क्या ऐसे बनेंगे विश्व गुरु ?

सरकार एक तरफ जहां विभिन्न प्रकार के नारों से 'विश्व गुरु' होने की बात दोहराती थकती नहीं है लेकिन वास्तविकता अगर धरातल पर देखें तो इसके ठीक विपरीत है।
 शुरुआत हम प्राथमिक शिक्षा से करते हैं, अभी हाल ही फिलहाल में शिक्षा मंत्रालय द्वारा तुगलकी फरमान जारी किया गया है कि अब पांचवी एवं आठवीं कक्षा में नो डिटेंशन पॉलिसी दोबारा अपनाई जाएगी, आसान भाषा में कहें तो इस पॉलिसी के तहत कक्षा पांचवी एवं आठवीं कक्षा में अनुत्तीर्ण हुए विद्यार्थियों को रोका जाएगा उन्हें आगे की कक्षा में प्रोन्नत नहीं किया जाएगा ।हम सभी जानते हैं कि किस प्रकार से सरकारी एवं कम गुणवत्तापूर्ण निजी विद्यालयों में ग्रामीण एवं छोटे कस्बे,शहर  के वंचित वर्ग के बच्चे अध्ययनरत होते हैं लेकिन अगर उन्हें इस तरीके से  हतोत्साहित किया जाएगा तो वह क्या आगे की शिक्षा जारी रख पाएंगे ? खास कर लड़कियां एवं के वंचित वर्ग के बच्चे । एक तरफ उनके शादी का दबाव रहता है एवं दूसरी तरफ उन्हें विभिन्न प्रकार के काम धंधे में लगा दिया जाता है। संसदीय समिति के एक आंकड़े के अनुसार देश में 2023-24 के लिए शिक्षा मंत्रालय की अनुदान की मांगों पर विचार करते हुए अपनी रिपोर्ट में कहा था कि राज्य स्तर पर स्कूलों में शिक्षकों के कुल 62,71,380 स्वीकृत पदों में से 9,86,565 पद रिक्त हैं। इनमें से प्रारंभिक स्तर पर 7,47,565 ,माध्यमिक स्तर रिक्त हैं। अगर सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को निर्धारित करें , रिक्तियों की शीघ्र अति शीघ्र पूर्ति करे,  शिक्षकों को पर्याप्त प्रशिक्षण देकर इन्हें उचित कौशल प्रदान करें तो इसमें सुधार निश्चित रूप से आ सकता है लेकिन सरकार एवं हमारे देश के कथित प्रतिष्ठित नौकरशाही की मानसिकता देखिए ये लोग नो डिटेंशन की पॉलिसी पॉलिसी खेल रहे हैं । 
अब दूसरी बात कक्षा दसवीं में आयोजित होने वाले राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा नेशनल टैलेंट सर्च एग्जामिनेशन( NTSE) को लेकर जिसमें दसवीं कक्षा में परीक्षा आयोजित की जाती है उसके आधार पर चयनित सफल विद्यायार्थियों को पीएचडी तक उन्हें स्कॉलरशिप प्रदान किया जाता है। अपने निजी अनुभव की बात करूं तो इस परीक्षा में मैं भी सम्मिलित हुआ था वर्ष 2021 ईस्वी में लेकिन इसके बारे में ना तो परिणाम की जानकारी हो पाई और नहीं कुछ और ! 
यह तब से ही बंद पड़ा हुआ है । राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे  एवं योगेंद्र यादव  ने इस पर ध्यान आकर्षित करते हुए अपने ट्वीट भी किए हैं। एक आंकड़े के अनुसार प्रधानमंत्री जी के परीक्षा पर चर्चा कार्यक्रम में 62 करोड़ खर्च हो जाते हैं लेकिन वही NTSE परीक्षा आयोजित करने में छात्रवृत्ति प्रदान करने में प्रत्येक वर्ष केवल 40 करोड रुपए खर्च ही होंगे ;तो आप बताइए कि किस प्रकार से जनता के टैक्स के पैसे को दुरुपयोग किया जा रहा है केवल अपने प्रचार - प्रसार में?  बच्चों से संवाद स्थापित करना अच्छी बात है लेकिन उनके भविष्य के शर्त पर तो यह नहीं किया जा सकता है ,प्रधानमंत्री जी को भी इस बात संज्ञान में लेनी होगी । 
तीसरी एवं सबसे महत्वपूर्ण बात है उच्च शिक्षा में उच्च शिक्षा में जिस प्रकार से राज्यपाल को ताकतवर बना करके राज्यों में किसी खास पार्टी या संगठन विशेष के कुलपतियों को नियुक्त करने का जो प्रयास चल रहा है इन सभी से  बातों से हम अवगत हैं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ( UGC) नई पॉलिसी के अनुसार अब विश्वविद्यालय में नए कुलपतियों की नियुक्ति हेतु राज्यपाल को एक समिति गठित करने का अधिकार दिया गया है और वही समिति अब विभिन्न यूनिवर्सिटीज में वाइस चांसलर की नियुक्ति को वैधता प्रदान करेगी अगर यह नियम यूनिवर्सिटी नहीं मानते हैं तो यूजीसी उसकी मान्यता रद्द कर देगी । 
जनसत्ता के रविवार 12 जनवरी 2025 के लेख में स्तंभकार पी .चिदंबरम ने भी इस प्रणाली को वायसराय प्रणाली की संज्ञा देकर इसकी  खामियों को उजागर किया है, एवं विद्यार्थी एवं शिक्षकों से इस पर  ध्यान आकृष्ट करने के लिए भी आह्वान किया है।
इसमें किस प्रकार से संघवाद की भावना पर एक तरह से प्रहार ही तो है उसके साथ-साथ वाइस चांसलर के नियुक्ति में शिक्षा विभाग के अलावा  भी अलग-अलग एडमिनिस्ट्रेशन या विभिन्न क्षेत्रों मेंअनुभव वाले लोगों को सम्मिलित करने का प्रयास किया जा रहा है यह ठीक उसी तरह है  जैसे संघ लोक सेवा आयोग में 'लैटरल एंट्री' का प्रचलन अब बड़े पैमाने पर शुरू हो चुका है इसका उद्देश्य सही है तो निश्चित निश्चित रूप से इसे शिक्षा व्यवस्था में सुधार आएगी लेकिन अगर किसी खास विचारधारा को थोपने का प्रयास किया जा रहा है तो हमें इस पर सोचने की आवश्यकता है ।
दक्षिण के राज्य चाहे तमिलनाडु हो, केरल हो इत्यादि ने अपना विरोध दर्ज भी किया है इस पर , तो सरकार को यह सोचने की आवश्यकता है,
कि विकसित भारत एवं विश्व गुरु का निर्माण केवल नारों से नहीं संभव है अपितु अपनी कथनी एवं करनी को वास्तव में धरातल पर उतारना होगा और तभी  एक सर्व समावेशी तरीके से सबको आपस में लेकर के चलना होगा तभी यह सपना साकार होगा।
हालांकि ऐसा नहीं है कि इस प्रकार की पॉलिसी केवल इस सरकार में ही आ रही है तब की सरकार में भी तुष्टिकरण से  काम लिया जा रहा था लेकिन हमें इस पर सोचने की आवश्यकता है एक समन्वित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। लेकिन किसी भी पॉलिसी को फेर बदलकर अपने हिट साधने अनुसार ढाल लेना यह न सिर्फ नीतिगत स्तर पर अपितु व्यावहारिक स्तर पर भी सरासर अन्याय है और हमें वास्तव में अगर 'विश्व गुरु' बनना है तो विश्व गुरु जैसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं प्रशिक्षण तथा शिक्षकों की नियुक्ति से लेकर उनके वेतन भत्ते तक पारदर्शिता बरतनी होगी एवं उनकी मांगों का ध्यान रखना होगा।
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#VishvaGurubharat

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