भारत के विभाजन का सच : बहुआयामी दृष्टिकोण

भारत के विभाजन का सच : बहुआयामी दृष्टिकोण
प्रस्तावना :-
               “छोड़ना घर का हमें याद है ‘जालिब’ नहीं भूले
                    था वतन ज़ेहन में कोई जिंदा तो नहीं था”
                                          ~हफ़ीज़ जालंधरी
 प्रसिद्ध शायर हफ़िज़ जालंधरी की उपयुक्त पंक्तियों से हम विभाजन की पीड़ा को आसानी से समझ सकते हैं! भारत के विभाजन का सच आखिर क्या था? उसके बहुआयामी दृष्टिकोण क्या थे? हम विभाजन के बाद एवं पहले की स्थिति से जोड़कर आसानी से अनुमान लगा सकते हैं कि आखिर विभाजन किस प्रकार अंग्रेजों द्वारा जो सांप्रदायिकता की बीज बोयी गई थी वह विभाजन के फल के रूप में प्रकट हुई ; जो भारतीय सहिष्णु सभ्यता एवं बहुलतावादी सामासिक संस्कृति को तोड़ कर रखने वाला था। इस विभाजन के परिणाम स्वरुप न सिर्फ भारत एवं पाकिस्तान के रूप में दो मुल्क का बंटवारा हुआ अपितु मानवीय संपदाओं, प्राकृतिक एवं भौतिक संसाधनों सहित धार्मिक उन्माद एवं हिंसा का भी विभाजन हुआ।यह विभाजन अपने आप में दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी के रूप में प्रकट हुई।
अंग्रेजों की सैकड़ों वर्ष की गुलामी के बाद भारत 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को आजाद हुआ। प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में कहें तो भारतीय जनमानस का ‘नियति से साक्षात्कार’ तो जरूर हुआ लेकिन यह आजादी ऐसे ही नहीं मिली विभाजन के रूप में इसकी कीमत चुकानी पड़ी। धर्म के आधार पर भारत एवं पाकिस्तान दो मुल्क बने जो अंग्रेजों की ‘फूट डालो एवं शासन करो’ की नीति की चरम परिणति थी‌।
वर्षों की पराधीनता से भारत माता स्वतंत्र तो हुईं लेकिन यह क्या उनके आंचल को बांट दिया गया! यद्यपि भारतीय स्वाधीनता संग्राम के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सहित अन्य विभिन्न दलों के हिंदू एवं मुस्लिम अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ; जिनमें प्रमुख महात्मा गांधी, खान अब्दुल गफ्फार खान, सरदार पटेल, जवाहरलाल नेहरू, अबुल कलाम आजाद आदि-आदि नेताओं ने इस विनाशकारी विभाजन से बचने के हर संभव प्रयास किए किंतु वह असफल रहे और मुस्लिम लीग के नेता जिन्ना के नेतृत्व में दोनों तरफ के चरमपंथी संप्रदायवादी लोगों के कारण अंततः देश के विभाजन का दंश हमें झेलना पड़ा जिसे ‘विभाजन विभीषिका’ के रूप में हम जानते हैं।
 जमीन पर खींची गई लकीरें सिर्फ दो भूमि का बंटवारा नहीं करती हैं, यह बंटवारा करती हैं एक ही संस्कृति के दो आयामों का। एक ही क्षेत्र, भाषा बोली एवं विविध प्रकार के मानवीय संपदाओं का। कल तक जो एक ही क्षेत्र में हंसी-खुशी से रहते थे अब दो मुल्कों के बाशिंदे बन चुके थे और उनके बीच सांप्रदायिक आग इस कदर भड़क चुकी थी कि वे दोनों एक-दूसरे को देख नहीं पा रहे थे ऐसे में कुछ लोग थे जिनमें मानवता अभी भी बची हुई थी और वे ही विभाजन की खाई को पाटने का हर संभव प्रयास कर रहे थे।
विभाजन के सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव एवं कारक
 भारतीय उपमहाद्वीप के लिए विभाजन विश्व की सबसे बड़ी विस्थापन एवं त्रासदी के रूप में साबित हुई।भारत के विभाजन (1947) के दौरान लगभग 10 से 15 लाख लोगों की जान गई, और 1.5 करोड़ से अधिक लोग अपने घर छोड़ने को विवश हुए। दंगे, सामूहिक बलात्कार, अपहरण और व्यापक हिंसा ने पंजाब और बंगाल को रक्तरंजित कर दिया। “फ्रंटियर गांधी” खान अब्दुल गफ्फार खान ने इसे “मानवता के साथ विश्वासघात” कहा। इतिहासकार बी. शैफर और इयान टैलबोट के अनुसार, यह 20वीं सदी का सबसे बड़ा जबरन विस्थापन था। इस त्रासदी ने दोनों देशों की सामाजिक-सांस्कृतिक बनावट को गहरे स्तर पर प्रभावित किया।
अगर हम विभाजन की प्रक्रिया की बात करें तो यह इस आधार पर बांटा गया कि जिस इलाके में मुस्लिम अधिक संख्या में रहते हैं उसे पाकिस्तान का हिस्सा बना दिया जाए और जहां हिंदू बहुसंख्यक हैं उन्हें भारत के अंतर्गत रखा जाए,साथ ही देसी रियासतों को विकल्प था कि दोनों मुल्कों में से किसी एक मुल्क का चयन कर सकते हैं! लेकिन यह व्यावहारिक रूप में सफल नहीं हो सका क्योंकि तत्कालीन समय में ब्रिटिश इंडिया में अनेक इलाकों में ऐसा कोई इलाका नहीं था जहां पर केवल मुस्लिम जनसंख्या रहती हो या हिंदू जनसंख्या रहती हो।
फिर भी ऐसे दो इलाके थे जहां मुसलमान की आबादी ज्यादा थी एक इलाका पश्चिम में पश्चिमी पंजाब था तो दूसरा इलाका पूर्व में पूर्वी बंगाल ( जो पूर्वी पाकिस्तान के रूप में जाना जाता था बाद में वर्ष 1971 ईस्वी में बांग्ला भाषा की अनदेखी होने पर भाषा के आधार पर बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश का निर्माण हुआ) हालांकि ऐसा कोई तरीका ना था कि इन दोनों इलाकों को जोड़कर एक जगह कर दिया जाए। इसे देखते हुए फैसला हुआ कि पाकिस्तान में दो इलाके शामिल होंगे यानी पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान तथा उनके बीच में भारतीय भूभाग का एक बड़ा विस्तार रहेगा।
दूसरी बात यह की मुस्लिम बहुल हर इलाका पाकिस्तान में जाने को राजी हो ऐसा भी नहीं था। ‘खान अब्दुल गफ्फार खान’ पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत के निर्विवाद नेता थे उनकी प्रसिद्धि सीमांत गांधी के रूप में थी और द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के एकदम खिलाफ थे लेकिन दुर्भाग्यवश उनकी आवाज की अनदेखी की गई और पश्चिम उत्तर सीमा प्रांत को पाकिस्तान में शामिल मान लिया गया बाद में उनको पाकिस्तान में अनेक तरह की यातनाएं भी झेलनी पड़ी लेकिन फिर भी उनका भारत से संबंध बना रहा विभाजन के बाद भी।
“भारत की सामासिक संस्कृति और बहुलतावादी प्रवृत्ति में दरार था विभाजन
अंग्रेजों की संप्रदायवादी नीतियों का ही करार था विभाजन”
- अन्वेषी
मानवीय संपदाओं सहित संसाधनों का बंटवारा :
सरदार पटेल अपनी एक भाषण में कहते हैं
 “हमने अभी-अभी स्वतंत्रता प्राप्त की है लेकिन यदि हम अचानक पागल ना हो गए होते तो हम इसके फल बटोरना शुरू करते और संसार की नजरों में अपनी प्रतिष्ठा और अपने सम्मान को ऊंचा उठाते। हमने जो कुछ प्राप्त किया है उसके मूल्य को समझने की बजाय हमने पशुओं से भी अधिक बुरे ढंग से व्यवहार किया है हमने विभाजन को प्रसन्नचित से स्वीकार नहीं किया है स्वतंत्रता को प्राप्त करने और स्वतंत्रता से रहने के लिए कीमत चुकानी पड़ी। लेकिन जो कुछ हो गया है अब उस पर शोक मनाने का समय नहीं है।
भारत पाकिस्तान का भला चाहता है वास्तव में विभाजन से संबंधित समस्याएं शांतिपूर्वक तय की जा चुकी है। हमने इन समस्याओं को शत्रुओं के रूप में नहीं बल्कि एक दूसरे के हितैषियों की तरह हल किया है।यदि केवल लोगों को निकालना और उनकी अदला-बदली की समस्या शांतिपूर्ण ढंग से हल की गई होती तो भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध बेहतर होते”१
 भारत विभाजन विधेयक ब्रिटिश संसद में पारित होने की खबर सुनने के बाद महात्मा गांधी द्वारा सरदार पटेल को लिखे गए पत्र में उनका दुख साफ झलकता है जिसमें भारत का दो राष्ट्रों के रूप में विभाजन करना परिकल्पित था। वे उस पत्र में लिखते हैं
“आज का समाचार बिल्कुल अविश्वसनीय है।जरा रायटर के तार को देखो।विधेयक में दो राष्ट्र होंगे। हम यहां पर जो बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं, तब उनका क्या मूल्य है? यदि यह आपके द्वारा सम्मत मामला नहीं है तो आप लोग इस अपराध को रोक सकते हैं।जब एक बार यह विधेयक पारित हो जाएगा तो कोई आपकी बात नहीं सुनेगा” २
 विभाजन पूर्व एवं विभाजन बाद दोनों देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति
विभाजन के पूर्व तथाकथित अपने ‘सपनों के पाकिस्तान’ की वकालत करते हुए मोहम्मद जिन्ना ने नवगठित पाकिस्तान में धार्मिक आजादी की बात कही थी लेकिन विभाजन के पूर्व चाहे वह बंगाल में प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस का हिंसक धार्मिक उन्माद हो या बाद में हिंदू एवं सिख अल्पसंख्यकों के साथ पाकिस्तान में की गई दुर्व्यवहार एवं उनके साथ हिंसा,बलात्कार एवं महिलाओं के उत्पीड़न की समस्या से हम सभी अवगत हैं और आज तक जिस प्रकार से हिंदू अल्पसंख्यकों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है। उनकी आबादी लगातार घट रही है यह दोयम दर्जे के मानव के रूप में उन्हें दिखाता है।
 वहीं भारत में राष्ट्र के निर्माता ने वास्तविक रूप में अल्पसंख्यकों के साथ समान व्यवहार किया चाहे वह भारतीय संविधान सभा में मौलिक अधिकारों में अल्पसंख्यकों के धार्मिक एवं सांस्कृतिक शैक्षणिक अधिकार देने की बात हो या बात हो राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में उनके साथ समानता, स्वतंत्रता एवं बंधुत्व की स्थापना के लिए किए गए सरकार के प्रयास हों।
सन 1947 में बड़े पैमाने पर एक जगह की आबादी दूसरी जगह जाने को मजबूर हुई थी। आबादी का यह स्थानांतरण आकस्मिक, अनुयोजित और त्रासदी से भरा था। मानव इतिहास के अब तक ज्ञात सबसे बड़े स्थानांतरणों में से यह एक था। धर्म के नाम पर एक समुदाय के लोगों ने दूसरे समुदाय के लोगों को बेरहमी से मारा‌। लाहौर,अमृतसर और कोलकाता जैसे शहर सांप्रदायिक अखाड़े में तब्दील हो गए जिन इलाकों में ज्यादातर हिंदू अथवा सिख आबादी थी उन इलाकों में मुसलमानों ने जाना छोड़ दिया । इसी तरह मुस्लिम बहुल आबादी वाले इलाकों से हिंदू और सिख भी नहीं गुजरते थे।
 विभाजन की विभीषिका को मार्मिकता से उकेरने वाले प्रसिद्ध लेखक मंटो की कहानी ‘कस्र-ए-नफ्सी’ का यह हिंदी रूपांतर देखिए
“दंगाइयों ने चलती ट्रेन को रोक लिया। गैर मज़हब के लोगों को खींच-खींच के निकाला और तलवार तथा गोली से मौत के घाट उतार दिया। बाकी यात्रियों को हलवा फल और दूध दिया गया। आयोजकों के मुखिया ने कहा “बहनों-भाइयों ट्रेन के आने की खबर देर से मिली। इसी कारण हम आपका स्वागत पुरजोर तरीके से नहीं कर सके-जैसा कि आप सब चाहते होंगे”।३
टी.आर भसीन द्वारा सरदार पटेल को लिखे गए पत्र में जिसमें रावलपिंडी की उस समय की तत्कालीन स्थिति के बारे में लिखा गया है
 “हमें अपना भविष्य अंधकारमय और निराशाजनक प्रतीत होता है हम दुविधा में हैं पाकिस्तान में “रहें अथवा न रहें’ हमारी दुविधा है। अल्पसंख्यकों के मन में घबराहट और अव्यवस्था व्याप्त है। लीग के नेताओं द्वारा जो कहा जाता है और जो किया जाता है उसमें स्पष्ट रूप से बहुत अंतर है।अन्य प्रांतों के प्रति के गैर-सहानुभूतिपूर्ण रवैया के बावजूद जिनकी स्वतंत्रता के लिए पंजाब को रक्त बहने के लिए छोड़ दिया गया है बिना किसी योजना के और बिना किसी सोच विचार के विस्थापन होना जारी है रक्तपात में कोई कमी नहीं हुई है और वह जारी है”।
राजनीतिक प्रभाव एवं कारक : क्या अनिवार्य ही था विभाजन या टाला जा सकता था ?
 अंग्रेजों से तकरीबन 200 वर्षों की पराधीनता के बाद जब भारत आजाद हुआ था तो किसने सोचा था, देखा था कि आजाद भारत इस तरह से रक्तरंजित आकार लेगा । स्वयं में धर्म के आधार पर इस तरह से हिंसा उपद्रव एवं रक्तपात मचाएंगे, प्रशासनिक मुश्किल और वित्तीय कठिनाई के अतिरिक्त विभाजन के साथ कुछ और ज्यादा गहरे मुद्दे जुड़े हुए थे।
 भारत के नेता ‘द्वि-राष्ट्र’ सिद्धांत में यकीन नहीं करते थे बहरहाल विभाजन तो धर्म के आधार पर ही हुआ था। बहरहाल क्या विभाजन को टाला जा सकता था या विभाजन अनिवार्य ही था ? इस पर भी अंबेडकर,जिन्ना, पटेल एवं हिंदू संप्रदायवादी अनेक नेताओं के बंटे हुए मत थे। गांधी,पटेल, सीमांत गांधी, अबुल कलाम नेहरू जैसे अनेक स्वाधीनता संग्राम से जुड़े हुए नेता तो विभाजन नहीं ही चाहते थे लेकिन बाद में ‘जब व्याधि सामने हो तो सिवा औषधि के क्या उपचार है? विभाजन को भड़काने में अंग्रेजों का तो हाथ था ही साथ ही दोनों तरफ के चरमपंथी नेताओं का भी कम हाथ नहीं था इन संघर्षों के साथ प्रतिस्पर्धी राजनीतिक हित भी जुड़े हुए थे। मुस्लिम लीग का गठन मुख्य रूप से औपनिवेशिक भारत में मुसलमान के हितों की रक्षा के लिए ही हुआ था। क्रिप्स मिशन से लेकर कैबिनेट मिशन एवं भारतीय संविधान निर्मात्री परिषद इन तीनों में अपनी बात को मनमानी तरीके से रखने में यह अग्रणी थे। मुस्लिम लीग मुसलमान के लिए अलग राष्ट्र की मांग करने की एतबार से ओतप्रोत था और अंततः इसमें वह सफल भी हुआ।
ठीक इसी तरह कुछ और भी संगठन थे जो भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए हिंदुओं को लामबंद करने की कोशिश में लगे थे। बहरहाल भारत की प्रजातंत्र की सरकार के अधिकतर नेता सभी नागरिकों को समान दर्जा देने के हामी थे और इसी कारण से भारत की संविधान की रूपरेखा पंथनिरपेक्ष रखी गई जिसमें सभी धर्मावलंबियों को समान अधिकार दिए गए।
निष्कर्ष : ‘भारत के विभाजन का सच’ सच में बहुआयामी दृष्टिकोण से जुड़कर चाहे वह सामाजिक,आर्थिक सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं धार्मिक उन्माद के रूप में प्रस्तुत हुई। जिसके युगांतरकारी परिणाम रहे इसने भारतीय उपमहाद्वीप की दशा एवं दिशा को बदल दी और आज तक पाकिस्तान में कट्टर चरमपंथी इस्लामी नेताओं के प्रभाव ,सेना के हस्तक्षेप एवं राजनीतिक नेतृत्व की अदूरदर्शिता के फलस्वरूप पश्चिमी देशों के बढ़ावे के कारण इन दोनों देशों के बीच पारस्परिक रिश्तों में कटुता एवं संवादहीनता जारी है। सीमा पार से कश्मीर में अशांति हेतु जहां एक तरफ पाकिस्तान आतंकवाद को प्रायोजित किया जाता है। वहीं भारत हमेशा शांति एवं कूटनीति के जरिए वर्षों से चले आ रहे भारत के अभिन्न अंग जम्मू-कश्मीर की समस्या को हल करने का प्रयास करता है।
भारत विभाजन की घटना कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। इसकी जड़ें प्रथम भारतीय स्वाधीनता संग्राम 1857 से एवं उसके पहले से चली आ रही है।जो वर्ष 1905 ईस्वी में बंगाल विभाजन जिसमें धर्म के आधार पर बंगाल को दो हिस्से में बांट दिया गया ताकि लोगों में राष्ट्रवाद की भावना न जाग सके, वर्ष 1909 ईस्वी में सांप्रदायिक आधार पर निर्वाचन पद्धति का गठन किया गया;जिसमें पृथक निर्वाचन का की व्यवस्था की गई।
उत्तरोत्तर अंग्रेजों की ‘फूट डालो शासन करो’ कि पक्षपापूर्ण नीति के कारण से खासकर मुस्लिम समुदाय में एक मनोवैज्ञानिक रूप से भय एवं विश्वासघात का आभास कराया गया ।मुस्लिम लीग जो कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ परस्पर सद्भाव के साथ भारतीय स्वाधीनता प्राप्ति में लगी था वह अब एक विपरीत एवं नकारात्मक दिशा में अलग राष्ट्र की मांग करने हेतु आगे बढ़ने लगा। मोहम्मद इकबाल जो कि ‘सारे जहां से अच्छा हिंदुस्ता हमारा’ के तराने गा रहे थे अब वही पाकिस्तान के हिमायत करने लगे थे और सांप्रदायिकतावादी जिन्ना के नेतृत्व में आगे बढ़कर हिंसा एवं अलगाव को खुले मंच से प्रेषित कर रहे थे। जिसकी परिणति कट्टर इस्लामी राष्ट्र पाकिस्तान के रूप में हुई।
समग्रत: यह कहा जा सकता है कि अतीत में जो भी घटनाएं हुई उससे हम सीख लेते हुए हर दौर में विवाद का अंतिम समाधान पारस्परिक संवाद के माध्यम से ही निकाला जा सकता है।अभी वर्तमान में भी यदा-कदा भारत के विभिन्न भागों से अलगाववादी इस तरह की आवाज़ निकलती हैं तो हमें उनका समाधान एक संवेदनशील एवं समग्र तरीके से करने की परम आवश्यकता है; क्योंकि जमीन पर खींची गई लकीरें सिर्फ दो भूभाग का बंटवारा नहीं करती हैं यह मानवीय संपदा एवं मानव के विस्तृत इतिहास को बांट कर रख देती है जो कभी भी नैसर्गिक नहीं होती।
संदर्भ सूची (संदर्भ ग्रंथ)
1.‘गांधी पटेल’ पत्र और भाषण , सहमति के बीच असहमति, संकलन- नीरजा सिंह,अनुवाद- बिचार दास सुमन (राष्ट्रीय पुस्तक न्यास(नेशनल बुक ट्रस्ट), भारत) १,२,३
2. स्वतंत्र भारत में राजनीति (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT)कक्षा 12 के लिए राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तक)
3. सरदार पटेल द्वारा 2 जनवरी 1947 को शिलांग में दिया गया भाषण का अंश १(नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया)
4. 23 जून 1947 को भारतीय स्वतंत्रता विधेयक के बारे में पटेल को गांधी जी का पत्र जिसमें दो राष्ट्रों के रूप में विभाजन परिकल्पित करना सम्मिलित था। २
5. टी.आर भसीन द्वारा जुलाई 1947 में रावलपिंडी से सरदार पटेल को अल्पसंख्यकों की वस्तुस्थिति को दर्शाते हुए लिखा गया पत्र ३
6.Talbot, Ian, and Singh, Gurharpal. The Partition of India. Cambridge University Press, 2009.
7.Butalia, Urvashi. The Other Side of Silence: Voices from the Partition of India. Penguin Books, 1998.
8.हिंदुस्तान, जनसत्ता, आज सहित विभिन्न पत्र पत्रिकाएं

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