गांधी भारतीय राजनीति में तो कब के अप्रासंगिक हो चुके हैं,पर वे आज भी पॉलिटिक्स के पावर हाउस हैं
आज 2 अक्टूबर है, मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म दिवस!आज न तो मैं गांधी की प्रासंगिकता पर बात करूंगा और नहीं गांधी के मूल्यों पर क्योंकि गांधी की प्रासंगिकता उसी दिन खत्म हो गई थी जिस दिन देश का विभाजन हुआ या यूं कहें की भारत छोड़ो आंदोलन के बाद क्रिप्स मिशन, कैबिनेट मिशन के आगमन, सांप्रदायिक तत्वों का मुखरता से उभार और बंटवारे की सुगबुगाहट जैसे-जैसे बढ़ने लगी धीरे-धीरे उनकी प्रासंगिकता समाप्त होने लगी और एक सिरफिरे के नृशंसता ने उस जर्जर देह को भी समाप्त कर दिया! बाद में जो शेष बच गईं वह उनकी वैचारिकी है जिसे उनके अनुयायियों ने 'गांधीवादी मूल्य' का नाम दिया!
भोजपुरी का एक मशहूर डायलॉग है "पावर ऐहिजे से शुरू होला,ऐहीजे से खतम होई, पावर दोसर केहू कहां से ले ली" महात्मा गांधी के बारे में आधुनिक भारतीय राजनीति में यह बिल्कुल सटीक बैठता है। 'गांधी' आधुनिक भारतीय राजनीति के 'पावर हाउस' हैं, इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। कितनेे लोग आएंगे, कितनेे लोग जाएंगे वे गांंधी थोड़े ही बन जाएंगे। संपूर्ण भारत से लेकर पूरे विश्व भर में विभिन्न भाषाओं में जितना गांधी पर लिखा गया उतना शायद ही किसी आधुनिक व्यक्तित्व पर लिखा गया। नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर किंग जूनिय,रचार्ली चैपलिन, अल्बर्ट आइंस्टीन से लेकर अनेक नाम जो गांधी के समकालीन से लेकर अब तक प्रभावित और प्रकाशित होता रहा है।
चाहे आप उनका समर्थन करें चाहे आप विरोध करें लेकिन आप उन्हें इग्नोर नहीं कर सकते। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के प्रथम चरण को छोड़ दें ( जब तक उनका आगमन भारतीय राजनीति में नहीं हुआ था) वह व्यक्तिगत रूप से नहीं लड़े उन्होंने उस व्यवस्था से लड़ाई ठानी जो शोषण,दमन और जुल्म पर आधारित थी । भारतीय स्वाधीनता संग्राम में चंपारण सत्याग्रह से लेकर भारतीय स्वाधीनता प्राप्ति तक जिन-जिन लोगों ने गांधी से मिले वह उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके हालांकि बाद में लोगों के वैचारिक मतभेद जरूर हुए क्योंकि गांधी के उद्देश्य सीमित और संकीर्ण नहीं थे। उनकी आजादी शासन करने वालों से मुक्ति नहीं थी अपितु शासन करने वाली उस विचार से मुक्ति थी जिसे हम मानवता और गांधीवादिता कह सकते हैं। गांधी को केवल आजादी तक समेटना कुछ इस प्रकार होगा की जल को केवल पीने तक समेटना ।
हिंदी के एक वरिष्ठ अध्यापक के शब्दों में कहें तो राजनीति ने उनके हर सामान को बेचा किसी ने चश्मे को बेचा, किसी ने धोती को,किसी ने घड़ी को ,किसी ने चरखे को, किसी ने सूत को तो किसी ने पर्स को तो किसी ने पुस्तक को, किसी ने उनकी फोटो को किसी ने उनकी प्रतिमा को!
उनकी बातों को आगे बढ़ते हुए कहूं तो बहुत लोगों ने उनके विचारों को भी बेचा लेकिन दुर्भाग्य कि उसका मुफ्त में भीकोई खरीददार न मिला।
आज आज की युवा पीढ़ी को जिसे तथा कथित 'जेन जी' कह सकते हैं गांधी की प्रतिमा को तोड़ना, फोटो जालना, मीम बना देना, गंदी तस्वीर दिखाना और भारत की हर समस्या का कारण ठहरा देना और इस वर्ष विजयादशमी और गांधी जयंती एक ही दिन पड़ रहा है तो नीचिता की पराकाष्ठा को पार करते हुए टुच्ची मानसिकता से रावण से तुलना कर देना और चार गंदी गालियां देना कितना कूल है। और ये सभी ज्ञानवर्धक जानकारियां विश्व के प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी व्हाट्सएप एवं फेसबुक यूनिवर्सिटी से अति शोध पूर्ण अध्ययन की महानतम उपज है।
आज देश का ताना-बाना भी कुछ इस प्रकार हो गया है कि ग से 'गांधी' और ग से 'गाली' दोनों एक ही साथ आते हैं और यह ग से गंदी जुबान और ग से गंदी संस्कार का ही परिचायक है ।
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