क्या होता है जब किसी भू-भाग में बहुसंख्यक अल्पसंख्यक बन जाता है और अल्पसंख्यक बहुसंख्यक?
बांग्लादेश में सप्ताह भर के भीतर दो हिंदू युवकों की हत्या और क्रिसमस के मौके पर दक्षिणपंथी गुंडों के द्वारा भारत जैसे कथित विश्व गुरु देश में अराजकता और बर्बरतापूर्ण तोड़फोड़ ! इस प्रकरण में धर्म और हत्या को छोड़ दें तो आपको क्या नजर आता है? आपको नजर आएगा अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का समीकरण;जिसकेे केंद्र में धर्म और सत्ता है।
आज अपनी लेख में हम इसी पर बात करेंगे कि जब बहुसंख्यक अल्पसंख्यक बन जाता है तब क्या होता है? किस तरह से हो-हल्ला मचाया जाता है और वही बहुसंख्यक अपने देश के अल्पसंख्यकों के साथ किस प्रकार से दोहरा व्यवहार करता है और जब वह बहुसंख्यक आबादी किसी देश में अल्पसंख्यक बन जाता है तब उसके साथ बर्बरता की जाती है तब उसे कैसा महसूस होता है ? क्या इसे अपने देश का बहुसंख्यक समझता है?
बांग्लादेश में सप्ताह भर के भीतर दो हिंदू युवकों की हत्या निश्चित रूप से बांग्लादेश की कट्टर इस्लामी तत्वों के उभार का चरम स्तर है। यह न सिर्फ अपने देश के भीतर हिंदुओं के उबाल लाने का और यहां के अल्पसंख्यक मुसलमानों के विरुद्ध नफरत पैदा करने का समय है अपितु यह समय अपनी सरकार की विदेश नीति पर भी प्रश्न चिन्ह खड़े करने का है? आखिर क्यों देश की खुफियां एजेंसियां और सरकारी विदेश नीति लगातार विफल होती जा रही है क्यों एक छोटे से देश पर भी हम अपना पकड़ खोते जा रहे हैं, खासकर अपने पड़ोसी देशों पर से! इस देश में व्यवस्था के पक्ष में खड़े हर व्यक्ति को इस बात का इंतजार जरूर है कि अमुक मुद्दे पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी क्या बोलते हैं, इस मुद्दे पर विपक्ष क्या बोलता है? (एक तरह से यह सोच तो एक स्वस्थ लोकतंत्र में होना भी चाहिए) किंतु ठहरिये ये प्रश्न कभी सत्ता पक्ष और सरकार से पूछे जाएंगे कि इस मुद्दे पर सरकार आखिर क्या कर रही है? कौन से कदम उठा रही है कितना प्रगति हुआ है? हमारे विदेशी संबंध कैसे हैं? चीन से कभी अरुणाचल तो कभी व्यापार घाटा में बैक फुट पर हम लगातार खेल ही रहे थे सांप सीढ़ी के खेल में हम अमेरिका से भी कभी शुल्क नीति में तो कभी वीजा के मामलों में लगातार बैकफुट पर ही खेल रहे हैं। सोचिए आपके मन में आखिरी बार सरकार के कामकाज के रवैया पर प्रश्न चिन्ह कब खड़ा हुआ था? क्रिसमस के मौके पर जब प्रधानमंत्री दिल्ली के चर्च में जाते हैं तो देश में सामाजिक सद्भाव का एक संदेश जाता है लेकिन ठीक इसके उलट उन्हीं की पार्टी के विचारधारा के पोषक संगठनों द्वारा देश में क्या-क्या उत्पात मचाया जाता है,उसे पूरे विश्व ने देखा। भारत की सामासिक संस्कृति का अनूठा उदाहरण!
मूर्खता, घृणा,नफरत और अंधभक्त की पराकाष्ठा देखिए जब से अपने देश में 2014 में दक्षिणपंथी सरकार आई तब से 25 दिसंबर को एक खास प्रोपेगेंडा के तहत क्रिसमस के विरोध में तुलसी दिवस मनाया जाने लगा? जिसका ना तो कोई वेदों, उपनिषदों या अन्य हिंदू ग्रंथों में उल्लेख है ! इस दिन कट्टर हिंदुओं के स्टेटस और सोशल मीडिया पटा पड़ा रहता है इन सब चीजों से।
वैज्ञानिक एवं तथ्य के आधार पर भी देखें तो भारत में जिस शक संवत एवं विक्रम को भारतीय मानसिकता का कैलेंडर माना जाता है उसकी तिथियां क्या ग्रेगोरियन कैलेंडर की तिथियां से बिल्कुल मिलान खाएंगी ? तो देखिए कितना द्वैध नजर आता है! यह जानबूझकर फैलाया गया नफरत नहीं तो और क्या है ? और इसी में कम ज्ञान वाला व्यक्ति भी देखा हिसकी करके इसे बढ़ाता चढ़ाता है, और धर्म के ठेकेदारों के चढ़ावे पर वह हिंसा करने को भी आतुर हो जाता है।(अगर हिंदुओं का यह तर्क है इस दिन बड़े पैमाने पर धर्मांतरण किया जाता है तो इसके विरुद्ध भारतीय संविधान में कई प्रकार के कानूनी प्रावधान हैं जिसके द्वारा इसे रोका जा सकता है। दूसरी बात यह भी कि अगर धर्म में आंतरिक विद्वेष और असमानता है किसी खास तबके के पास सत्ता का केंद्रण है, पूजा पद्धति से लेकर हर चीज पर उसी का नियंत्रण है, उसके एक बड़े समुदाय के साथ भेदभाव और अन्याय किया जाता है तो धर्म के ठेकेदारों को चाहिए कि अपने धर्म के अंदर समावेशिता लाएं ना की कि किसी दूसरे समुदाय एवं अपने धर्म के भीतर के ही समुदाय के प्रति नफरत और घृणा का भाव रखें)
यही धर्म के ठेकेदार कभी ट्रंप को तो कभी पुतिन को अपना भगवान के रूप में बना लेंगे, अपना लेंगे , उनके लिए हवन पूजन करेंगे? उस समय इन्हें ज्ञान नहीं रहता है कि ये ईसाई मतावलंबी ही हैं ।वैसे कौन ही समझना चाहता है इस देश में , इस देश को समय-समय पर न जाने कितनी समझने वाले बतलाने वाले और सही मार्ग पर लाने वाले मिले मगर यह देश आज जिस प्रकार से सांप्रदायिक आग में झुलसकर घृणा और नफरत के रसातल में गिरता जा रहा है ,निश्चित ही अभूतपूर्व है।
( संदर्भ - विभिन्न तथ्यात्मक जानकारी पर आधारित,
तस्वीर -freepik)
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