भाषा के भंवर

सौरभ द्विवेदी के नेतृत्व में 'नेतानगरी' के भाषा विषयक आज इस परिसंवाद/चर्चा-परिचर्चा में भाषाओं के प्रभुत्व एवं हाल फिलहाल की घटना पर जिसमें महाराष्ट्र में किस प्रकार से हिंदी भाषियों को जबरदस्ती मराठी बोलने के लिए उन्हें मारा पीटा गया और किस तरह से महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना(मनसे) ने मराठी मानुष की भावना को भड़काकर हिंसा एवं उपद्रव की घटनाएं की(जो की पूरी तरह गलत है) ।

इसकी पृष्ठभूमि कुछ इस तरह है
महाराष्ट्र सरकार द्वारा त्रिभाषा नीति जिसके तहत हिंदी को को भी तीसरी भाषा के रूप में पढ़ने की बात की गई जिसका शिवसेना एवं मनसे ने विरोध किया और जब बाद में सरकारी इसे वापस ले लेती है तब विजय रैली के रूप में शिवसेना (उद्धव गुट )प्रमुख उद्धव ठाकरे एवं महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुखराज ठाकरे एक मंच पर आए और इसे बृहन मुंबई नगर पालिका के चुनाव को भी इससे जोड़कर देखा गया। इन सब विषयों को लेकर इसके ऐतिहासिक आधार एवं सांस्कृतिक प्रभाव पर आज चर्चा -परिचर्चा सह परिसंवाद(panel discussion) आधारित रही जिसमें देश के विविध भाषाओं एवं संस्कृतियों से जुड़े हुए लोगों ने अपने-अपने विचार रखें जिसमें महाराष्ट्र के ही वरिष्ठ फिल्म निर्देशक शीरिंग गोडबोले , वरिष्ठ पत्रकार श्री सुभाष पलिष्कर, डा. विवेकानंद उपाध्याय (assistant professor, BHU) वरिष्ठ पत्रकार श्री राजदीप सरदेसाई जी,संपादक सौरभ द्विवेदी सहित इन पांच विद्वानों के पैनल ने भाषा पर व्यापक चर्चा एवं मत मत-मतांतर प्रस्तुत की जिसे निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है.. 
१. किसी भी भाषा को प्राकृतिक रूप में फलने-फूलने के लिए सुअवसर प्रदान किया जाए इसे किसी भी भाषा पर थोपा नहीं जाए चाहे वह हिंदी को मराठी पर थोपने की बात हो या अन्य भाषाओं को अन्य भाषाओं के वर्चस्व की बात।
सरकार को भी इस बिंदु को ध्यान में रखकर नई शिक्षा नीति की नीतियों को लागू करना चाहिए।
२. भाषा के आधार पर किसी भी प्रकार की गुंडागर्दी बर्दाश्त नहीं की जा सकती।संवैधानिक प्रावधानों के तहत ही हम भाषा के अधिकार को प्राप्त कर सकते हैं। क्षेत्रीय पार्टियों को हिंसा से अलग हटकर यह काम करने की आवश्यकता है।
३. हमें सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य एवं संस्कृति को आदान-प्रदान के द्वारा एक दूसरे से सीखना चाहिए। इस नीति को भी त्याग देना चाहिए कि नहीं हम यह भाषा नहीं सीखेंगे। अगर आप किसी इलाके में रह रहे हैं तो निश्चित तौर पर आपको उस भाषा के कुछ - कुछ शब्दों से लेकर उस भाषा की जानकारी प्राप्त करनी चाहिए , भिन्न -भिन्न भाषा को ध्यान में रखकर उनके साहित्य एवं सिनेमा से बहुत कुछ सीख सकते हैं।
४. हमें अंग्रेजी के वर्चस्व को, जो की सभी भारतीय भाषाओं पर हावी है उस पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।भाषा अपने आप में सर्वोच्च नहीं है वह ज्ञान का एक वाहक है उसमें अंतर निहित बौद्धिक एवं मानवीय मूल्यों को आदान- प्रदान करना आवश्यक है और उसके विकल्प के रूप में भारतीय भाषाएं महत्वपूर्ण हैं, ऐसा वातावरण निर्मित हो।
४. देश में अनुवाद की संस्कृति विकसित हो ताकि विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध विपुल साहित्य एवं मानवतावादी मूल्यों को विभिन्न भाषाओं में हम पढ़ सके उन्हें आत्मसात कर सकें और उनके संस्कृति के प्रति गौरव की भावना भी रख सके और अपने संस्कृति को भी दूसरी भाषा में अभिव्यक्त कर सके।
५. राजभाषा हिंदी सहित भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में मान्यता प्राप्त सभी भाषाओं सहित विभिन्न क्षेत्रीय बोलियों भाषओं का आपसी समन्वय हो, क्योंकि हम साहित्य में देखते हैं कि विभिन्न भाषाओं के शब्दों को आत्मसात किया गया है ।इसी प्रकार से हम एक सामसिक संस्कृति का निर्माण करना चाहिए जिसमें हम विभिन्न भाषाओं से सीख सकें ।भाषा जुड़ाव का जरिया हो अलगाव का जरिया नहीं हो क्योंकि जब हम किसी भाषा को सिखते हैं तभी हम आगे बढ़ सकते हैं चाहे उसके विपुल साहित्य हो सिनेमा हो नाटक हो ।
और अंत में इसी बात के साथ बात समाप्त करना चाहूंगा 
कि
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी कहा है कि 'परिचय ही प्रेम का मूल है'।
Brijlala Rohan 
साभार
( श्रीयुत सौरव द्विवेदी)
#नेतानगरी

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