नक्सलवाद की समस्या और इसका समाधान ?

#नक्सल#Naxalite#नक्सलवाद#उद्भ्रांत
' नक्सलवाद ' इस शब्द से कौन अनभिज्ञ हो सकता है? यदा- कदा ही हम टीवी,अखबारों एवं सोशल मीडिया के माध्यम से यह सुनते, देखते एवं पढ़ते हैं कि किस प्रकार से पश्चिम बंगाल, झारखंड ,छत्तीसगढ़, तेलंगाना आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र के कुछ भागों में किस प्रकार से भारतीय जवानों एवं नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुए,इतने लोग घायल हुए इतने लोगों की जान चली गई इतने सैनिक हमारे शहीद हुए। 70 के दशक में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी जिले से शुरू हुआ यह आंदोलन किस प्रकार से आज भी अखिल भारतीय स्तर पर भारत सरकार एवं भारतीय सैनिकों एवं स्थानीय पुलिस के लिए सर दर्द बना हुआ है ? आखिर क्या कारण है की भारत के कुछ भागों में आज भी कथित जल, जंगल ,जमीन के बैनर तले अपने ही देश के सैनिकों को लोग मार रहे हैं और सेना भी उन लोगों को अपना दुश्मन समझ कर अपना कर्तव्य निभा रही है । 
इसमें कई अबोध एवं 
निर्दोष लोग भी किसी-न-किसी प्रकार आज भी पीस रहे हैं और कुछ लोग जो इनकी आड़ में अपना हित साथ रहे हैं , यह किस प्रकार से भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सवालिया निशान के रूप में बना हुआ है ?
प्रस्तुत उपन्यास ' *नक्सल* ' में लेखक *उद्भ्रांत* ने इन्हीं सब बिंदुओं को आधार बनाकर परत -दर-परत इन प्रश्नों को संबोधित करने का प्रयास किया है? उपन्यास का नायक *बद्रीनाथ* शिक्षा प्राप्त कर रोजगार की तलाश में भटकता है, उसे नौकरी नहीं मिलती ऊपर से व्यवस्था की मार से उनके पिताजी की पेंशन भी रुक जाती है। बाद में अपने ही न्यायोचित काम के लिए उसे ऊपर से पैसे देने पड़ते हैं इस परिस्थिति में उसका दोस्त *सुरेश* जो की कई सालों से रहस्यमय तरीके से कोलकाता में नक्सली गिरोह के संपर्क में आता है और किस प्रकार से उसका माइंड वाश किया जाता है, बद्रीनाथ उनके संपर्क में आते हैं और वह भी धीरे-धीरे देश की समस्याओं से त्रस्त होकर नक्सलवाद की तरफ रुख कर लेते हैं। 
मिज़ाज़ से शायर एवं कवि बद्रीनाथ साहित्यिक तरीके से लेख एवं कविताएं लिखकर इस मिलिशिया को आगे बढ़ाने में अपनी सेवा देते हैं। बाद में इस संगठन को अधिक जानने के लिए अपने बचपन के दोस्त *श्यामवीर* जो कि अब भारतीय सिविल सेवा में आईपीएस के पद पर तैनात हो गया है छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले में, उनके पास जाते हैं एवं करीब से देखते हैं नक्सलवाद के स्वरूप को ,
वे जानते हैं कि किस प्रकार से अखिल भारतीय स्तर पर इसका पदानुक्रम बना हुआ है जिसकी उनको बिल्कुल खबर नहीं थी ।वे जानते हैं कि किस प्रकार से इनका लक्ष्य राष्ट्रपति भवन एवं संसद भवन पर कब्जा कर अपना शासन चलाने का है , वह इसके लिए अपनी समान्तर सरकार भी चला रहे होते हैं।वह देखते हैं कि गिरोह के कमांडर के बच्चे, विदेश में पढ़ाई कर रहे होते हैं एवं उन भोले -भाले मासूम आदिवासियों को किस प्रकार से अपनी मिलिशिया में शामिल करने के लिए उनका शोषण किया जाता है। कहानी का अंत दुखात्मक होता है और *नक्सलवाद जिसमें आप अपनी मर्जी से तो शामिल हो सकते हैं लेकिन आप अपनी मर्जी से बाहर नहीं निकाल सकते हैं* इस घटना पर उपन्यास का अंत होता है । इसमें नायक का बचपन में क्रिकेट के प्रति प्रेम भी उजागर होता है एवं इसके साथ-साथ ,प्रेम की एक टीस भी है जिसमें बद्रीनाथ बचपन में क्रिकेट खेल रहे होते हैं और और छत पर गुलाबी रिबन वाली लड़की को देखते हैं और धीरे-धीरे प्रेम की बीज अंकुरित होती है उनके दिल में , परंतु वक्त की तीखी धूप में वह पौधे का रूप नहीं ले पाती है ,कहानी अधूरी रह जाती है! उपन्यास नक्सलवाद के इर्द-गिर्द घूमती है और हम यह जान पाते हैं कि नक्सलवाद का असली स्वरूप क्या है? इस दृष्टि से यह उपन्यास बेहद ही प्रासंगिक एवं पठनीय है ।आप सभी को इस उपन्यास को जरूर पढ़नी चाहिए ।जयशंकर प्रसाद के नाटकों एवं कविगुरु रवीन्द्र नाथ टैगोर के गद्य की तरह इसमें बीच-बीच में कुछ कविताएं भी हैं जो हमारे मन मस्तिष्क को प्रभावित करती हैं एवं उपन्यास की गति को आगे बढ़ाती है। लेखक ने हमारे सही सवालों को संबोधित करते हुए हमें लोकतांत्रिक तरीके से ही उन अधिकारों को पाने की आवश्यकता पर बल प्रदान करते हैं तभी हम इस समस्या को समूल समाधान पाकर भारतीय संविधान के अनुसार अपनी शासन पद्धति को चला सकते हैं।
https://youtu.be/MeUPLxEvz2A?si=_ko6RyevKF9JWosQ

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