पर्व त्यौहार में भी घर ना पहुंचने की पीड़ा
आज दीपावली है,
चारों तरफ शोर है, आतिशबाजियां हैं!
शहर इलेक्ट्रिक लाइटों के चका चौंध में घुप्प अंधेरा -सा दिख रहा है
लोग दीपावली का जश्न दिल खोलकर मना रहें हैं,
मगर मेरे दिल के अंदर एक गहरा सन्नाटा सा है! पिछली बार की तरह इस बार भी घर नहीं जा सका, सपनों के बोझ तले दिल्ली के किसी किराए के कमरे में अपने स्मार्टफोन के सोशल मीडिया पर चारों तरफ देखता हूं तो जश्न ही जश्न नज़र आता है।
अयोध्या में देखता हूं तो भगवान राम चंद्र जी के आगमन में दीये जलाने का विश्व रिकॉर्ड बन रहे हैं टूट रहे हैं, अपने शहर दिल्ली को देखता हूं तो सरकार की तरफ से पटाखे पर कथित ठोस सख्ती एवं प्रतिबंध के बावजूद दीपावली के दो दिन पहले से ही धूम- धड़ाका के आगे सरकार की नीतियां एवं अपील अपराधबोध लिए दीपावली के जश्न में मशगूल है !
फिर अपने घर की ओर देखता हूं देखता हूं,
मेरी मां ! मेरे किस्मत रूपी दीये जलने के इंतजार में खड़ी है!
पिताजी की आंखें वनवास लौटकर घर आने की प्रतीक्षा में पथराई जा रही हैं !
प्रेयसी को देखता हूं मंदिर की दीया जलाते हुए ईश्वर से प्रार्थना कर रही है "हे ईश्वर मेरी विरह रूपी अंधकार को मिलन रूपी प्रकाश से दूर कर दो , मेरे जीवन में भी खुशियां भर दो !
मां ! कहती रही बेटा कुछ दिन के लिए तो आ जाते , अब आए ही हो तो कुछ दिन ठहर भी जाते ! मैंने मन मारते हुए कहा~
" मां! इस बार छुट्टी नहीं है , बहुत सारा काम है, बहुत सारा पढ़ना है,
तेरा अफसर बेटा बनना है, बनना है, ना" !
मां आगे कुछ कह न सकीं, मेरी आंखें बहने से रह ना सकीं !
~बृजलाला रोहन "अन्वेषी"।
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