एक तथाकथित एनजीओ के 100 साल : भूमिका पर सैकड़ों सवाल

तो तथाकथित एक एनजीओ ने अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष पूरे कर लिए हैं। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर भारत की आजादी, भारत के विभाजन तक इस संगठन की भूमिका संदिग्ध रही है। देश में एक तरफ जहां मुस्लिम उग्रवादी संगठन अपने अधिकारों को लेकर हावी थे तो दूसरी तरफ हिंदू उग्रवादी विचारधाराओं का इस तथा कथित एनजीओ ने प्रतिनिधित्व किया था। देश में सांप्रदायिकता की हवा चारों तरफ बह रही थी और आजादी के बाद महात्मा गांधी की हत्या के रूप में इसका घृणित स्वरूप सामने आया। सरदार पटेल द्वारा लिखे गए पत्र में भी इसके मुखिया को स्पष्ट तौर से कहा गया कि इस "तथाकथित सांस्कृतिक संगठन के द्वारा बोले गए सांप्रदायिक भाषणों का नतीजा गांधी जी की हत्या के रूप में सामने आई"!
गांधी जी के हत्यारे का भी इस संगठन के साथ संबंध को भी कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि इसे ऐतिहासिक दस्तावेजों में देखा जा सकता है। प्रतिक्रिया स्वरूप इसे सरदार पटेल द्वारा जब गृह विभाग देख रहे थे इसे प्रतिबंधित भी किया गया हालांकि यह संगठन सार्वजनिक मंचों से हमेशा इस बात को नकारता है लेकिन वस्तुस्थिति संदिग्ध है।बहरहाल इस एनजीओ ने अपनी 100 साल पूरे करने के बाद आजादी के योगदान में गांधी जी एवं कांग्रेस की भूमिका को सराहा साथ ही साथ हिंद स्वराज एवं चरखे की भूमिका को भी राष्ट्र की एकता से जोड़कर देखा। यह वही लोग हैं जो हमेशा से कहते रहे हैं की आजादी चरखे से नहीं मिली है। इस संगठन को लेकर जब देश के प्रधानमंत्री स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले के प्राचीर से सराहते हैं, इसे एनजीओ की संज्ञा देते हैं तो इसके क्या मायने हैं? आप समझ सकते हैं। हालांकि यह संगठन हमेशा से यह कहने से बचता रहा है कि वह राजनीतिक मामलों में दखल देता है लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी के लिए जमीन तैयार करने एवं चुनाव संबंधी तैयारी में इसकी भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। 
देखना यह है कि बदले हुए परिस्थिति में यह एनजीओ कब रजिस्टर्ड होता है? और राष्ट्र की एकता ,जनांकिकीय स्थिति,शिक्षा, स्वास्थ्य से संबंधित इनके मुखिया द्वारा दिए गए बयान किस प्रकार से धरातल पर पारदर्शी रूप से उतरते हैं। क्या यह तथाकथित एनजीओ अपनी कथनी एवं करनी में एकरूपता बरत पाता है।

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