डॉ राजेंद्र प्रसाद का जीवन दर्शन और आज का भारत

राजेंद्र प्रसाद का जीवन दर्शन और आज का भारत

 “जो बात सिद्धांत में गलत है, वह बात व्यवहार में भी सही नहीं है”
उपर्युक्त कथन महान स्वतंत्रता सेनानी , महात्मा गांधी के सच्चे अनुयायी, भारतीय संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष ,विद्वान विधिवेत्ता ,भारतीय संस्कृति के प्रबल पैरोकार, दार्शनिक, शिक्षाविद एवं विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति ,प्रबल मेधा के धनी एवं कुशाग्र बुद्धि के धनी डॉ. राजेंद्र प्रसाद की है। उनका जीवन एवं दर्शन , सादगी पूर्ण जीवन मूल्य आज के भारत के नवनिर्माण में ज्यादा प्रासंगिक है। राष्ट्रपति पद पर रहते हुए भी अपनी संपूर्ण सादगी, ईमानदारी कर्तव्य निष्ठा के लिए हमेशा स्मरण किए जाएंगे। उपर्युक्त कथन की अगर विवेचना करें तो हम पाते हैं जो बात सिद्धांत में सही नहीं है, वह व्यवहार में भी सही नहीं हो सकती । यह ठीक महात्मा गांधी के उस साध्य एवं साधन के विचार को प्रमुखता से उद्घाटित करते हैं। अपने संपूर्ण जीवन में उन्होंने इसका बखूबी पालन किया है एवं अपने जीवन के मूल्यों से हम सभी भारत वासियों को प्रेरित किया है और आज भी उनके विचार हमारे लिए प्रेरणा के शब्द पूंजी हैं ।
आरंभिक जीवन परिचय एवं राष्ट्र निर्माण में डॉ. राजेंद्र प्रसाद की भूमिका
डॉ राजेंद्र प्रसाद की जीवन की शुरुवात होती है बिहार के सारण जिले के जीरादेई नामक ग्राम से जहां 3 दिसंबर 1884 ई. को उनका जन्म हुआ। उनके पिता मुंशी महादेव सहाय का सादगी पूर्ण एवं ईमानदार व्यक्तित्व का बालक राजेंद्र पर गहरा असर पड़ता है जो बाद के जीवन में भी साथ-ही- साथ राष्ट्र निर्माण में भी उनकी भूमिका प्रखर रुप से निखरकर आती है। माता के कारूणिक एवम संस्कार युक्त लालन -पालन का भी राजेंद्र की राजनीति पर गहरा प्रभाव परिलक्षित होता है। राजनीति में ईमानदारी एवं शुचिता का प्रभाव इनके गुणों में सर्वोपरि है। प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा एवं कुशाग्र बुद्धि के धनी डॉ राजेंद्र प्रसाद परीक्षाओं में अव्वल स्थान प्राप्त करते थे। गांव की शिक्षा समाप्त करने के बाद वे छपरा गए ,वहां से पटना जाकर मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। मेट्रिक परीक्षा में तत्कालीन बिहार ,उड़ीसा बंगाल इन तीनों राज्यों में इस परीक्षा में वे सर्वोच्च प्रदर्शन करते हुए प्रथम स्थान प्राप्त किए थे उनकी ख्याति राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर होने लगी थी। तत्पश्चात उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता चले गए वहां से उन्होंने mm इतिहास तथा llb की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की ।इसके बाद वे लंगट सिंह कॉलेज मुजफ्फरपुर में प्राध्यापक पद पर नियुक्त हुए बाद में वहां से भी इस्तीफा देकर कोलकाता के उच्च न्यायालय में वकालत करने चले गए ।फिर जब पटना में वर्ष 1916 में न्यायालय की स्थापना होती है वह वापस वकालत अपने प्रांत बिहार चले आते हैं। आरंभिक जीवन के शिक्षण यात्राओं का डा. राजेंद्र प्रसाद पर गहरा असर पड़ता है और बाद में चलकर वह राष्ट्र के प्रति पूरी तरह से समर्पित हो जाते हैं।
“ भव में नव वैभव प्राप्त कराने आया ,
नर नारी में ईश्वरता व्याप्त कराने आया
 संदेश वह स्वर्ग का नहीं अपितु भारतवर्ष को ही स्वर्ग बनाने आया”
यह पंक्तियां डॉ. प्रसाद के सम्मान में निश्चित रूप से ही सटीक बैठती हैं।
    आज के भारत के सफर यानी स्वाधीनता संग्राम में डॉ.राजेंद्र प्रसाद की भूमिका
  डॉ प्रसाद अपनी विद्यार्थी जीवन से ही राष्ट्र निर्माण में राष्ट्र भक्तों की भूमिका को करीब से देख रहे थे, किशोर राजेंद्र पर इसका गहरा असर पड़ता है आगे चलकर वह राष्ट्र के प्रति पूरी तरह से समर्पित हो जाते हैं। बचपन से ही वह भारत माता को परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़े हुए देखा था, अंग्रेजों के बर्बर शासन एवं अत्याचारी नियम- कानूनों से किस प्रकार भारत की दशा एवं दिशा दिन -प्रतिदिन नारकीय हो रही थी, इस चीज को उन्होंने गहराई से अनुभव किया । और तभी संकल्प लेते हैं कि वह राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका बढ़-चढ़कर निभाएंगे। 1905 के बंग भंग आंदोलन में उन्होंने सक्रिय रुप से भाग लिया तत्पश्चात 1906 के कांग्रेस अधिवेशन में एक स्वयंसेवक के रूप में भाग लिया। सन 1916 में लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में जिसमें चंपारण के ही किसान पंडित राजकुमार शुक्ल के निवेदन पर नील की खेती करने की विरुद्ध में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष शुरू करने में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का बढ़-चढ़कर साथ देते हैं जब महात्मा गांधी चंपारण पहुंचते हैं तो सत्याग्रह की शुरुआत से लेकर सत्याग्रह की सफल आयोजन तक महात्मा गांधी का न सिर्फ साथ देते हैं अपितु एक प्रहरी के रूप में अपनी भूमिका को निभाते हैं और अंततः चंपारण के नील के किसानों को तीन कठिया प्रथा से मुक्ति मिलती है जिसके आधार पर उन्हें बीघे के तीन कठे में नील की खेती करना अनिवार्य किया गया था उन्हें अब इस प्रथा से उन्हें मुक्ति होती है। इसके बाद भी महात्मा गांधी जी के साथ स्वाधीनता संग्राम में भूमिका निभाने हेतु साबरमती आश्रम चल जाते हैं ,गुजरात के खेड़ा सत्याग्रह में सरदार वल्लभ भाई पटेल के साथ भाग लेते हुए अनेक रचनात्मक कार्य को पूरा करते हैं । पुन: 1920 में असहयोग आंदोलन में भाग लेने हेतु अपनी चलती वकालत पर लात मार देते हैं, विद्यार्थियों में राष्ट्रीय भावना जागृत करने के लिए वे न सिर्फ उस समय प्रासंगिक थे अपितु अभी भी वह राष्ट्र निर्माण में युवाओं एवं नागरिकों की भूमिका को जागृत करने में प्रासंगिक हैं ।उन्होंने राष्ट्र प्रेम की भावना जागृत करने के लिए बिहार में सदाकद आश्रम की स्थापना करते हैं ,वहां के प्राचार्य का पद भार संभालते हैं। डॉ प्रसाद रौलेक्ट एक्ट एवं जालियां वाला बाग हत्याकांड के विरुद्ध में जमकर विरोध करते हैं ।वर्ष 1921 ई. में प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आगमन पर बिहार में विरोध शुरू करने का अहम प्रयास शानदार तरीके सिंह करते हैं । 10 मार्च को विधानसभा में जाकर इसके खिलाफ आवाज भी उठाते हैं , गांधी जी के रचनात्मक कार्य चरखा कातना ,खादी का प्रचार, ग्राम स्वराज की अलख को जगाना आज की सरकार जो स्वदेशी सी आत्मनिर्भर भारत का संकल्प देख रही है जिसमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद के कृतकृत संकल्प का महत्वपूर्ण योगदान है उन्होंने मद्य निषेध , अस्पृश्यता निवारण हिंदू मुस्लिम एकता को आगे बढा़ने में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अपने कुशल नेतृत्व एवं शुचितापूर्ण आचरण से संविधान सभा का संचालन
  संविधान सभा का सफल संचालन एवं विश्व के सबसे बड़े लिखित संविधान को बनाने में अध्यक्ष के रुप में अहम भूमिका_ डॉ राजेंद्र प्रसाद भारत संविधान सभा के प्रथम स्थायी अध्यक्ष के रुप में नियुक्त हुए तथा संविधान के बनने तक वे अध्यक्ष के रुप में संविधान सभा का सफल, निष्पक्ष पारदर्शी एवं संपूर्ण विधि-विधान सभा का संचालन करते हैं, यद्यपि वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य थे फिर भी वह सभा के सभी सदस्यों को अपनी मतों -विचारों ख्यालों को रखने का ,उन्हें अभिव्यक्त करने का भरपूर मौका देते थे। दलगत राजनीति से परे होकर अपनी शुचिता, सादगी एवं कुशल नेतृत्व शक्ति का उदाहरण पेश करते हुए विश्व के सबसे बड़े लिखित संविधान को बनाने में अपनी भूमिका निर्वहन करते हैं । डॉ राजेंद्र प्रसाद सभी दलों में लोकप्रिय थे वे अपनी सादगी पूर्ण व्यक्तित्व एवं स्पष्टवादी रूख के लिए हमेशा याद किए जाएंगे।
  साहित्य एवं संस्कृति के माध्यम से आज के भारत के नवनिर्माण में डॉ. राजेंद्र प्रसाद कि भूमिका स्मरणीय रही है। भारतीय संस्कृति की विभिन्न पहलुओं को अपनी आत्मकथा तथा भारत के विभाजन के संबंध में लिखे हुए अपने पुस्तक डिवाइडेड इंडिया में प्रमुखता से उठाते हैं ।हिंदी भाषा एवं साहित्य की रक्षा करने हेतु वे बिहार में ,बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना भी करते हैं जिसके माध्यम से राष्ट्रवादी साहित्यकारों को एक मंच मिलता है और इसमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद बढ़-चढ़कर हिस्सा भी लेते हैं ।अनेक लेख ,पत्र -पत्रिकाओं के माध्यम से विचार रखते हुए वे अपनी राष्ट्रीय संस्कृति एवं भाषा के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।
विकसित भारत के निर्माण में डॉ राजेंद्र प्रसाद के विचारों की प्रासंगिकता
  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों में कहें तो “हमारे राष्ट्र पुरुष ही हमारे राष्ट्र निर्माण के प्रेरणा स्वरुप हैं”
आजादी के हमने 75 वर्ष प्राप्त कर लिए हैं , इन 75 वर्षों में हमने अभूतपूर्व प्रगति हासिल की है ।अंतरिक्ष से लेकर जल-थल – नभ तक सामाजिक, आर्थिक ,राजनीतिक, आध्यात्मिक ,सांस्कृतिक उत्थान की और अग्रसर हैं। वैश्विक मंच पर भी हमने विश्व बंधुत्व की संकल्पना को साकार किया है जो डॉ .प्रसाद के जीवन दर्शन से एक प्रमुख शिक्षा के रूप में प्रस्तुत है, किस प्रकार हमारी संस्कृति ही हमारी सभ्यता एवं विकास की चरम बिंदु है। आगामी 25 वर्षों में राष्ट्र निर्माण हेतु डॉ राजेंद्र प्रसाद के विचार अनुकरणीय है क्योंकि हम अपनी शिक्षण एवं संस्कृति के माध्यम से ही विकास को प्राप्त कर सकते हैं।
आज का भारत: डॉ. राजेंद्र प्रसाद के मूल्य पर आधारित
आज का भारत बहुत बदल चुका है। आर्थिक दृष्टिकोण से यह देश तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन समाज में कई पुराने और नए समस्याएं भी हैं। डॉ. राजेंद्र प्रसाद के जीवन दर्शन के आलोक में आज के भारत पर कुछ गहरे विचार किए जा सकते हैं:
1. समाज में असमानता और एकता का संकट को आपसी सद्भाव से दूर करना _ आज का भारत जातिवाद, धर्मवाद और क्षेत्रवाद के कारण अनेक सामाजिक असमानताओं का सामना कर रहा है। राजेंद्र प्रसाद ने हमेशा भारतीय समाज की एकता को बनाए रखने की बात की थी, और उनका यह दर्शन आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। उनका मानना था कि किसी भी समाज की ताकत उसकी एकता में निहित है। हालांकि आज भारत में एकता और समानता की दिशा में कई प्रयास हो रहे हैं, फिर भी इन असमानताओं को समाप्त करना बड़ी चुनौती है। हमें उनके जीवन के सिद्धांतों को अपनाकर एकजुट समाज की ओर बढ़ने की आवश्यकता है।
2. भौतिकवाद का एकात्म मानववाद से संरक्षण एवंसंकल्पना _ डॉ. राजेंद्र प्रसाद के समय में भारतीय समाज में सादगी और संयम के मूल्य अत्यधिक महत्वपूर्ण थे। आज के समय में भौतिकवाद और उपभोक्तावाद तेजी से बढ़ रहे हैं, जिससे सामाजिक मूल्यों पर संकट उत्पन्न हो रहा है। भारत में अधिकांश लोग भौतिक सुख-सुविधाओं की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जबकि राजेंद्र प्रसाद का विश्वास था कि व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। उनका यह दर्शन आज भी हमें यह याद दिलाता है कि केवल भौतिक सम्पत्ति और बाहरी सुखों के पीछे भागने से जीवन का उद्देश्य पूरा नहीं होता।
3. शिक्षा सही संदर्भ में प्रयोग _डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने हमेशा शिक्षा को सामाजिक उत्थान का प्रमुख साधन माना। आज के भारत में शिक्षा की गुणवत्ता में भारी विषमताएँ हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में शिक्षा के स्तर में बड़ा अंतर है। शिक्षा का असमान वितरण और उसकी गुणवत्ता पर ध्यान न देना आज की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद का यह दर्शन हमें यह सिखाता है कि शिक्षा समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचनी चाहिए, और इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
4. समाजवाद और न्याय पुनर्स्थापना _डॉ. राजेंद्र प्रसाद के समाजवादी विचारों को आज के भारत में लागू करने की आवश्यकता है। हालांकि हमारे देश में कई योजनाओं के माध्यम से समाज के पिछड़े वर्गों के लिए मदद दी जा रही है, फिर भी एक आदर्श समाजवाद के मार्ग पर चलने की बहुत गुंजाइश है। उनका जीवन दर्शन हमें यह सिखाता है कि समाज में हर व्यक्ति को समान अवसर और अधिकार मिलना चाहिए।
5. राष्ट्र निर्माण का दृष्टिकोण: आज का भारत कई आंतरिक और बाहरी समस्याओं का सामना कर रहा है। फिर भी, यह आर्थिक रूप से प्रगति कर रहा है और वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बना रहा है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद का विश्वास था कि राष्ट्र निर्माण केवल राजनीति से नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक द्वारा अपने कर्तव्यों का पालन करने से संभव है। उनकी यह बात आज भी हमें प्रेरित करती है कि भारत को सशक्त बनाने के लिए प्रत्येक नागरिक को अपनी भूमिका निभानी होगी, चाहे वह शिक्षा, सामाजिक सेवा, या राष्ट्रहित में योगदान देने के रूप में हो।
निष्कर्ष:
उपर्युक्त विवरण से प्राप्त होता है कि डॉ राजेंद्र प्रसाद का जीवन अपने आप में भारतीय संदर्भ में राष्ट्रवाद की अलख जगाने एवं आज के भारत को दिशा एवं दशा बदलने हेतु प्रेरक भी हैं और प्रगतिशील भी
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जीवन दर्शन एक गहरी सोच और भारतीय समाज के प्रति अनुग्रहित दृष्टिकोण का परिणाम था। उनका जीवन एक आदर्श था, जो न केवल आज के भारत के लिए, बल्कि भविष्य के भारत के निर्माण के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनकी शिक्षा, सादगी, राष्ट्रीयता और समाजवाद के सिद्धांतों को अपनाकर हम एक सशक्त और समृद्ध भारत की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। उनका यह संदेश आज भी हमें यह सिखाता है कि वास्तविक विकास केवल भौतिक उन्नति में नहीं, बल्कि समाज के नैतिक और सामाजिक उत्थान में निहित है।
“जिसने राष्ट्र की गरिमा को आगे बढ़ाया ,
सभ्यता संस्कृति का पाठ पढ़ाया ,
जिसने अपने सादगी पूर्ण आचरण से जीवन के हर क्षेत्र में उपस्थित किया एक नया प्रतिमान
 ऐसे हमारे नेता थे डॉ. राजेंद्र प्रसाद”
 अन्वेषी
 संदर्भ सूची
1. आत्मकथा_ डॉ राजेंद्र प्रसाद
2. इंडिया डिवाइडेड_ डॉ राजेंद्र प्रसाद
3. “संविधान” सीरीज संसद टीवी
4. चंपारण सत्याग्रह दस्तावेज़
5. विश्व प्रसिद्ध व्यक्तित्व ‘ डा. राजेंद्र प्रसाद’ डॉ भारती खुबालकर

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