कहां नहीं है वर्ग संघर्ष .....!
"कहां नहीं है वर्ग संघर्ष"!!...
दुनिया हमेशा वर्गों में बंटी ही रही है, काल मार्क्स के अनुसार मानें तो दुनिया अमीर और गरीब या दूसरे शब्दों में कहें तो शोषक और शोषित वर्गों में बंटी हुई है, बिल्कुल सही है।
हालांकि यही केवल एक वर्ग नहीं है अपितु इसके अलावा भी कई वर्ग हैं अगर आप संजीदगी से देखना चाहें , तो हर जगह यह वर्ग आपको दिख जाएंगे। अकादमिक जगत में यह सच्चाई और क्रूर हो जाती है, जैसे-जैसे हम उच्च शिक्षा की तरफ आगे बढ़ते हैं वहां पर यह परिस्थिति अपने पूरे लाव-लश्कर ,ताने बाने के साथ दिखती है। एक स्थापित वर्ग जिसका प्राचीन काल से ही शिक्षा पर प्रभुत्व रहा है, जिसके अनुसार अन्य के लिए वहां जगह ही नहीं है वह तो भला मानो अंबेडकर साहब एवं अन्य समाज सुधारकों का जिनके सत्प्रयासों के कारण हम हौसले पाकर आज ऊंचे सपने भी देख रहे हैं और साथ ही साथ अपनी प्रतिभा और मेधा के बदौलत उसे प्राप्त भी कर रहे हैं। कॉलेज के विभिन्न डिपार्टमेंट से लेकर विभिन्न प्रकार की सोसाइटीज तक , साथ ही साथ प्रोफ़ेसर के जमात तक हर जगह ये चीज आपको आसानी से दिख जाएंगे।
कुछ गिने चुने लोग ही आपको वहां प्रभावशाली भूमिका में नजर आएंगे।(सभ्य एवं प्रौढ़ भाषा में इसे फेवरेटिज्म कहते हैं ) बाकी के अपेक्षित , वंचित वर्ग के विद्यार्थी गांव देहात से अपनी पहली पीढ़ी से अपनी लगन एवं प्रतिभा के बल पर गुलामी की जंजीरों को तोड़ कर जब इनके अभेद्य किले में प्रवेश करते हैं जाहिर सी बात है खलबली तो मचेगी ही ।
जो इनके अनुसार ढल जाएंगे, जी-हुजूरी करना सीख जाएंगे वह तो किसी तरह खप जाएंगे। लेकिन जो अपनी स्वाभिमान से समझौता नहीं करेंगे उनको ये लोग किसी भी तरह निकालने का हर वह प्रयास करेंगे। यह अकादमी दुनिया की अकाट्य सच्चाई है, इसी बात को कुछ लोग अपनी नियति मान कर अपने ज़बान पर ताला लगा देते हैं , वह अपनी हकों के लिए भी बोलना छोड़ देते हैं। यह कमजोरी को ही दिखाता है, अपने अधिकारों के लिए सभी को एक साथ आना जरुरी है क्योंकि *एक हैं तभी तो सेफ हैं*। अगर हम *विभिन्न- विभिन्न वर्गों में बटेंगे तो अपनी भागीदारी की दौड़ में छटेंगे ही*।यह उदाहरण दिखाता है कि विश्वविद्यालय में ज्ञान की गंगा कहां बहती है यह तो पता नहीं , लेकिन पॉलिटिक्स का गटर पूरे मलबे के साथ बह रही है ?
#वर्ग_संघर्ष _और_विद्यार्थी
#आपबीती
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