धरती को धारण करने वाली धारणीय विकास

 पृथ्वी सभी मनुष्यों की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन प्रदान करती है लेकिन लालच पूरी करने के लिए नहीं\'- महात्मा गांधी

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की बात प्रासंगिक है ।यह सच है कि पृथ्वी भी हमारी मां की तरह ही हमारा पालन-पोषण करती है, हमारी आवश्यकताओं को अपनी आवश्यकताओं से समझौता करके भी पूर्ति करती है।हम मानव ने अपनी उपभोक्तावादी रवैयै और विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति का अंधाधुंध दोहन किया जिसके कारण आज विभिन्न प्रकार के प्रदूषण, ओजोन अपक्षय, ग्लोबल वार्मिंग,जलवायु परिवर्तन जैसी विकट समस्याएं मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए संकट के रूप में परिलक्षित हो रहे हैं ।सबकी बर्दाश्त करने ,की सहन करने की सीमा होती है जिस सीमा से परे जाने का मतलब होता है विनाश को आह्वान करना। पृथ्वी के पास भी सीमित रूप में संसाधन है जिसके ऊपर असीमित आवश्यकताओं की पूर्ति करने का भार है। ऐसे में समय की मांग है कि हम संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करें जिसे वर्तमान पीढ़ी के साथ साथ भावी पीढ़ी की आवश्यकताओं का ध्यान रखकर किया जाए। इस प्रकार की \'सतत विकास \'की अवधारणा सर्वप्रथम ब्रॉडलैंड आयोग ने वर्ष 1987 में आवर कॉमन फ्यूचर रिपोर्ट में दी है।

धारणीय विकास की अवधारणा पर \'संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन\'( UNCED)ने बल दिया है जिसने इसे इस प्रकार परिभाषित किया कि \'ऐसा विकास जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को भावी पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति क्षमता का समझौता किए बिना पूरा करें\'। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा प्रस्तावित सतत विकास लक्ष्यों के प्रति भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने विभिन्न वैश्विक मंचों से अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की है । एक नागरिक के रूप हमारा कर्तव्य है कि हम अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाकर उनका साथ दें।


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