मौन मुस्कान की मार्मिक मार

"मौन मुस्कान की मार्मिक मार" 

चेहरे पर अद्भुत तेजोमय आभा, महात्मा बुद्ध की तरह मंद मौन मुस्कान , वाणी ऐसी मानो ग्रीष्म की तपिश में भी शीतलता का एहसास कराते हुए सूखे कंठ में सहज रुप से सुग्राह्य हो !           
ये सभी गुण मिला दें तो वह हमारे हिंदू महाविद्यालय, हिंदी साहित्य के प्रख्यात आचार्य रामेश्वर राय बन जाते हैं !    
"जिनके बल सस्मित सुबह, जिनके बल हर्षित याम
इन गुरूजन को कोटि-कोटि प्रणाम" ।।
   अवसर था आचार्य रामेश्वर राय जी के सेवानिवृत्ति का या यूं कहें कि औपचारिक रूप से विदाई समारोह का, एक शिक्षक जो अपने संपूर्ण कार्यकाल के दौरान ऐसे औपचारिक एवं रश्म अदाएगी से भरे कार्यक्रमों की मुखालफ़त की हो, उनके लिए थोड़ा असहज जरूर बन जाता है फिर भी उन्होंने स्नेह स्वरूप इसकी स्वीकृति दी ;उन्हीं के शब्दों में कहें तो "एक शिक्षक का कभी रिटायरमेंट नहीं होता है भले ही प्रचलित व्यवस्थाओं के अंतर्गत सेवानिवृत्ति मिलती है लेकिन एक शिक्षक का कार्य जीवन पर्यंत शिक्षण एवं इससे संबद्ध गतिविधियों में संलग्न रहता है"।
 एक ऐसा अध्यापक जो बिंबों की दुनिया में ले जाकर अज्ञात कल्पना लोक के द्वार तक उंगली पकड़कर पहुंचाता है, एक ऐसा शिक्षक जो सरल ,सहज , सुबोध भाषा में जीवन को समझाता है ।
 मैं यह तो नहीं कह सकता हूं कि आपका नाम हिंदू कॉलेज के हिंदी विभाग के स्वर्णाक्षरों में अंकित किया जाएगा लेकिन इतना जिम्मेदारी एवं हकपरस्ती से कह सकता हूं कि हिंदू कॉलेज के हर ईंट-ईंट ,पत्थर -कंकड़ में आपका नाम सिमेंटाक्षरों में दर्ज है जिनके नींव तले हिंदू महाविद्यालय के हिंदी विभाग की बहुमंजिला इमारत टिकी हुई है, जिनसे हमारी आने वाली पीढ़ियां न सिर्फ प्रेरित होंगी अपितु पालित- पोषित होकर पल्लवित-पुष्पित होंगी और जो आपके हिंदू कॉलेज के इस यात्रा के अमिट हस्ताक्षर बनेंगी ।
यद्यपि व्यक्तिगत रूप से तो आपसे उतना करीब नहीं हूं, आपके साथ कोई मुकम्मल तस्वीर भी नहीं हो पाई है लेकिन फिर भी दूर रहकर भी बहुत कुछ सुनने और गुनने का प्रयास करता हूं, "कहा भी गया है विद्वान एवं सज्जन जन से हमें थोड़ा उचित दूरी बनाकर रहना चाहिए ताकि उनकी आभा से हम दूर भी ना हो पाएं और इतना नजदीक भी ना हो पाएं कि उस आभा को सहन न कर पाएं"। 
शुरुआत में बहुत से आपके पूर्व के विद्यार्थियों एवं अग्रज भाइयों से सुना था हालांकि मैं भी शुरुआत से ही पढ़ता लिखता रहा हूं तो मैंने सोचा कि ऐसा भी थोड़े है कि एक शिक्षक ऐसा हो सकता है, वह भी सामान्य शिक्षक की तरह ही पढ़ाते होंगे; किंतु जब आपकी कक्षाओं में बैठा ,आपको सुना और जितना भी हो सका थोड़ा बहुत गुना तब हमारा मिथ्याभिमान चूर-चूर हो गया ।
 मैं आपको महान शिक्षक भी नहीं कह सकता हूं चूंकि "ऐसे समय में जब एक शिक्षक होना भी दुर्लभ बात है वैसे में आप जैसा शिक्षक बन पाना भी दुर्लभतम में से भी दुर्लभ है"
फिर भी आपकी कक्षाओं के दौरान आपसे बहुत सारे प्रश्न करने का शुभ अवसर जरूर प्राप्त हुआ है और यह मेरे जीवन के उन गिने-चुने दिनों में से एक हैं जब हमें वास्तव में लगा है कि एक शिक्षक के साथ सत्संग भी संभव है। 
अपने व्यक्तिगत जीवन के मनोभावों को मैंने आपको पत्र के माध्यम से भी भावाभिव्यक्ति की है।
पहली बार जब लल्लन टॉप युटुब चैनल पर #विकासदिव्यकीर्ति सर के द्वारा आपका नाम सुना तब से मन में तरंगे उठने लगी थीं की आपसे जरूर कुछ सीख पाऊं, हालांकि आपका सानिध्य हमें बहुत ही कम समय तक मिला लेकिन फिर भी जितना मिला उनमें सर्व प्रमुख था "अपने कहे गए कथन एवं किए गए कार्य में एकरूपता लाएं "
देश के कोने-कोने से आपके विद्यार्थी गण जब अपने अनुभवों को साझा कर रहे थे तो उस समय हमें भी लग रहा था, यह महसूस हो रहा था कि हम भी आज से कुछ वर्ष बाद जब अपनी कहानी कहेंगे तो उसमें एक अमिट किरदार आप होंगे।
आपकी यात्रा तो हमेशा से ही यूं ही अनवरत जारी है फिर भी इस नई यात्रा के लिए कोटि-कोटि शुभकामनाएं अब हमें आपके जीवन के उन अनुभवों एवं गहन अध्ययन से युक्त सामग्रियां उपलब्ध होगीं जिसमें बिंबो की दुनिया भी होगी और साथ-साथ मनुष्यता की गहरी आहट भी। 
अंत में मेरे द्वारा कुछ पंक्तियां आपको समर्पित ~

"बिंबो की दुनिया में जिसने भ्रमण करना सिखाया,
कल्पना लोक के अज्ञात द्वारा तक उंगली पकड़ पहुंचाया,
सरल, सहज ,सुबोध भाषा में जीवन को समझाया ,
जिसने अपनी जीवन खपा दी हिंदू -हिंदी की भलाई में 
इन गुरुजन को नमन करूं मैं इस अविरल विदाई में !

आचार्य Rameshwar Rai 

आपका गुमनाम विद्यार्थी 
बृजलाला रोहन 'अन्वेषी' 
#प्रोफेसररामेश्वरराय
#हिंदूकॉलेज

Comments

Popular posts from this blog

यूजीसी के प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट का रोक: क्या है आगे की राह ( सांस्थानिक हत्या से समता तक)

कहां चूके तेजस्वी, कहां लुढ़के प्रशांत, दस हजारी नीतीश के आगे सभी दिखे आक्रांत

छठ महापर्व : विधि से विधान तक, आस्था से अनुष्ठान तक