"काशी तमिल संगमम" 2022

 वणक्कम काशी :  नमस्ते तमिलनाडु।

काशी तमिल संगम माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के पहल पर सांस्कृतिक नगरी वाराणसी में आयोजित उत्तर और दक्षिण के बीच ऐतिहासिक सभ्यता का संबंधों के कई पहलुओं का जश्न है । चाहे वह संबंध भाषा का हो , चाहे वह संस्कृति का हो, चाहे वह सद्विचार का हो या उन सभी में सम्मिलित एकरस भाव का हो। 

"भाषा भेद मिटाकर हम  साझी  ज्ञान : साझी परंपरा  को संधान करें ।

काशी तमिल संगमम का हिस्सा बनकर हम एक भारत :श्रेष्ठ  भारत को अंतर्धान करें

काशी तमिल परंपरा की अनुसंधान करें" ।।

हमारी संस्कृति में संगम की बहुत बड़ी विशेषता रही है चाहे वह नदियों का संगम हो या नव विचारों का संगम । नव सांस्कृतिक विचारणा संयुक्त तमिल काशी संगमम भी इसका एक विशेष प्रमाणिक दस्तावेज है। अगर हम अतीत में देखें तो तमिल साहित्य संगम जिसमें दक्षिण भारत के साथ-साथ उत्तर की काशी के भी महत्व उद्घाटित हैं। हमारी संस्कृति के एकता को ही परिलक्षित करती है।

यहां पर मैं अपनी स्वरचित पंक्तियां उद्धृत करना चाहूंगा कि 

"काशी से कांची तक का इतिहास बहुत पुराना है ।

दोनों नगरों की  साझी  ज्ञान  साझी परंपरा का सफर बहुत सुहाना है"।।

जी हां चाहे वह काशी की बनारसी सारी हो या कांच की सिल्क की साड़ियां दोनों की गुणवत्ता और ऐतिहासिक महत्व समृद्ध है।

विविधता में एकता भारत की सबसे बड़ी विशेषता है। इसी को ध्यान में रखकर ज्ञान एवं सांस्कृतिक परंपराओं उत्तर एवं दक्षिण के बीच को करीब लाना हमारी साझी विरासत की समझ विकसित करने के साथ इन क्षेत्रों के लोगों के बीच संबंधों को और प्रगाढ़ करना है।

काशी और तमिल दोनों शिवमय है ।दोनों के कण-कण में भगवान विश्वनाथ विराजमान हैं। चाहे वह दक्षिण में श्रीनिवासन हो या उत्तर भारत में काशीनाथ  ,चाहे वह दक्षिण भारत के तिरुवरूर हो या काशी के  तुलसी हों ।चाहे वह दक्षिण भारत के  रामानुजाचार्य हो शंकराचार्य हो या उत्तर भारत के कबीर महात्मा बुद्ध ।इन सभी ने अपनी ज्ञान, परंपरा, बौद्धिकता नैतिकता ,अध्यात्मिकता एवं चिंतन से चिरकाल तक दोनों संस्कृतियों को करीब लाने एवं संजोए रखने का प्रयास किया है।

आधुनिक भारत के निर्माण में भी दक्षिण भारत के महानुभावों का विशिष्ट योगदान रहा है चाहे वह स्वतंत्र भारत के प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल श्री राजा गोपालाचारी हों या स्वतंत्र भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति पद को सुशोभित करने वाले डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन हों । साहित्य के क्षेत्र में सुब्रमण्यम भारती हों या राजनीति के क्षेत्र में के कामराज इन सभी ने अपनी लगन ,कर्तव्यनिष्ठा से देश के उत्थान में अपना सर्वस्व न्यौछावर  किया है।

यह दोनों नगर प्राचीन शिक्षा के केंद्र हैं जितनी प्राचीन संस्कृत भाषा है उतनी ही प्राचीन तमिल संस्कृति समृद्ध है ।जिस प्रकार उत्तर में पतित पावनी गंगा की अविरल धारा बहती है उसी प्रकार दक्षिण में भी दक्षिण की गंगा गोदावरी ,कावेरी की अविरल  धारा से दक्षिण में भी काशी के दर्शन होते हैं। काशी की कई गलियों घाटों पर मिनी तमिल के संस्कृति के दर्शन होते हैं। काशी और तमिल की एक और विशेषता है कि दक्षिण भारत के लोग जब वैवाहिक बंधन में बंध जाते हैं तो अपने नए जीवन की शुरुआत करने से पहले वह काशी जरूर आते हैं और भगवान भोलेनाथ के दर्शन करते हैं।

हमारी भाषा चाहे अलग हो लेकिन हम सबकी भाव एक है  चूंकि हम सभी हिंदवासी हैं। 

" हिंद देश के निवासी सभी जन एक हैं ।

रंग- रुप- वेश -भाषा चाहे अनेक है"।।

काशी  तमिल संगमम कार्यक्रम के दौरान ही बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के के जेनेटिक साइंटिस्ट ने दावा किया कि "काशी और तमिलनाडु के लोगों का डीएनए(DNA )एक है ।आसान भाषा में अगर कहे तो हमारा रंग रूप भले ही अलग है लेकिन हमारे पूर्वज एक ही हैं ।आपको बता दें कि इस शोध का नेतृत्व आणविक जीव विज्ञान केंद्र सीसीएमबी(CCMB) हैदराबाद और बीएचयू की टीम कर रही है यह रिसर्च वर्ष 2006 से शुरू हुआ है। 

काशी और तमिल के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए मैं यहां एक सांस्कृतिक महत्व की यथार्थ कथा से अपनी बात को समाप्त करना चाहूंगा-

यह बात उस समय की है जब 15 वीं शताब्दी में मदुरै के आसपास के क्षेत्र पर शासन करने वाले पांडय राजा 'राजा पराक्रम पांड्या' भगवान शिव का एक मंदिर बनाना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने एक शिवलिंग को बनारस से वापस लाने के लिए काशी प्रस्थान करते हैं। वहां से शिवलिंग लेकर लौटते समय जब वे रास्ते में एक पेड़ के नीचे विश्राम करने के लिए रुक जाते हैं और फिर जब वह आगे पुनः यात्रा हेतु बढ़ते हैं तो शिवलिंग ले जा रही गाय आगे बढ़ने से मना कर देती हैं वह वही रूकी रहती है ।पराक्रम पांड्या ने इसे भगवान शिव की इच्छा समझा और शिवलिंग को वहीं स्थापित कर दिया जिसके बाद में यह स्थान शिवकाशी  , तमिलनाडु के नाम से जाने जाना जाने लगा।

जो भक्त काशी नहीं जा सकते थे उनके लिए पांडयों ने काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था जो आज दक्षिण पश्चिमी तमिलनाडु में तेेनकाशी यानी दक्षिण की काशी के नाम से जाना जाता है और यह वर्तमान में केरल के साथ राज्य की सीमा के करीब है।

सच में  "मैं युगो युगो से अविरल -अविचल  साझा  ज्ञान साझी परंपरा को संजोए अविनाशी हूं।

मैं काशी तमिल की सांस्कृतिक महत्व का साक्षी अध्यात्मिक नगर काशी हूं"।

समाप्त 

 -- बृजलाला  रोहन ( सेंट्रल हिंदू बॉयज स्कूल ,वाराणसी)

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