क्या अब इस देश में महिलाओं के साथ बर्बरता न्यू नॉर्मल है?
इस देश में अब रोज ही किसी- न- मंदिर का उद्घाटन हो रहा है धर्म के नाम पर रोज ही उन्माद हो रहे हैं सांप्रदायिकता चरम पर है।इसी देश के सबसे गरीब राज्य में विश्व का सबसे बड़ा शिवलिंग खड़ा किया जा रहा है! नारी के नाम पर तरह-तरह के आयोजन किया जा रहे हैं लेकिन इसके बरक्स जो वस्तुस्थिति है महिलाओं की सुरक्षा को लेकर वह अभी हम सबके सामने है। आए दिन इस तरह की वीभत्स घटनाएं हम विभिन्न माध्यमों से देख रहे हैं कि किस तरह से सत्ता के संरक्षण में इस तरह के अपराधों को अंजाम दिया जा रहा है और विरोध करने वालों को या तो सलाखों के पीछे भेज दिया जा रहा है या उन्हें मार दिया जा रहा है।
राज्य बदल दीजिए, राजनीतिक दल बदल दीजिए, सरकार बदल दीजिए आज देश के किसी भी राज्य बंगाल से लेकर बिहार,उत्तर प्रदेश से लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों तक में भी में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं।
अभी हाल फिलहाल ही बिहार की राजधानी पटना एवं उसके बाद औरंगाबाद से नीट की तैयारी करने वाली छात्रा के साथ जिस प्रकार से बलात्कार एवं हत्या की बर्बरतापूर्ण कुकृत्य सामने आ रही है मन को सिहरा देने वाला है।
और उसके बाद पुलिस प्रशासन की लापरवाही एवं संवेदनहीनता और पोस्टमार्टम रिपोर्ट आए बिना आत्महत्या कहकर अपने दायित्वों से पल्ला झाड़ लेना एक तरह से सत्ता के प्रति संरक्षण एवं मिलीभगत को ही दर्शाता है।
किस उम्मीद पर गांव-कस्बे का निम्न - मध्यवर्गीय माता-पिता अपने संकीर्ण समाज से लड़ते हुए कर्ज - उधार लेकर अपनी अपनी पहली पीढ़ी की बेटी को सपनों का बस्ता कंधे पर लाद घर से दूर किसी शहर में भेजेगा! किसके भरोसे? क्या उस निकम्मी संवेदनहीन पुलिस के भरोसे जो यह स्वीकार भी नहीं कर रही है किस तरह ऐसी घृणतम घटनाओं को अंजाम दिया गया है! या उस नपुंसक हो चुकी प्रशासन के भरोसे! या कि उस धार्मिक उन्माद में लिप्त लोकतांत्रिक सरकार के भरोसे ? आखिर किसके भरोसे ?
मेरे जैसे लोग जब इन सब कुरीतियों, वीभत्स घटनाओं, सरकार की नाकामियों का विरोध करते हैं उनको भी डर रहता है की विरोध करने का अंजाम क्या होगा ? या मेरे लिखे भर देने से क्या सच में समाज में कुछ जागरुकता आएगी । अधिकतर लोगों द्वारा तो यूं ही ही छोड़ दिया जाता है, अरे यह तो ऐसे ही है कुछ भी लिख रहा है इग्नोर कर दिया जाता है ।इस 30 सेकंड के रील के चक्कर में!
और इस देश के लोगों का निकम्मापन यह भी है कि दुख, असमानता,शोषण का एहसास तभी होता है जब उनके खुद पर बीतता है तभी उन्हें अपने ऊपर शोषण तभी मालूम पड़ता है । हर कोई अपनी बारी का इंतजार करता है ठीक उसी कसाई खाने के मुर्गे की तरह जब तक उनकी बारी नहीं आती है तब तक वह कुछ नहीं बोलते और जब बारी आती है वह पक-पक की आवाज़ से छटपटाकर अंततः दम तोड़ देते हैं। इसलिए जब-तक हम संगठित रूप से लोकतांत्रिक तरीकों के माध्यम से ही जब तक सरकार पर दबाव नहीं बनाएंगे तो असंभव है की सुरक्षा की स्थितियां बेहतर हो! हर ऐसी दुर्घटना होने पर या यूं कहें सांस्थानिक हत्या होने पर कमेटी गठित की जाती है पीड़िता के परिवार को मुआवजे की घोषणा कर दी जाती है। और रोती हुई माता-पिता के साथ फोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया पर अपलोड कर न्याय का ढोंग एक अगले अन्याय के भरोसे छोड़ दिया जाता है,और हम इसे यूं ही न्यू नॉर्मल न्यूज मानकर अपने जीवन में व्यस्त हो जाते हैं एक और न्यू नॉर्मल न्यूज़ के इंतजार में!
लेकिन उसके बाद की जो स्थिति होती है कहां रिपोर्ट चला जाता है और कहां न्याय अदालती कागजातों और न्याय के कबूतरखानों में में भटक रहा होता है हम सभी जानते हैं !
बिहार में लगभग 20 वर्षों से एनडीए की सरकार है और केंद्र में तीसरी बार लेकिन फिर भी प्रधानमंत्री जंगल राज का जुमला कहकर जनता को मूर्ख बना दिए और वोट लेने के बाद बिहार किस गर्त में चला गया अब किसी को अब 5 वर्ष बाद ही पता लगेगा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जो खुद को सुशासन बाबू कहते हैं आए दिन इस तरह की हिंसा की घटनाएं लगातार घट रही हैं, लेकिन फिर भी जवाबदेही किसी के प्रति निर्धारित नहीं है। और जब कोई कहता है कि देश के संसाधनों एवं विभिन्न पदों पर सवर्णवादी लोगों का कब्जा है तो यही सवर्णवादी लोग मीम और ट्रॉल्स बनाते हैं! इन्हें शर्म तक नहीं आती है कि उनकी बहु बहु-बेटी है और गरीबों और दलितों की बहु बहु ,बहु
-बेटी नहीं है! मैं किसी समुदाय और किसी वर्ण के खिलाफ नहीं हूं लेकिन मैं उस अन्याय और सामंती सोच के खिलाफ हूं जिसे सत्ता में बैठे लोग अपने हित में दुरुपयोग कर रहे हैं।
~ Brijlala Rohan
#justice
#neetstudent
Ya bhat to bhat hai
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