दंगे की आड़ में... वोट बैंक की जुगाड़ में

पिछले कुछ समय से देश के विभिन्न हिस्सों में खासकर के हिंदू पर्व -त्योंहारों पर सांप्रदायिक हिंसा की खबरें लगातार आती रहीं हैं और साथ ही यह सिलसिला सरकार के कानून के खिलाफ प्रदर्शन से हिंसात्मक रूप ले ले रही हैं चाहे वह CAA हो या NRC और फिलहाल का संशोधित वक्फ कानून... 
मैं बात कर रहा हूं पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में मुसलमानों द्वारा भारतीय संसद में पारित संशोधित वक्फ कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान घटित हिंसा की जिसमें उग्रवादी भीड़ ने सड़क पर पथराव किया गाड़ियों को आग के हवाले किया साथ ही दो हिंदुओं की हत्या कर दी एवं पुलिस के जवाबी फायरिंग में एक मुसलमान की मौत हो गई; जो अब तक बताई सरकारी आंकड़े बताई जा रही हैं।
वहीं अगर हम संशोधित वक्फ कानून की तकनीकी पहलुओं को देखें तो मुझे यह नहीं लगता कि इससे किसी आम मुसलमान के हक और हुक़ूक़ पर कोई सवालिया निशान लगाया गया है?  हालांकि इसके भी पक्ष -विपक्ष में कई बातें हैं लेकिन यहां महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर विरोध - प्रदर्शन हिंसा का रूप कैसे ले रहा है? इसका उत्तर यह है कि दोनों धर्मों - संप्रदायों के चोटी पर के कुछ कट्टरपंथी लोग अपनी कुत्सित मानसिकता से इसको हवा देते हैं एवं साथ ही राज्य की सरकार के मिलीभगत से इसे अंजाम तक पहुंचाया जाता है बाद में चाहे जिस भी राज्य में हो पूरे घटनाक्रम की जिम्मेदारी विपक्ष पर या सरकार द्वारा प्रेरित है बताकर पल्ला झाड़ लिया जाता है? लोगों के धार्मिक भावनाओं को भड़काकर आज लगातार सांप्रदायिक हिंसा एवं कट्टरता बढ़ रही है,
इस पर हमें चिंतन करने की आवश्यकता है। इंटरेस्टिंग (रोचक )बात बताऊं ये सभी घटनाएं ठीक चुनावों के आसपास ही घटित होते हैं,जी हां आपने सही समझा बंगाल विधानसभा सभा चुनाव निकट है!
 यह प्रश्न कि आखिर सद्भाव कैसे होगा इस देश में विकट है... अभी भी वक्त है सुधरिए सुधरिए कट्टरता त्यागिए और अपने कर्तव्यपथ पर आगे बढ़िए... आखिर कब तक आपस में ही मरते -कटते रहेंगे? देखिए दुनिया की प्रगति को और अपने विकास का मुआयना आप स्वंय कीजिए? इस देश को न तो सो कौल्ड सेक्लूयर की जरूरत है और न ही धर्मांध की? न संख्या बल से ओतप्रोत मंदाध की ? इस देश को आज संवेदनशील, सद्भावना से परिपूर्ण नागरिक की जरूरत है।।
Picture credit goes to- PTI

Comments

Popular posts from this blog

यूजीसी के प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट का रोक: क्या है आगे की राह ( सांस्थानिक हत्या से समता तक)

कहां चूके तेजस्वी, कहां लुढ़के प्रशांत, दस हजारी नीतीश के आगे सभी दिखे आक्रांत

छठ महापर्व : विधि से विधान तक, आस्था से अनुष्ठान तक