार पर टीवी डिबेट की बहसें सब इसी पर आकर टिक चुकी हैं। कुकुरमुत्ते की तरह स्त्री के अधिकारों के रक्षक अपने-अपने मंतव्य प्रस्तुत कर रहे हैं।एक दृष्टि से देखें तो कहा जा सकता है कि किसी सार्वजनिक मंच से किसी महिला को उसके इजाज़त विरुद्ध ऐसा करना गलत है। लेकिन इस प्रकरण ने एक नई बहस को जन्म दिया है- वह प्रकरण है घूंघट और हिजाब का! 'हिजाब'जिसका अरबी में अर्थ पर्दा,सीमा, आड़ है। इस्लाम के आध्यात्मिक अर्थ में इसकी समग्र अवधारणा है। वहीं घूंघट की भी हिंदू धर्म में समग्र अवधारणा है जिसमें शील, मर्या...

इस महान देश की पवित्र वायु पर 'AQI' नामक विदेशी षड्यंत्र खत्म हो!

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जो लोग इस महान देश की लोकधानी(राजधानी का परिवर्तित रूप) की पवित्र हवा को प्रदूषित और गंभीर स्थिति में दिखा रहे हैं, मुझे लगता है सरकार को उन सभी पर देशद्रोह का मुकदमा ठोक कर सलाखों के पीछे बंद कर देना चाहिए। आखिर आप देश के साथ इस तरह की गद्दारी कैसे कर सकते हैं? आप विदेशी पैमाने पर देश की हवा को कैसे नाप सकते हैं? आपको मालूम नहीं हमने अभी-अभी अमृत काल प्रारंभ किया है, हमने विकसित भारत के संकल्प रखे हैं! और जिन पंच प्राण तत्व पर यह संकल्प पूरा होगा,आप उसी को अपवित्रता का आरोप लगाकर पावन यज्ञ में विघ्न उत्पन्न कर रहे हैं।  ठीक है आप लोग लोकतंत्र में रह रहे हैं,तो निश्चित रूप से सरकार को जनादेश का सम्मान करना चाहिए। देश के पर्यावरण मंत्री को, (जो कि विकसित भारत के पवित्र-पावन पवन का एक नया स्टैंडर्ड बनाने में जुटे हैं) इससे पूर्व एक काम कर देना चाहिए दिसंबर के दूसरे और तीसरे सप्ताह को AQI सप्ताह के रूप में घोषित कर देना चाहिए या कि पूरे दिसंबर को एक AQI'मंथ' के रूप में घोषित कर देना चाहिए और पूरे शिक्षण संस्थान से लेकर सरकारी कार्यालय में इसे धूमधाम से मनाने के लिए विज्ञप्त...

मैं 'मैसी' नहीं, मानसिकता विरोधी हूं!

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भारत में पधारे अर्जेंटीना के स्टार फुटबॉलर मैसी को मिलने,देखने,फोटो खिंचाने में मची अफरातफरी के चकाचौंध में एक बात जो मेरे मन में हमेशा कौंध रही है। सोचा आप सब से भी शेयर कर दूं। चलिए शुरुआत आपसे एक सवाल से करते हैं। क्या भारत के आप किसी दो राष्ट्रीय स्तर के फुटबॉल खिलाड़ी का नाम जानते हैं, बता सकते हैं? मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं। आप में से आधे लोगों का जवाब नहीं में होगा( अगर मैं यहां पर गलत रहूं तो यह देश हित में होगा)! इसी बीच भारतीय फुटबॉल का एक चेहरा, एक नाम कहीं दब सा गया, जो अपने मैच और खेल को प्रोत्साहित करने के लिए भी लोगों से हाथ जोड़ता है लेकिन फिर भी दर्शक नहीं पहुंचते। जिस देश में क्रिकेट को एक रिलिजन ही मान लिया गया है उस देश में अन्य खेलों का क्या हश्र होगा यह ओलंपिक की मेडल तालिका ही हमें बता देती है । और जो लोग फुटबॉल सहित अन्य खेलों को फॉलो भी करते हैं उनकी मानसिकता भी औपनिवेशिक ही है, उन लोगों भी तथाकथित यूरोपीय लीग के बाहर कुछ नहीं दिखाई देता( बेशक आप दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को जानिए -पहचानिए-मानिए, उनको रोल मॉडल मानिए किंतु अपनी माट...