क्या निर्वाचन आयोग सरकार की कठपुतली भर बनकर रह गया है? चुनाव आयोग द्वारा अबतक वोट चोरी संबंधी आरोप का समुचित स्पष्टीकरण क्यों नहीं...?
भारत निर्वाचन आयोग के त्रुटियों सहित कथित वोट चोरी को लेकर 'एटम बम' फोड़ने को बयान को अक्षरश: सही साबित करते हुए कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष एवं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने अपने प्रेस ब्रीफिंग के माध्यम से जिस प्रकार पर्याप्त तथ्यों एवं आंकड़ों के आधार पर भारत निर्वाचन आयोग (election commission of India)की कार्यशैली एवं वोटर लिस्ट में पर्याप्त दोषों का पर्दाफाश किया है; इससे आयोग पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। चाहे वह मतदाता के माता-पिता के नाम में विसंगति हो या उसके हाउस नंबर को लेकर या एक ही घर में रजिस्टर्ड अप्रत्याशित मतदाता लोग हों या एक ही मतदाता द्वारा एक ही दिन एक बार से अधिक वोट देने का मामला हो आदि-आदि।
कुछ नमूने ऐसे भी आए जिनके नाम से उनके मृत्यु के पश्चात भी वोट पड़ रहे हैं ।ये ऐसे दोष हैं जिनसे हम सभी गाहे -बगाहे जरूर दो-चार होते हैं। ऐसे में निर्वाचन आयोग को बतौर एक आधिकारिक प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से अगर राहुल गांधी के आंकड़े एवं तथ्य झूठे हैं तो उन्हें सत्यापित करने की आवश्यकता है ताकि जनता का निर्वाचन आयोग पर भरोसा बना रहे। जिस प्रकार से विगत कुछ समय से निर्वाचन आयोग की कार्यवाही हुई है, वह सवालों के घेरे में तो जरूर आई है। अभी हाल ही फिलहाल का उदाहरण लें तो जिस प्रकार से आनन- फानन में एक माह के अंदर बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) किया गया(जिसमें 2003 या उसके बाद मतदाता बनने वालों को जरूरी पहचान पत्र सत्यापित करना अनिवार्य था, हालांकि इससे किसी को कोई आपत्ति नहीं थी आपत्ति सिर्फ इसके टाइमिंग एवं आवश्यक दस्तावेज को लेकर थी।इसमें भी कई विसंगतियां थी क्योंकि इसमें सभी को भी फॉर्म भरने के माध्यम से शामिल कर लिया गया बाद में) जिसके द्वारा कई वैध नागरिक भी अपने मतदान के अधिकार को खोने पर मजबूर हो रहे थे खासकर वंचित तबकों के लोग जिनके पास न तो कानूनी एवं विधायी कागजी मामलों की पर्याप्त समझ एवं उपलब्धता है। जिसपर तमाम विपक्षी सांसद एवं एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली और सुनवाई के बाद चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट से भी कड़ी फटकार पड़ी। दरअसल जिस आधार कार्ड को वर्तमान सरकार ने ऑक्सीजन से भी ज्यादा अनिवार्य बना दिया था सरकारी योजनाओं एवं कार्यक्रमों के लाभ लेने के लिए (चाहे वह डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर हो या केवाईसी जैसे बैंक के महत्वपूर्ण काम भी आधार से लिंक किए गए हैं) और विडंबना यह की उन्हीं वैध दस्तावेजों की सूची से उस राशन कार्ड सहित पुराने वोटर कार्ड को भी आवश्यक दस्तावेज की श्रेणी से बाहर कर दिया जाता है। और विडंबना देखिए कि जिस आधार कार्ड के माध्यम से आप निवास प्रमाण पत्र के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं वह आधार कार्ड मान्य दस्तावेज नहीं है। और इसके बाद से जिस प्रकार से छिछा-लेदर करके फार्म भरवाया जाता है, हम सभी अवगत हैं। तदोपरांत सूबे के 7.93 करोड़ मतदाताओं में से उन 65 लाख मतदाताओं को वोटर लिस्ट से गायब कर दिया जाता है। बाद में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने पर आयोग हटाए गए नामों को सार्वजनिक न करने की बात कह रहा है।इन सारे प्रावधानों से तो यही सिद्ध होता है कि चुनाव आयोग सरकार की पूरी तरह से कठपुतली होकर रह गई है।कभी चुनाव आयोग टीएन शेषन के नेतृत्व में भी था जिन्होंने लोकतांत्रिक चुनाव की शुचिता को सुनिश्चित करने के लिए आमूल- चूल परिवर्तन किये।जिनके बारे में कहा जाता था कि 'वह नाश्ते में नेताओं को चबाते थे' और आज का निर्वाचन आयोग जमीन और आसमान का अंतर है। आप सभी इस पर कल्पना कर सकते हैं। हम सभी लोकतंत्र में रहते हैं और लोकतंत्र में केवल नेता के पिछलग्गु नहीं बनें ।चाहे आप किसी भी पार्टी के समर्थन एवं कार्यकर्ता हैं , उन सत्ताधीशों एवं सत्ता के दावेदारों के साथ संवैधानिक संस्थाओं से भी आवश्यक प्रश्न करना एवं उनकी जवाबदेही सुनिश्चित करना आज के समय में जरूरी ही नहीं अनिवार्य भी है।
(सरकार यह भी इल्जाम नहीं लगा सकती है कि यह आधार कार्ड पिछली सरकार में बनी हो क्योंकि आधार संबंधी जितने भी कार्य हैं इस सरकार में ही त्वरित गति से हुए हैं) इससे बिहार के उन लाखों करोड़ों लोगों की मतदाता संबंधी कागजातों को जमा करने में परेशानियां उत्पन्न हुईं ।हम सभी ने देखा कि जिस प्रकार से आनन फानन में जैसे तैसे करके चुनाव आयोग द्वारा वितरित फॉर्म भरवाए गए और इसी के साथ फॉर्म भरकर जमा किया गया। इन सब लीपा-पोतियों खुलासा करने पर एक पत्रकार पर FIR तक किया जाता है, जो की बिल्कुल गलत है।
निश्चित रूप से देश में ऐसे मतदाता होने चाहिए जो देश के ही हों अर्थात वैध हों लेकिन जिस प्रकार से निर्वाचन आयोग ने बिहार में SIR प्रक्रिया संबंधी अदूरदर्शिता दिखाई वह समझ से परे है। मानसून के समय में यह मध्य जून से जुलाई तक किया गया जिस समय बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य में लोग धान सहित खरीफ फसल की खेती में कार्यरत रहते हैं एवं आसपास के राज्यों में भी मजदूर के रूप में जाते हैं। आखिर किस आधार पर यह रिवीजन इस समय किया जाता है,यह सोचने वाली बात है। अगर हम निर्वाचन आयोग के गठन की बात करें जिसमें अनुच्छेद 324 तहत निर्वाचन आयोग के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य दो चुनाव आयुक्त का गठन होता है।पिछले पैनल में चयन प्रक्रिया हेतु प्रधानमंत्री,लोकसभा में विपक्ष के नेता के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश होते थे जो तीनों मिलकर चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करते थे।लेकिन वर्तमान सरकार ने जिस प्रकार से नियुक्ति संबंधी प्रक्रियाओं में संशोधन किया है उसमें प्रधानमंत्री एवं प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री एवं विपक्ष के नेता यह तीन लोग होंगे। अब इसमें जाहिर सी बात है अगर दो व्यक्ति सरकार के ही लोग हैं तो इसमें स्पष्ट रूप से बहुमत सरकार का है। पहले ऐसा संभव था कि अगर मुख्य न्यायाधीश का मत भिन्न हो तो सूची में से दूसरे व्यक्ति को भी चुना जा सकता था जो प्रतीकात्मक रूप से संवैधानिक संस्थाओं पर हमारी विश्वसनीयता को बरकरार रखती थी। लेकिन वर्तमान सरकार ने इसे भी समाप्त कर दिया है। (हालांकि यह मामला भी सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है) लेकिन फिर भी यह जरूरी एवं गंभीर सवाल खड़े करते हैं? निर्वाचन आयोग की कार्यशैली पर ऐसे में देखना यह है कि क्या निर्वाचन आयोग स्पष्ट तौर से प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से इसका जवाब देता है ।हम देख सकते हैं कि किस प्रकार राहुल गांधी के दावों का खंडन करने के लिए सरकार के साथ-साथ मीडिया और निर्वाचन आयोग तीनों मिलकर दावा प्रस्तुत कर रही है लेकिन इस समय जनता में विश्वास उत्पन्न करने के लिए आधिकारिक रूप से निर्वाचन आयोग को प्रेस कांफ्रेंस करने की जरूरत है और इसे स्पष्ट तौर से बताने की जरूरत है कि आखिर वास्तविकता क्या है? अगर उससे वास्तव में त्रुटि हुई है तो उसे सुधार करने हेतु भी आवश्यक पहल करने की आवश्यकता है।(राहुल गांधी द्वारा उठाए गए वोट चोरी के मामले पूरी तरह से सत्य न भी हों लेकिन जरूरी सवाल तो छोड़ ही जाते हैं। यह अतिशयोक्ति पूर्ण इसलिए लगता है क्योंकि इसी दौरान हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना एवं कर्नाटक जैसे राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनी एवं साथ ही साथ पिछले लोकसभा चुनाव-2024 में भी कांग्रेस ने पिछले दो लोकसभा चुनाव से बेहतर प्रदर्शन की। कहां तो भारतीय जनता पार्टी 400 के नारे के साथ आई थी वह अकेले दम पर पूर्ण बहुमत भी प्राप्त नहीं कर पाती है।)
अंत में एक अपील
फेसबुक एवं व्हाट्सएप ग्रुप में जातिवादी ,सांप्रदायिक एवं नस्लीयता से भरे हुए भद्दे भौंडे किस्म के पोस्ट पर लाइक शेयर की भरमार रहती है लेकिन जरूरी सवालों से संबंधित इस तरह के पोस्ट अनदेख किए जाते हैं इस पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है)
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