नज़रिया
नज़रिया अर्थात हमारा दृष्टिकोण इसे हम अपने जीवन का अहम सरोकार कहें तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।ये हमें अपने घर ,परिवार और समाज से ही मिलती है जिनके जरिये ही हमारे व्यक्तिव का निर्माण होता है । किसी भी सभ्य समाज के निर्माण में हमारे व्यक्तित्व का परिष्कृत होना अपरिहार्य है।
इसमें कोई दो राय नहीं की हमारे देखने के नज़रिये पर ही हमारी नियति भी निर्धारित होती है ।इसको अभिव्यक्त करने वाली एक लघु- कथा कुछ इस प्रकार है --
एक बार की बात है एक माँ अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने बस स्टाॅप ला रही होती है तभी रास्ते में बच्चे को कचरा ( प्लास्टिक की बोतलें , कबाड़ी का समान )बिनने वाला फटे- पुराने कपड़ों में पसीने से लथपथ एक युवक दिखता है ।बालक जिज्ञासावश माँ से पूछ बैठता है ,माँ ! ये कचरा क्यों उठा रहा है ? माँ इसपर बच्चे से कहती है , इसीलिए तुझसे कहती हूँ कि पढ़ाई कर लिया करो ।देखो अगर तुम ढंग से पढ़ाई नहीं करोगे तो कल इसके जगह तुम भी हो सकते हो !
वहीं सड़क के दूसरी तरफ से भी एक माँ अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने बस स्टाॅप पर आ रही होती है तभी माँ की नज़र संयोगवश उसी कचरे बिनने वाले पर पड़ती है ।माँ अपने बच्चे को उस कचरे बिनने वाले की ओर इशारा करते हुए कहती है , बेटे ! इसीलिए तुझसे कहती हूँ कि तुम भी अच्छे से पढ़ाई कर लिया करो । तुम अच्छे से पढ़- लिख लोगे तभी तो कल को इन जैसे असहाय लोगों की मदद कर पाओगे । कई लोगों को इस स्थिति से उबार सकोगे जिनके बच्चे आज भी स्कूल नहीं जा पाते ।
ऊपर के प्रसंग में आपको नजरिए का फर्क साफ दिख रहा है ।
ये कहानी दो माँ और उनके बच्चे की कहानी नहीं बल्कि आपकी और हमारी ,हमसब की कहानी है । हम भी अपनी संकुचित मानसिकता के कारण खुद तक ही सिमट के रह जाते हैं जो हमारे समाज के संवेदनहीनता को दर्शाती है । ये कहानी न सिर्फ नज़रिये के फर्क को बतलाती है अपितु हमारे संस्कारों और हमारे द्वारा अपने बच्चों को खुद तक सिमटकर रह जाने वाले विचार तक सीमित कर देती है । वहीं दूसरी माँ जो अपने बच्चे को मूल्यपरक शिक्षा देती है और उसके नज़रिये को बचपन से ही परिष्कृत करती है । ऐसे लोग भी हैं हमारे पास लेकिन अफसोस इस बात का है कि ये दुर्लभतम हैं।
अत: हमें भी अपने नज़रिये ,अपने दृष्टिकोण को परिष्कृत करना निहायत जरूरी है ताकि हम अपनी सभ्य समाज निर्माण के नींव को बरकरार रखें । राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त ने ठीक ही कहा है -
" यही पशु- प्रवृति है की आप- आप ही चरे !
वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे ।।"
सच ही है केवल अपने बारे में खुद के निजहित के बारे में तो पशु भी सोचता है हम फिर भी तो मनुष्य हैं ।अगर हम भी खुद तक ही सिमटकर रह जायें तो हममें और पशु में क्या अंतर रह जाएगी ?
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