अभिव्यक्ति के खतरे बनाम दोहरा मानदंड
हाल फिलहाल में मीडिया जगत में देश में अभिव्यक्ति के दो प्रकरण सामने आए हैं, जिसमें पहले प्रकरण जो घोर वैमनस्य से भरे सांप्रदायिक हैं।( हालांकि इसके अलावा भी कई प्रकरण सामने हैं) जिसमें पहला मध्य प्रदेश के एक मंत्री का बयान जो कर्नल सोफिया कुरैशी से जुड़ी हुई किसी खास मजहब के प्रति संकीर्ण मानसिकता को दिखाता है ,वहीं दूसरा बयान अशोका यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर का है जिसमें वह आतंकवाद के विरुद्ध भारत सरकार के ऑपरेशन सिंदूर की सराहना करते हुए अपनी फेसबुक पोस्ट के माध्यम से अपनी बात कहते हैं साथ ही साथ वे कुछ जरूरी चीजों पर प्रश्न चिन्ह उठाते हुए कथनी
एवं करनी पर सरकार एवं दक्षिणपंथी नेताओं को आईना भी दिखाते हैं।
एक के घृणित बयान के बावजूद भी,उसके विरुद्ध अभी तक ज्ञात कोई भी FIR तक नहीं होता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय स्वत: संज्ञान लेते हुए मामले को सुनती है एवं उनके घड़ियाली आंसू को अस्वीकार करते हुए जांच कमेटी गठित करने को निर्देश देती है।
यह तो हुई न्यायपालिका की बात,मगर सरकार एवं पार्टी के स्तर पर किसी भी प्रकार से मुखर तौर पर न तो इसकी निंदा की जाती है और न हीं मंत्री महोदय के विरुद्ध कोई कार्रवाई की जाती है।
अगर पार्टी एवं सरकार के स्तर पर उनके विरुद्ध कार्रवाई की जाती तब यह कहा जा सकता था कि हां पार्टी सच में भारत की बहुलतावादी संस्कृति का सम्मान करतीहै, एवं सांप्रदायिक विचारों को पार्टी समर्थन नहीं देती है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, यही हश्र विदेश सचिव विक्रम मिसरी के साथ भी सोशल मीडिया पर हुआ तो वहां भी केंद्र सरकार चुप्पी साध ली।
वहीं दूसरे बयान के मामले में जिसकी तुलना भी नहीं की जा सकती पहले के बयान से,प्रोफेसर की दलबल के साथ जाकर गिरफ्तारी हो जाती है।
तो आप यह दो प्रकरण देख सकते हैं जो यह दिखाता है कि किस प्रकार सरकारें केवल विचारधारा के आधार पर लोगों को धर दबोचती हैं। क्या विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी भी नहीं होनी चाहिए जो की अगर आप संवेदनशील इंसान हैं तो देखेंगे कि उस फेसबुक पोस्ट में ऐसा कुछ भी नहीं है जो राष्ट्र के विरुद्ध मानी जाए हां इतना जरूर है की जरूरी प्रश्नों को उसमें उठाया गया है।जब हम वैश्विक मंचों से अपने लोकतंत्र एवं अपनी बहुलतावादी संस्कृति की दुहाई देते हैं तो क्या इन प्रकरणों से भारत की आत्मा नहीं दुखती है? इसपर हमें चिंतन करने की आवश्यकता है। क्योंकि भारत भूमि चिंतन की भूमि है और अभिव्यक्ति की आजादी की भूमि है। वैचारिक दमन और किसी खास विचारधारा के आरोपन की भूमि नहीं है।
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