स्वामी विवेकानंद के विचार युवाओं में आज भी किसी प्रकार प्रासंगिक है? उनकी उत्तिष्ठत जाग्रत एवं दरिद्र नारायण की अवधारणा क्या थी

स्वामी विवेकानंद का जीवन एवं दर्शन न सिर्फ युवाओं के लिए अपितु हर वय के लोगों के लिए प्रासंगिक एवं अनुकरणीय है। सामान्यतः: हम स्वामी विवेकानंद को उनके शिकागो संबोधन(१७९३) के लिए ही सीमित कर देते हैं लेकिन उन्होंने राष्ट्र के पतन एवं उसके उत्थान के लिए अनेक ऐसे कारणों एवं समाधानों को सफलता पूर्वक बताया है जो आज भी अगर हम अपनी दिनचर्या में एवं सामाजिक एवं राजनीतिक स्तर पर इच्छा शक्ति दिखाते हुए लागू किया जाए तो देश सचमुच विश्व गुरु बन सकता है। 
उन्होंने शिकागो के विश्व धर्म संसद में जिस प्रकार से सनातन संस्कृति का परिचय दिया और उन्होंने बताया कि किस प्रकार से भारत की संस्कृति बहुलतावादी एवं सर्व समावेशी है जिसमें सभी संस्कृतियों का समन्वय है लेकिन आज वही भारत विभिन्न प्रकार के सांप्रदायिक वैमनस्य से घिरा हुआ है।
उन्होंने "उत्तिष्ठत जाग्रत से लेकर दरिद्र नारायण" की जो अवधारणा दी, जिसमें उन्होंने कहा "हमारे चारों तरफ जो दिन-हीन दुखी लोग हैं सर्वप्रथम उन विराट की पूजा करो, मानव और पशु सभी हमारे देवता हैं और सबसे पहले हमें जिन देवताओं की पूजा करनी होगी, वे हैं हमारे अपने देशवासी।
और खासकर उनका युवा शक्ति पर जोर था उन्होंने कहा था कि "गीता के ज्ञान को ग्रहण करने के लिए सबसे पहले फुटबॉल के मैदान में जाना आवश्यक है, अर्थात उनका कहना था कि शारीरिक एवं मानसिक स्तर पर भी अगर भारतवासी स्वस्थ रहेंगे तभी वह प्रगति के पथ पर अग्रसर होंगे"। उन्होंने राष्ट्र के युवा शक्ति को सकारात्मक कार्यों में लगाने के लिए कहा था लेकिन आज सरकारें जिस प्रकार से दमन चक्र का सहारा लेकर उनके मौलिक एवं न्यायोचित मांगों को ठुकरा रही है उन्हें लाठी डंडे से पीट कर शत्रुवत व्यवहार किया जा रहा है यह समग्र तौर पर नकारात्मक संदेश दे रही है । 
 निश्चित तौर पर यह हमारे युवा शक्ति हमारे राष्ट्र के वर्तमान एवं भविष्य दोनों हैं , आज हम विश्व में युवाओं के मामले में प्रथम स्थान में आते हैं युवा आबादी की दृष्टि से लेकिन आज की युवा आबादी विकृत मानसिकता के कारण से भिन्न-भिन्न कार्यों में लगा हुआ है उन्हें एक सही दिशा में लाने की आवश्यकता है ,क्योंकि युवा में निर्माण की भी शक्ति है तो विध्वंस की भी और हमें हर स्तर पर उन्हें सही एवं सकारात्मक दिशा में लाने की आवश्यकता है।
युवाओं का भी कर्तव्य है कि हम अपने नैतिक कर्तव्यों को समझें एवं व्यक्तिगत से लेकर सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक स्तर पर भी उन्हें हर प्रकार से एक मार्गदर्शन एवं प्रेरणा की आवश्यकता दें , क्योंकि स्वामी विवेकानंद जी के विचा नारों तक सीमित रहने से राष्ट्र प्रगति के पद पर अग्रसर नहीं होगा उन्हें अपने अंतःकरण में विचारों के स्तर पर भी आत्मसात करना होगा।

स्वामी विवेकानंद जी के जन्म दिवस अर्थात राष्ट्रीय युवा दिवस पर उन्हें कोटि-कोटि नमन, अपने जीवन में उनके सद्विचारों का अगर एक शतांश भी उतार पाऊंगा तो यह मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी।

#SwamiVivekanand#NationalyouthDay#YuvaShakti#Bharatrashtra🌻🙏

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