जाति जनगणना के रास्ते
तो देश को जहां उम्मीद थी की पहलगाम आंतकी हमले के बाद सरकार कोई बड़ा कदम उठाएगी, लेकिन हमेशा की तरह मुद्दे से ध्यान भटका ने के लिए अप्रत्याशित रूप से केंद्र सरकार के द्वारा अगली जनगणना को जातिगत आधार पर होने की घोषणा की जाती है। हां वही भाजपा की सरकार जिसने जातिगत जनगणना के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के पहल को संसद से लेकर हर मंच से अपमान जनक तरीके इसे से ख़ारिज करते हुए इसदेश को बांटने वाला कदम तक बता दिया। यहीं नहीं इसके विरोध में बटेंगे तो कटेंगे, एक हैं तो सेफ हैं, एक हैं तो नेक हैं जैसे नारों से देश में तुष्टिकरण का प्रयास किया गया और वही अब मुख्य धारा मीडिया में यह खबर फैलाई जा रही है कि नेता प्रतिपक्ष गांधी के मुद्दे को मोदी जी ने संबोधित किया , विपक्ष के पास कोई मुद्दा नहीं बचा है। यहां एक बात और विचारणीय है की स्थानीय निकाय के चुनाव से लेकर विधायक एवं सांसद केेे उम्मीदवारी हेतु भी जातीय समीकरण का ध्यान रखना भूला नहीं जाता तो फिर आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी का ध्यान रखना क्यों भूला जाता है?
बहरहाल सरकार का फ़ैसला स्वागत योग्य है मगर इसकी टाइमिंग पर संशय कहीं और ही जाता है। यह सिर्फ विपक्ष की जीत नहीं है अपितु हर वह भारतीय नागरिक की जीत है जो संविधान में निहित मूल्यों पर विश्वास करते हुए सामाजिक न्याय में विश्वास करता है।
हर वह नागरिक जो अपनी आबादी के हिसाब से अपनी हिस्सेदारी एवं भागीदारी को सुनिश्चित हेतु दृढ़ संकल्प है उन सभी की जीत है। हालांकि गौरतलब बात यही भी है कि वर्ष 2011 के जातिगत सर्वे (जनगणना) के आंकड़े क्यों नहीं प्रकाशित किए गए ?क्योंकि उस समय संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार थी बाद में वही इन आंकडों को सार्वजनिक करने हेतु वर्तमान सरकार को पत्र भी लिख चुकी है। बहरहाल आगे की राह यह है कि अब सरकार निष्पक्ष एवं पारदर्शी तरीके से जातिगत जनगणना करवाकर उसके आंकड़े सार्वजनिक करे ताकि पता चले कि देश के संसाधनों पर किसका कितना स्वामित्व है?
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