विजयादशमी एवं रावण वध के मायने


आज फिर हम हर वर्ष की भांति जब हम विजयादशमी के शुभ अवसर पर रावण के पुतले का दहन करेंगे, तब मेरे मन में कई सवाल उत्पन्न होते हैं

 1.पहला सवाल व्यक्तिगत स्तर पर क्या हम हर वर्ष अपने अंदर के रावणत्व का थोड़ा बहुत भी दहन कर पाते हैं, हमारे अंदर लोभ, ईर्ष्या, घृणा, नफरत प्रतिशोध, किसी के प्रति मनसा -वाचा- कर्मणा हिंसक प्रवृत्ति को क्या हम दहन कर पाते हैं?

2. दूसरा सवाल सामाजिक स्तर की है आज भी हमारे समाज में असमानता किसी ने किसी रूप में धर्म ,भाषा, क्षेत्र, भाषा, लिंग आदि आदि के आधार पर विद्वेष एवं भेदभाव बरकरार है ! इसीके साथ-साथ चाहे वह अमीर गरीब के बीच की खाई हो या दलित और सवर्ण के बीच की ऐतिहासिक गहराई क्या हम उसको पाटने में अपना कुछ योगदान दे पाए हैं, ऐसी भेदभावपूर्ण एवं नकारात्मक प्रवृत्ति का दहन कर पाए हैं?

3. और तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण बात राष्ट्र के स्तर पर बेरोजगारी ,अशिक्षा, महंगाई, भ्रष्टाचार, चाटुकारितारूपी रावण हर शैक्षणिक संस्थान से लेकर सरकारी कार्यालय तक अपना आतंक फैलाए हुए है! क्या हम इस रावण को दहन कर पाए हैं ? क्या इसके लिए सकारात्मक प्रयास कर पा रहे हैं जिससे सभी को सामाजिक न्याय सुनिश्चित हो?

4. आज पूरा विश्व अशांति के सागर के किनारे खड़ा दिखाई दे रहा है, मानवता आज त्राहि त्राहि कर रहा है। विश्व में आज जैविक - रासायनिक -भौतिक  इतने विध्वंसक अस्त्र शस्त्र बन चुके हैं कि विश्व के किसी भूभाग से किसी भी भूभाग को चंद मिनटों में नष्ट किया जा सकता है ! चाहे रूस और यूक्रेन के बीच का युद्ध हो, या इसराइल ,हमास ,हिज्बुल्लाह ,फिलिस्तीन,हूती , ईरान के बीच का संघर्ष हो, एशिया में चीन की विस्तारवादी नीति हो या  उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग की सनक ! ऊपर से पूरे विश्व के रणनीतिक एवं व्यापारिक बाजार पर अमेरिका का प्रभुत्व यह सभी हमें इस और इशारा करते हैं कि हमें रावणत्व रूपी अवांछित शक्ति को पनपने से रोकने की परम आवश्यकता है।

5. पांचवा जोकि पूरे सृष्टि के संतुलन के लिए आवश्यक बिंदु पर्यावरणीय बिंदु है। मानव की अंध उपभोक्तावादी रवैये के कारण आज मानव सहित पूरे जीव-जंतु एवं वनस्पति समुदाय का अस्तित्व संकट में है । महात्मा गांधी के शब्दों में कहें तो "प्रकृति के पास हमारे पेट भरने के लिए बहुत कुछ है मगर पेटी भरने केलए नहीं" ! अतः इस महत्वाकांक्षा रूपी रावण का भी अंत करना आवश्यक है। ताकि हम अपनी हक का खा सकें, और दूसरों की हक का हम उन्हें खुशी खुशी दे पाएं।

अतः इन सभी के प्रति भी हमें न सिर्फ जागरूक होने की आवश्यकता है अपितु हमें पग पग कदम बढ़ाने की आवश्यकता है। आज मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्रजी के रावण पर विजय का दिन है, इसे हम विजयादशमी के रूप में जानते हैं। यह बुराई पर अच्छाई की, असत्य पर सत्य की, अधर्म पर धर्म की जीत है। यह जीत है अपने अधिकार पाने की सतत लड़ाई में आगे बढ़ने की, यह जीत है अपने मर्यादित आचरण द्वारा युद्ध क्षेत्र में भी शुचिता प्रस्तुत करने की। आइए इस विजयादशमी के शुभ अवसर पर अपने अंतःकरण में बैठे रावण का अंत करते हैं। आओ दुनिया में भगवान श्री रामचंद्र जी के पथ चलते हुए अधर्म का नाश एवं धर्म की विजय यात्रा आगे बढ़ाते हुए, सृष्टि को सुंदर बनाते हैं। समाज में सच्चाई एवं अच्छाई को  फैलाते हैं।


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