दक्षिण एशियाई देशों में क्यों असफल है लोकतंत्र: क्या है सत्ता परिवर्तन का यह तियापांचा

कहा जाता है की कुर्सी में वह ताकत होती है जो अच्छे-अच्छे को एक कुटिल एवं धूर्त शासक के रूप में बदल देता है। यूरोप,अफ्रीका, मध्य-पूर्व से लेकर अफ्रीका, एशिया तक इसके उदाहरण भरे पड़े हैं। आखिर क्या है इस कुर्सी में जो मिलने के पहले इसके विरुद्ध में जनता के मुद्दों को उठाकर गरीबी, भ्रष्टाचार पर बात करता है लेकिन पद पर पहुंचने के बाद ही सीधे उनके खिलाफ हो जाता है, वह  चाहे कम्युनिस्ट सरकार हो या पूंजीवादी दक्षिणपंथ सरकार..
अफगानिस्तान,श्रीलंका, बांग्लादेश के बाद अब नेपाल में भी कथित भ्रष्टाचार, कुशासन, नेताओं की फिजूलखर्ची, भाई-भतीजावाद से त्रस्त युवा और बदहाल जनता ने ओली सरकार को उखाड़ फेंका‌। 
विभिन्न मीडिया रिपोर्ट की मानें तो प्रथम दृष्टया इस उग्र हिंसक प्रदर्शन( जो कि पूर्व में शांतिपूर्ण तरीके से किया गया हालांकि सेना द्वारा कार्यवाही के बाद यह हिसंक प्रदर्शन का रुप ले लिया 'जेन जी 'द्वारा आयोजित  इस हिंसक प्रदर्शन में दो दर्जन युवाओं को जान से हाथ धोना पड़ा) जो कि सरकार द्वारा लगाए गए विभिन्न सोशल मीडिया मंचों के विनियमन बैन के विरुद्ध हुआ ! देखते -देखते धधकते नेपाल में  इस्तीफे बरसने लगे।
गृहमंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति से लेकर तमाम मंत्री परिषद को इस्तीफा देना पड़ा, सिंह दरबार में आगजनी हुई, सरकारी कार्यालयों में बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ भी हुई। सड़कों पर अफरातफरी और कर्फ्यू के बाद सेना द्वारा शांति एवं संवाद के आह्वान भी हुए लेकिन तब तक बहुत कुछ घटित हो चुका था !
हालांकि एशियायी मामले के विशेषज्ञों की मानें तो इसकी मूल जड़ें नेपाली कम्युनिस्ट सरकार की अराजक, भ्रष्ट शासन और दो-तीन परिवारों के बीच सत्ता की बागडोर को इधर-उधर करते हुए शासन में बने रहकर पद के दुरुपयोग, भाई-भतीजावाद की राजनीति में निहित है। 
वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इसे अमेरिका जैसे देशों की डिप-स्टेट समर्थित विदेशी प्रभाव से जोड़कर देख रहे हैं। वे इस बात पर बल देते हैं की दक्षिण एशियाई देशों में भी अमरीका की मध्य -पूर्व ,अफ्रीका की तरह ही अपने मातहत पिट्ठुओं को गद्दी पर बैठाकर अपना हित साधना की नीति है,जिसे पूरी तरह ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता ‌। 
हम अफगानिस्तान, म्यांमार, श्रीलंका, बांग्लादेश में सत्तासीन सरकार के तख्तापलट से इसकी भूमिका को भी इंकार नहीं कर सकते! 
कारण जो भी रहें हों; भारत के लिए यह मामला अत्यंत संवेदनशील है। दक्षिण एशियाई देशों की बात करें तो भारत के आस-पड़ोस के सभी देशों में लोकतंत्र जब-जब पनपता है, पद केे दुरुपयोग, विदेश नीति की विफलता आदि- आदि कारणों से सरकारें अस्थिरहो जाती हैं । फल स्ववरूप उन्हें गद्दी छोड़़नी पड़ती है, वह भी धकिया के! लतिया के!
पड़ोसी पाकिस्तान की बात करें जिसमें नागरिक सरकार के पीछे इस्लामी कट्टरपंथ सहित सेना का पूरा नियंत्रण रहता है, म्यांमार में भी। आंग-सांग- सूकी की सरकार कोबेदखल कर अब वहां जुंटो की सैनिक शासन है , बांग्लादेश में हसीना सरकार के तख्तापलट के बाद यूनुस सरकार में भी अल्पसंख्यकों सहित अवामी लीग के नेताओं की स्थिति चिंताजनक है ‌।
श्रीलंका में भी 2022 के तख्तापलट के बाद की स्थिति  खस्ताहाल है, म्यांमार में भी भारत विरोधी नारे लगे लेकिन बाद में स्थितियां कुछ बेहतर हुईं । अफगानिस्तान मेंं अमेरिकी सैनिकों की वापसी,गनी सरकार गिरने के बाद तालिबान वालााशान पुन: लौट चुका है।
 इस तरह से देखा जाए तो भारत के आसपास हर पड़ोसी देशों में लोकतंत्र कभी भी एक वयस्क  अवस्था को प्राप्त नहीं कर पाया है या तो पर्दे के पीछे या सीधे सामने आकर तत्कालीन अमरीका ,अब चीन जैसे विस्तारवादी शक्तियों ने सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करनी चाही और पहले से भी बदतर स्थिति में उसे देश को पहुंचाने का काम किया है।
 ऐसे में भारत अन्य देशों के लिए एक नज़ीर के रूप में है जहां लोकतंत्र का प्रयोग अंशत: सफल है; हालांकि यहां भी सरकारी स्तर पर भ्रष्टाचार नौकरशाहों की लालफीताशाही आम व्यक्ति एवं अमीर व्यक्तियों के बीच संसाधनों का असमान वितरण जैसे कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो देश की राजनीति को प्रभावित करते हैं ।
लेकिन  भारतीय संविधान के व्यापक संरचना, मूल संरचना स्पष्ट व्याख्या के कारण कार्यपालिका, विधायिका एवं न्यायपालिका में स्पष्ट अंतर है जो नियंत्रण एवं संतुलन की स्थिति को स्थापित करता है ।लोकतंत्र में  इसकी मजबूती एवं लचीलापन के लिए सकारात्मक सरकार के लिए आवश्यक भी है। वहीं अन्य देशों की बात करें तो अन्य शक्तियों एक दूसरे पर हावी रहती हैं जिसके कारण से उनका नियंत्रण एवं संतुलन स्थापित नहीं होता है ।जिसके फलस्स्ववरूप समय पर कभी नागरिक तो कभी सैन्य दखलअंदाजी इसमें बढ़ती है जिससे जनता त्रस्त तो रहती ही है अगले सरकार में जिस उम्मीद के साथ वहां आंदोलनरत रहती है उससे भी बढ़कर  बदतर व्यवस्था झेलने को मिलता है। 
ऐसे में देखना यह है कि भारत किस प्रकार से अपनी स्थिति को सुदृढ़ करते हुए अपने आसपास में चल रही इन घटनाओं का समाधान करता है और कूटनीतिक स्तर पर किस प्रकार अपने आप को एक सच्चे लोकतंत्र के रूप में स्थापित करते हुए जरूरी सबक लेता है। नेपाल की घरेलू राजनीति में आए इस शून्यता को पूर्ति कर उभरने वाले शासक पर भारत के संबंध बहुत हद तक निर्भर करेंगे। आंतरिक राजनीति के साथ कूटनीतिक का स्तर पर भी भारत के लिए सतर्कता आवश्यक है चूंकि अगर आपके घर के आसपास( घर ) में आग लगी हो  तो आप चैन से नहीं सो सकते! 
पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी के शब्दों में कहें तो  
"आप दोस्त बदल सकते हैं , पड़ोसी नहीं!"

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