टूटते भरोसे, छूटते मूल्य: राजनीति एवं पत्रकारिता के हवाले से
आज के समय में जब भरोसे का कोई कोना भी आपके साथ न रहा तो ऐसे में राजनीति और पत्रकारिता से क्या ही अपेक्षा की जा सकती है?
हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में जिस बेबाकी से लल्लनटॉप और सौरभ द्विवेदी एक दूसरे के पर्याय बन चुके थे जिन पर निष्पक्षता से समझौता कर खबर चलाने के आरोप लग रहे हैं।इससे आज वह स्तंभ भी टूटता हुआ दिखाई दे रहा है।
कुर्सी में न जाने ऐसी कौन सी चुंबकीय शक्ति है कि जो उसके पास जाता है अपने मूल्यों को ताख पर रखकर से समझौता कर अपने मूल कर्तव्यों को भूल जाताहै। यही कारण है कि ऐसे कई बड़े नाम जिसमें दिव्यांशी सुमराव, निखिल बिष्ट, अभिनव पांडे तक कई बड़े-बड़े नाम जो डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में एक स्थान बना चुके थे लल्लनटॉप से बाहर होकर अपनी नई पहल प्रारंभ कर दी और कुछ हद तक उस स्वायत्तता एवं निष्पक्षता को जिंदा रखा है। कारण चाहे कुछ भी रहा हो लेकिन प्रश्न तो उठते ही हैं?
इस घटना से हमें यह सीख भी मिलती है कि भले ही हमारा प्रारंभ शानदार हो लेकिन हम अगर मूल्य पर टिकें न हों तो अक्सर हम अपने उद्देश्यों को भूल जाते हैं। इसी प्रकार से राजनीति में जिस शुचिता एवं कर्तव्य निष्ठा से जोड़कर सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का नाम लिया जाता है।कथित इथेनॉल संबंधी घोटाले से उनकी छवि भी धूमिल होता प्रतीत होताहै। आखिर कैसे उनके सुपुत्र के कंपनी का शेयर और लाभांश अभूतपूर्व तरह से बढ़ता है। सवाल तो पूछा ही जाएगा?
आज के समय में पत्रकारिता एवं राजनीति के ये दोनों उदाहरण सिर्फ आलोचना के लिए हमारे सामने उपस्थित नहीं हैं। अपितु हमसे कुछ जरूरी सवाल करते हैं। जिसमें एक तरफ टूटते हुए मूल्य और भरोसे की कोई कोना जब न रह जाए तो क्या उस स्थिति में भी हम खुद को बचाए रख सकते हैं ? आगे आने वाला समय कितना चुनौती पूर्ण होने वाला है, सत्तावादी एवं पूंजीवादी शक्तियां कितना हावी होने वाली हैं और आम जनजीवन और धनाढ्य एवं संपन्न वर्ग के जनजीवन में कितना अंतर होने वाला है ? क्या इस खाई को हम कुछ हद तक पाट सकते हैं ? क्या हम अपने कर्तव्यों से समझौता करेंगे या अपने मूल्यों से? या इनके बीच सामंजस्य बैठाएंगे?
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