छठ महापर्व की सुमधुर स्मृतियां ( भाग २) द्वितीय दिवस खरना

छठ महापर्व का दूसरा दिन, कार्तिक मास शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि। 
 छठ महापर्व के दूसरे दिन को *'खरना'* के रूप में जानते हैं ; इस दिन व्रतिगण पूरे दिन उपवास करके संध्या पहर से आम के दतवन से दांतुन कर तत्पश्चात स्नान कर मिट्टी के चूल्हे पर गन्ने से गुड़ बनाने में प्रयुक्त ईख के बचे हुए अवशेष जिसे स्थानीय भाषा में 'चेपुआ' भी कहते हैं, एवं आम की लकड़ी का जलावन के रूप में उपयोग कर पीतल की हांडी में नये अन्न, अर्थात खेतों से पककर तैयार धान से चावल, गाय के दूध एवं गुड़ का पवित्र प्रसाद *'खीर'* बनता है । छठ व्रतिगण पूरे सात्विकता से भगवान भास्कर एवं छठ माई को स्मरण करते हुए अचवन देकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। तत्पश्चात परिवार के अन्य सदस्य सहित आसपास के लोगों को प्रसाद वितरित किया जाता है। इस दिन सुबह से ही गांव में जिनके यहां छठ महाव्रत हो रहा होता है घूम घूम कर दूध इकठ्ठा करते हैं, गांव में जिनके जिनके यहां भी दुधारु गाय होती है वह इस दिन दूध ग्रहण नहीं करते हैं। ग्वाले दूध दुहकर वह उन छठ व्रत धारियों के यहां प्रसाद हेतु श्रद्धा भाव से वितरित कर देते हैं। मेरे निजी अनुभव भी इससे जुड़े हुए हैं, मेरे यहां भी जब पिताजी थे , गाय होती थी तो लोग आते थे और पिताजी सभी में समान रूप से दूध वितरित करते थे। मैंने बचपन में इसे करीब से देखा है। हालांकि मेरे यहां भी व्रत हो रहा होता था फिर भी परस्पर एक -दूसरे के सहयोग से ही इस महापर्व को संपन्न किया जाता है, यही इसकी प्रमुख विशेषताओं में से एक है। आज मनुष्य लोभ -लिप्सा एवं अंध- उपभोक्तावादी रवैया के कारण दिन प्रतिदिन संकीर्ण होते जा रहा है ऐसे में छठ महापर्व हमें परस्पर सहयोग पर आधारित सद्भावनापूर्ण सर्व- समावेशी समाज बनाने की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है।

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