विज्ञान सर्वत्र पूज्यते
" तरकीब से ही शुरुआत होती है तकनीक का नवाचार।
मानवता हित में ही निहित है विज्ञान का सर्वत्र जय- जयकार।।"
विज्ञान सर्वत्र पूज्यते अर्थात विज्ञान सभी जगह पूजी जाती है , सच है विज्ञान किसी भौगोलिक सीमाओं में आबद्ध नहीं है ।यह किसी देश की सीमा में न बंधकर संपूर्ण विश्व में पूजनीय है ,वंदनीय है।
ऐसा सुव्यवस्थित ज्ञान जो विश्वास और निष्ठा से परे प्रयोग और उससे प्राप्त निष्कर्ष पर आधारित है। जो नित नये नवाचारों और आविष्कारों के प्रति प्रतिबद्ध है जिससे की मानव जीवन सुगम और सुलभ बने ।इस सार्वत्रिक ज्ञान के सहारे इंसान असंभव- सा दिखने वाले काम को संभव कर दिखाया है । राष्ट्र कवि दिनकर ठीक ही कहते हैं "मानव जब जोर लगाता है पत्थर पानी बन जाता है " जो विज्ञान के संदर्भ में शत्- प्रतिशत खरा उतरन है ।
अपरिमित अंतरिक्ष से लेकर सागर की अथाह गहराइयों तक , निर्जन मरूस्थल से लेकर पर्वत की ऊँची- ऊँची चोटियों को मानवों विज्ञान आधारित तकनीक से बौना साबित कर दिया है ।
विज्ञान आधारित ज्ञान का उपयोग कई रहस्मयी और रोमांचकारी तथ्यों को प्रमाणित कर नाना प्रकार के अनसुलझी पहेलियों को सुलझाने हेतू पूरी उत्सुकता से किया गया है। विज्ञान इस दिशा में सतत् प्रयत्नशील भी है । निस्संदेह विज्ञान के नित नये नवाचार ने पृथ्वी पर जीवन को आसान बनाया है ।इसने समय एवं श्रम को बचाकर भौगोलिक दूरियों को काफी कम किया है ।सूचना प्रौद्योगिकी का विकास विज्ञान के क्षेत्र में एक युगांतकारी परिघटना है जिसके दूरगामी परिणाम हमें अभी से ही दिखने लगे हैं ।आज संपूर्ण विश्व इंटरनेट के द्वारा एक छोटे से डिवाइस में सिमट गया है ।
लेकिन जिस प्रकार विज्ञान का मानव जीवन पर सकारात्मक प्रभाव है ठीक इसके नकारात्मक एवं प्रतिकूल परिणाम भी सामने दिखने लगे हैं। इसकी झाँकी हमें तरह- तरह के प्रदूषण यथा वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, जल प्रदूषण, भूमि प्रदूषण, प्रकाश प्रदूषण आदि- आदि। इसके साथ ही वैश्विक तापन (ग्लोबल वार्मिंग ) की समस्या भी विकराल रूप ले रही है ।इन सभी का की परिणति जलवायु परिवर्तन के रूप में दिख रही है ; कहीं जल- प्रलय तो कहीं आसमान से बरसती अंगारे के रूप में, कहीं खाद्य -संकट तो कहीं जल संकट के रूप में। इससे न सिर्फ मानवों पे अपितु संपूर्ण जैव विविधता के अस्तित्तव पे संकट के बादल मंडरा रहे हैं ।
इसके साथ ही तकनीक का गलत दिशाओं में प्रयोग पूरी मानवता के विनाश में अपनी भूमिका निभाती हुई नजर आ रही है । विज्ञान का गलत हाथों में आने से सुरक्षा के नाम पर कई ऐसे विध्वंसक परमामवीय रासायनिक हथियार निर्मित हो चुके हैं जो हमारी धरा को विध्वंस करने में भी सक्षम है ।
अत: हम विज्ञान के सकारात्मक चमत्कार तथा इसके उपयोगी पहलुओं पर ध्यान देते हुए संपूर्ण मानवता हित में नवाचार को प्रोत्साहित करना होगा । इसी में विज्ञान का सर्वत्र जय- जयकार है ।
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