'घूंघट' और 'हिजाब' के बहाने, कहां तक सिमटी है स्त्री के आशियाने

इन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा नियुक्ति पत्र वितरित करते समय एक मुस्लिम महिला के हिजाब को खींचने को लेकर वीडियो बड़ी तेजी वायरल हो रही है।पक्ष और विपक्ष, तथाकथित इस्लाम धर्म के ठेकेदार, बुद्धिजीवी वर्ग, स्त्री सशक्तिकरण के पैरोकार से लेकर राष्ट्रीय -अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक में अनेक तर्क और कुतर्क गढे जा रहे हैं। कोई कह रहा है यह शरीयत के खिलाफ,कोई कह रहा है यह इस्लाम के मूल्यों के खिलाफ है, कोई कह रहा है स्त्री की गरिमा के खिलाफ है। जितनी मुंह उतनी बातें, वायरल वीडियो के आधार पर टीवी डिबेट की बहसें सब इसी पर आकर टिक चुकी हैं। कुकुरमुत्ते की तरह स्त्री के अधिकारों के रक्षक अपने-अपने मंतव्य प्रस्तुत कर रहे हैं।एक दृष्टि से देखें तो कहा जा सकता है कि किसी सार्वजनिक मंच से किसी महिला को उसके इजाज़त विरुद्ध ऐसा करना गलत है। लेकिन इस प्रकरण ने एक नई बहस को जन्म दिया है- वह प्रकरण है घूंघट और हिजाब का! 'हिजाब'जिसका अरबी में अर्थ पर्दा,सीमा, आड़ है। इस्लाम के आध्यात्मिक अर्थ में इसकी समग्र अवधारणा है। वहीं घूंघट की भी हिंदू धर्म में समग्र अवधारणा है जिसमें शील, मर्यादा और आचरण शामिल है। संभवतः इस प्रकार के परिधान प्रारंभ में जलवायु सेे से प्रभावित शरीर को ढकने को लेकर ही हुए होंगे। लेकिन बदलते वक्त में लोगों एवं धर्मों के फैलाव के कारण यह विश्व के अन्य हिस्सों में उसी रूप में पहुंचा । किंतु समय के साथ इसकी अनुपयोगिता स्त्रियों को समझ आने लगी तब इसे हटाने के लिए अलग-अलग जगह  आंदोलन भी हुए और इस पर बहसें भी हुईं। किंतु हालिया घटनाक्रम पर हाय-तौबा मचाने वालों की मानसिकता और संकीर्णता के बारे में क्या आपने कभी सोचा है जिसमें कट्टर धार्मिकता से भरे पुरुषसत्तावादी सोच हावी है, जिसमें महिलाओं को इस तरीके से कंडीशन कर दिया गया है कि उनके हिजाब में होना ही उनकी सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक है, उनके अधिकार एवं कर्तव्य हैं। जब उन्हीं महिलाओं के साथ शारीरिक- मानसिक हिंसा होता है, मौत के घाट उतार दिया जाता है तब ये लोग क्यों नहीं स्त्री की गरिमा और मर्यादा के लिए बाहर आते हैं ? तब इनकी कहां संवेदना और उनकी गरिमा खो जाती है । तब इनकी प्रगतिशीलता कहां मृत हो जाती है, हालांकि मैं इन सब चीजों के आधार पर किसी घटना को न्यायोचित नहीं ठहरा रहा हूं लेकिन फिर भी इस दोहरेपन को लेकर तो प्रश्न करूंगा ही? आज 21वीं सदी के भारत में यह विडंबना की ही बात है कि यहां पर हिजाब को बचाने को लेकर आंदोलन हो रहे हैं जबकि आप देखेंगे मिडल ईस्ट यूरोप एवं विश्व के अन्य देशों में महिलाएं कंडीशन से बाहर निकल रही हैं।  हिजाब जैसी प्रथाओं को दूर फेंकने की बात हो रही हैं और होती रही हैं, अरब स्प्रिंग से लेकर अन्य क्रांतियों में भी इसकी भूमिका रही है चाहे ईरान से लेकर सऊदी अरब तक। 
आप हिंदू धर्म में घूंघट प्रथा, पर्दा प्रथा को दूर करने की बात 
 बड़ी जोर-शोर से कहते हैं (समय-समय पर हिंदू धर्म ने प्रगतिगामी प्रथाओं का उन्मूलन भी  किया है चाहे वह किसी भी तरह हो जिसमें अपने आप में गलत चीजों को त्यागा है चाहे वह सती प्रथा हो, विवाद विच्छेद हो या अन्य रूढ़िवादी प्रथाएं जिनको दूर करने हेतु समय-समय पर आंदोलन होते रहते हैं )स्वयं को प्रगतिशील के रूप में घोषित करते हैं तो क्या इस्लाम में इस प्रथा का बहिष्कार अब नहीं होना चाहिए? क्या अब वक्त नहीं आ गया है कि इन सब प्रथाओं को दूर फेंकना चाहिए और महिलाओं को वास्तविक रूप में अपने जीवन के अधिकार एवं मूल्यों के लिए लड़ाई लड़नी चाहिए। यह इस तालिबानी सोच का प्रतीक है जिसके अंतर्गत महिलाओं को घर की चारदिवारी तक सीमित करने की बात कही जाती है अगर आप एक धर्म को लेकर दूसरा नज़रिया रखते हैं और दूसरे धर्म को लेकर दूसरा नज़रिया तो यह कुछ नहीं आपकी दोगली सोच और नीति है । आपको इस पर पुनर्विचार करना चाहिए? और अंतिम रूप से मैं कह देना चाहता हूं कि आज के 21वीं सदी के भारत में या पूरे विश्व में भी इस तरह के पहनावे और पोशाक की प्रथाएं वहां की जलवायु से निर्धारित होना चाहिए ना कि तथाकथित संस्कृति और परंपरा और धर्म से जोड़कर इसे देखना चाहिए। यह विडंबना की ही बात है कि दुनिया के एक भाग में इस परिधान को त्यागने की बात हो रही है और दुनिया के दूसरे भूभाग में इसको बनाए रखने के लिए आंदोलन हो रहे हैं। स्त्रियों को स्वयं इस पर चिंतन करना चाहिए कि मेरे पक्ष में क्या है? खासकर दक्षिण एशिया के देशों, मध्य-पूर्व के देशों में जहां सत्ता एवं धर्म जनता पर हावी है वहां पर समग्रता से इस बारे में हमें सोचना अनिवार्य है।निश्चित रूप से एक स्त्री या पुरुष का पोशाक देश काल के भौगोलिक परिवेश, धर्म -जाति- संस्कृति के प्रति तार्किक सोच, उसकी चिंतनशील दृष्टि और अंतःकरण की आवाज़ होनी चाहिए यह किसी प्रकार से समाज और मज़हब के कथित ठेकेदारों का सौदा नहीं होना चाहिए! भिन्न-भिन्न धर्म, जाति ,पंथ, समुदाय, नस्ल आदि- आदि पहचानों में बटें मानव समुदाय का पहनावा, खान -पान ,परिवेश पर उसका पहला और अंतिम फैसला होना चाहिए। यह प्रदर्शन, दिखावे और धर्म की दकियानूसी सोच से नहीं अंत: करण से प्रेरित होनी चाहिए।

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