मेरे सनातन सफ़र के सबक

यात्राएं न सिर्फ हमारी बोरियत एवं एक ही जगह पर रहते हुए पनपे ऊबाऊपन को दूर कर हमें तरोताजा बनाती है,नई स्फूर्ति प्रदान करती है बल्कि हमारे जीवन को एक नया आयाम प्रदान करती है। आज के इस लेख में मैं बात करूंगा अपने हाल फिलहाल की ही मथुरा -वृदावंन की यात्रा के बारे में! अपने गांव के ही एक मित्र द्वारा प्रस्तावित किया गया कि इस बार की रंग क्यों न बृज क्षेत्र में ही खेला जाए हालांकि पिछले साल भी हम कुछ मित्रों के साथ होली के आसपास उसी तीर्थस्थल यानी पावन बृज की भूमि गये , दर्शन किए रंग खेली । अच्छा बृज क्षेत्र मेरे नाम से भी जुड़ता है तो एक बिना तार्किक कारण के भी वहां से जुड़ाव है ही , ज्यादा धार्मिक व्यक्ति न होते हुए भी! तो पूर्व स्मृतियों को समेटते हुए आइए चलते हैं इस बार की यात्रा की तरफ ! तो इस बार का अनुभव भी कुछ खास न रहते हुए भी बहुत खास रहा अब आप पूछेंगे यह क्या बात हुई? तो मैं आपको बता दूं कि जी हां यही बात हुई! दरअसल मैं हर बार जिन-जिन ऐतिहासिक, धार्मिक,आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, प्राकृतिक पर्यटन स्थलों पर जाता हूं चाहे वह (जितना अब तक घूम सका हूं) बनारस, हरिद्वार, ऋषिकेश, मथुरा, वृंदावन, राजगीर, दिल्ली,कोलकाता , पूणे या अपना गृह जिला पटना हो दो चीजें हमेशा साम्य रही है; जिसमें पहला है सड़कों, गलियों चौक-चौराहों पर बदबू मारते बिखरे कूड़ा-करकट, भिनभिनाती मक्खियां और उसी के इर्द-गिर्द मंडराते कुत्ते, गाय मवेशियों का झुंड और दूसरा है छोटे-से-छोटे एवं बड़े दूकान में भी पूजन सामग्री से लेकर शृंगार प्रसाधन, स्टाइलिश प्रोडक्ट तक की बिक्री में लगे छोटे-छोटे नन्हें-मुन्हें बच्चे और उनकी कीमती अमूल्य बिकती बचपना ! मैं हमेशा से इन विषयों पर सोचता रहा हूं कि आखिर अभी तक ये बच्चे जिनपर भावी पीढ़ी के निर्माण का दारोमदार है अभी तक बुनियादी शिक्षा से भी वंचित क्यों हैं ? सरकारें इनके उत्थान एवं मुक्ति के लिए इतनी अच्छी तरह से मीडिया मैनेजमेंट करते हुए बड़े- बड़े इश्तहार छपवाती है, इनके खिले-खिले चेहरों के साथ रीलें बनवाती है, वायरल करवाती है आखिर वह धरातल पर क्यों नहीं दिखता ? पहला जो स्वच्छता के अभाव का जिक्र मैंने जो किया आज भी इक्कीसवीं सदी के भारत में भी ज्यों का त्यों बरकरार है। स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी,जे. कृष्णमूर्ति से लेकर अनेक युग प्रवर्तक यात्री मनीषियों ने इस संबंध में अपने विचार रखे हैं जिनमें स्पष्ट तौर पर इन समसामयिक समस्यायों पर सारगर्भित समाधान भी सम्मिलित है, जिसमें विवेकानंद ने तो संपूर्ण भारत यात्रा के दौरान धार्मिक स्थलों पर विद्रूपता का जिक्र किया है भंगी एवं वंचितों को लेकर समरस समाज बनाने की बात कही है वहीं महात्मा गांधी जी भी तत्कालीन भारतीय रेल के दूसरे -तीसरे श्रेणी के डब्बों में सफ़र करते हुए अपने अनुभवों को बेबाकी से लिखा है जिसमें किस प्रकार की गंदगी एवं अव्यवस्था है जो सफ़र को नारकीय बना देता है कमोबेश भारतीय रेल के जनरल डब्बों का आज हाल भी वही है अपितु उससे भी बदतर है ,भेड़ -बकरियों की तरह यात्री भरे जाते हैं, पीने के पानी से लेकर शौचालय की व्यवस्था की तो बात ही छोड़िए अगर मुश्किल से सीट भी मिल जाए तो गनीमत है हालांकि ऐसा नहीं है सरकारें भारतीय रेल के यात्रियों का जीवन सुगम नहीं कर रही है, बिल्कुल कर रही है, कागज़ी बंडल पर लेकिन वस्तुस्थिति क्या है इनसे हम सभी अवगत हैं। आज जिस तरह वैश्वीकरण के इस युग में धर्म एवं अध्यात्मिक क्रियाकलापों, आडंबरों का जिस प्रकार से बाज़ारीकरण हुआ है, समझ नहीं आता इस पर सामूहिक रूप से हंसा जाए या एकांत में बैठकर रोया जाए! आनलाइन चंदा तक तो ठीक था अब आनलाइन दर्शन, आनलाइन आरती और आनलाइन आशीर्वाद की यात्रा कितनी विडंबनाओं से भरी हुई है इसे हमारी पीढ़ी के सोशल मीडिया के महारथियों तथाकथित इनफ्लूएंसर के अलावा और कौन समझ सकता है तो मित्र अगर आपको यहां टिकना है तो मार्केट तक पकड़ बनानी होगी ! अब देखिए न हम हमेशा अपने बाबाओं को रूढ़िवादी कहकर उनका अपमान कर देते हैं, आलोचना करते हैं, बुरा-भला कहते हैं लेकिन आप ज़रा गौर से उनकी गतिविधियों को सोशल मीडिया के संजाल में देखिए उठने-खाने -पीने से लेकर हर मुद्रा में उनकी तस्वीर/ प्रवचन एवं प्रलाप के वीडियोज सोशल मीडिया के समंदर में तैरते मिलेंगे इसी को दूसरी भाषा में तकनीक के साथ स्वंय का अनुकूलन कहते हैं ! ये बाबागण अपनी सुविधा एवं स्वार्थ के लिए अवसरवादी रुख अपनाते हुए विज्ञान एवं तकनीक से जुड़े हुए हैं मगर आम जनता को अभी भी मूर्ख बनाते हुए धर्म - जाति, संस्कृति, भाषा, पंथ के आधार पर विष वक्तव्य देते हुए आपस में विद्वेष बड़ी ढरल्ले से फ़ैला रहे हैं जिन्हें सत्ता से मौन नहीं अपितु सवाक् समर्थन हासिल है! और हमारी मूर्ख निपट भोली जनता को देखिए खुद तकनीक के सहारे उन्हें सुनते हुए रूढ़िवादिता एवं संकीर्णता की जद में गिरे जा रहे हैं। उनको देवतुल्य स्थान देने की कोई कमी कसर नहीं छोड़ते ! अब ऐसे में इन्हें क्या समझाया जा सकता है। उपर्युक्त सारी बातें कोई हवा-हवाई नहीं कही है मैंने अपितु अपने विभिन्न यात्राओं के हासिल स्वरूप ये व्यक्तिगत एवं समष्टिगत अनुभूतिजन्य भावाभिव्यक्ति है। उन तीर्थ स्थल पर दर - दर भटकते भीख मांगते माताएं, बहनें अबोध बालक -बालिकाएं और बड़े ठाट से महंगी गाड़ियों एवं आलीशान बंगलों में रहते बाबागण इस और स्पष्ट तौर पर संकेत करता है कि उनकी कथनी एवं करनी, विचार एवं व्यवहार में कितना विरोधाभास है ! और इसका सारा दोष बाबाओं को दे देना भी कदाचित अनुचित होगा उन्होंने भले हर चीज़ का जनता की सुविधा के अनुसार बाजारीकरण कर दिया है किन्तु हम यह क्यों नहीं समझ पाते हैं कि हम इस जन्म को तो ठीक कर लें? सभी मोक्ष एवं मुक्ति की ओर भागे जा रहे हैं, सभी लोग जन्मों के बंधन से छुटकारा पाना चाहते हैं मगर आज जिस प्रकार बदतर व्यवस्था में बदहाली जिदंगी जी रहे हैं उसकी बात कौन करेगा ? सभी धर्म उपदेशक पूर्व जन्म एवं भावी जन्म की बात कर रहे हैं मगर क्या इस जन्म की बात नहीं होनी चाहिए? जहां तक मैं समझता हूं कोई भी भगवान क्यों चाहेगा कि सब सारे काम-धंधा को छोड़कर कोई मेरी पूजा करे ? माला जपे ? अपने कर्म करते हुए सभी जीव -जंतु पादप के साथ साम्य भाव से प्रेम एवं करूणा आत्मसात करते हुए उस परमपुरूष परमात्मा एवं प्रकृति को सधन्यवाद स्मरण कर लेना ही सबसे बड़ी पूजा एवं उपवास है, यही मेरी तीर्थस्थल पर्यटन , भ्रमण , घुमक्कड़ी एवं यात्राओं का हासिल है और यही समरस समाज बनाने का मूल मंत्र भी जिसे महान घुमक्कड़ विद्वान पंडित राहुल सांकृत्यायन 'सनातन धर्म' कहते हैं

Comments

Popular posts from this blog

यूजीसी के प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट का रोक: क्या है आगे की राह ( सांस्थानिक हत्या से समता तक)

कहां चूके तेजस्वी, कहां लुढ़के प्रशांत, दस हजारी नीतीश के आगे सभी दिखे आक्रांत

छठ महापर्व : विधि से विधान तक, आस्था से अनुष्ठान तक