डॉ. राजेंद्र प्रसाद: गांधीवादी निष्ठा और व्यावहारिक राजनीति के बीच वैचारिक स्थिति”


“डॉ. राजेंद्र प्रसाद: गांधीवादी निष्ठा और व्यावहारिक राजनीति के बीच वैचारिक स्थिति”
प्रस्तावना - महान स्वतंत्रता सेनानी, प्रखर चिंतक, कुशल नेतृत्वकर्ता, प्रख्यात विधिवेत्ता, महात्मा गांधी के सच्चे अनुयायी,धुन के पक्के लग्न के सच्चे संगठनकर्ता , भारतीय संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष, स्वतंत्र भारत के प्रथम खाद्य एवं कृषि मंत्री,भारतीय गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति,भारत माता के सच्चे सपूत देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद को अनगिनत विशेषणों से विभूषित करने पर भी उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। स्वतंत्र भारत की पहली हिंदी आत्मकथा, मेरी आत्मकथा में डॉ. राजेंद्र बाबू ने अपने जीवन के तमाम पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की है। उनकी आत्मकथा “राजेंद्र प्रसाद: आत्मकथा” और उनके लेखन जैसे “भारत का संविधान और लोकतंत्र” इस दृष्टिकोण को समझने के लिए महत्वपूर्ण स्रोत हैं। उनके संपूर्ण जीवन दर्शन से समझा जा सकता है कि जो व्यक्ति वास्तविक अर्थों में जितना बड़ा होते जाता है वह उतना सरल होते जाता है।
“सादा जीवन, उच्च विचार
यही है राजेंद्र बाबू के जीवन का आधार
सत्य, अहिंसा,सदाचार
 शुचिता, कर्तव्यनिष्ठा के साक्षात अवतार”
 भारतीय सनातन ज्ञान परंपरा में सच ही कहा गया है ‘विद्या ददाति विनयम्’ अर्थात विद्या हमें विनम्रता प्रदान करती है। बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी राजेंद्र बाबू नम्रता और सादगी के अवतार थे। वे गांधीवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कर्मठ नेता थे तो दूसरी और व्यावहारिक राजनीति के मंझे हुए शिल्पकार ; और इसी का सुफल परिणाम रहा कि ‘भारतीय संविधान’ जो विश्व का सबसे वृहत्तम लिखित संविधान है, को बनाने में संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में पक्ष-प्रतिपक्ष के मत-मतांतरों को समान अवसर एवं जगह देते हुए एक अंपायर की भांति अपनी भूमिका निर्वहन करते हैं जो अपने आप में कितना चुनौती पूर्ण काम है और इसे राजेंद्र बाबू ने बखूबी के साथ निभाया। उन्होंने विभिन्न विषयों पर चर्चा परिचर्चा करके अभिव्यक्ति की न सिर्फ रक्षा की है अपितु उसे जीवंत दस्तावेज़ के रुप में आकार प्रदान किया है और आजाद भारत में राष्ट्रपति पद की गरिमा एवं शुचिता को बरकरार रखते हुए अपने कर्तव्यों का निर्वाह किया है। सच्चे अर्थों में उन्होंने गांधीवादी निष्ठा और व्यावहारिक राजनीति के बीच वैचारिक स्थिति को सुदृढ़ किया है।
1. गांधीवादी निष्ठा: आदर्श और जीवन दर्शन
डॉ. राजेंद्र प्रसाद के जीवन और विचारों में गांधीवादी निष्ठा सबसे पहले सामने आती है। उन्होंने महात्मा गांधी के सत्याग्रह, अहिंसा और सामाजिक सुधार के सिद्धांतों को न केवल अपने राजनीतिक जीवन में अपनाया, बल्कि व्यक्तिगत जीवन में भी उन्हें जीवित रखा। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्होंने असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भाग लिया, पुलिस की लाठियां खाई,जेल गए और इस तरह संपूर्ण जीवन को राष्ट्र के प्रति होम कर दिया।
उन्होंने अपनी आत्मकथा में स्पष्ट रूप से लिखा है कि ‘गांधी के मार्गदर्शन ने उन्हें नैतिकता और सत्य के मार्ग पर स्थिर रखा’।उनके लिए राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता या पद प्राप्त करना नहीं था; उनका मानना था कि नेतृत्व का वास्तविक मूल्य सत्य, न्याय और नैतिकता के पालन में है। इस आदर्शवादी दृष्टिकोण ने उनके कार्यों में हमेशा स्पष्ट रूप से झलक देखा।
चंपारण सत्याग्रह के दौरान महात्मा गांधी के करिश्माई नेतृत्व से प्रभावित हुए और आजीवन उनके अनुयायी के रूप में देश सेवा में कर्त्तव्यशील रहे।
उनके शब्दों में कहें
 “जो चीज सिद्धांतों में गलत है, वह व्यवहार में सही कैसे हो सकता है”
इसका पालन करते हुए उन्होंने हमेशा स्वयं को सेवा भाव से देश के प्रति समर्पित कर दिया। उनकी प्रखर प्रतिभा के किस्से अनेक जगह प्रचलित हैं,चाहे वह हाई स्कूल से लेकर कलकत्ता विश्वविद्यालय में उच्चतम स्थान प्राप्त करना हो या विधिवेत्ता के रूप में दलीलें प्रस्तुत कर स्वाधीनता सेनानियों को अंग्रेजों के काले कानून से मुक्ति दिलाना हो। हमेशा उन्होंने गांधीवादी मूल्यों का अनुसरण करते हुए कर्तव्य पथ पर अग्रसर रहे। भारतीय कृषि, उद्योग एवं व्यापार की गतिहीनता अंग्रेजों की बर्बर एवं अत्याचारी शासन से त्रस्त भारतीय जनता के प्रति वे बचपन से ही करुणाशील थे और अंग्रेजों के प्रति विद्रोह की ज्वाला विद्यार्थी जीवन से ही भड़क रही थी, गांधी की एक मुलाकात ने इसे रचनात्मक मोड़ दिया और उन्होंने स्वयं को जन सेवा के प्रति मोड़ दिया।
2. भारतीय स्वाधीनता संग्राम में साध्य एवं साधन की प्रासंगिकता का सच्चे अर्थों में अनुसरण
सर्वविदित है राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने साध्य एवं साधन की प्रासंगिकता की ओर ध्यान आकृष्ट किया था। उन्होंने कहा था कि साध्य को प्राप्त करने के लिए हम संकल्पित हैं, उसके लिए हमारा साधन भी उपयुक्त होना चाहिए तभी हम सच्चे अर्थों में एक न्यासी के भांति जीवन जी पाएंगे। उनके लिए भारत की आज़ादी अगर साधन थी तो सच्चे अर्थों में स्वराज की प्रति उनके लिए साध्य ; और बिल्कुल इसी का अनुसरण करते हुए डॉ राजेंद्र प्रसाद ने चंपारण सत्याग्रह से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन एवं उसके बाद संविधान निर्माण के साथ-साथ स्वतंत्र भारत में गांधी जी की विचारधारा को जीवंत रखने में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के साथ देश रत्न डॉ.राजेंद्र प्रसाद का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है उन्होंने गांधी जी के रचनात्मक कार्यों चरखा कातना ,खादी का प्रचार करना, मद्य निषेध करना, अस्पृश्यता निवारण, हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ाना। इन सभी चीजों को आज़ादी के आंदोलन के दौरान से ही करते आ रहे थे और इसी दौरान कई बार जेल भी गए लेकिन उसके बाद जब पद पर आसीन हुए तो इस चीज का हमेशा ख्याल रखा की कभी भी अपने मूल्य का त्याग ना करें अपनी कर्तव्य निष्ठा एवं पद की गरिमा को बनाए रखें।
3.व्यावहारिक राजनीति में संतुलन
हालांकि डॉ. राजेंद्र प्रसाद गांधीवादी आदर्शों के प्रति अडिग थे, उन्होंने यह भी समझा कि राजनीति में केवल आदर्श ही पर्याप्त नहीं हैं। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कांग्रेस के भीतर विभिन्न मतभेद और रणनीतिक फैसले सामने आए। ऐसे समय में उन्होंने सहनशीलता, तर्क और विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया।
उदाहरण के तौर पर, संविधान सभा में उनके योगदान ने यह स्पष्ट किया कि आदर्शवादी दृष्टिकोण के साथ व्यावहारिक राजनीति की समझ भी जरूरी है। राष्ट्रपति के रूप में उनका दृष्टिकोण और निर्णय लेने की शैली स्पष्ट रूप से यह दिखाती है कि वे परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने में निपुण थे, लेकिन कभी भी सत्य और नैतिकता से समझौता नहीं किया। उनके व्यावहारिक दृष्टिकोण ने यह सिद्ध किया कि सिद्धांत और व्यवहार विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। संविधान सभा के कार्यवाही के दौरान व्यापक चर्चा -परिचर्चा वाद विवाद के दौरान कई बार गतिरोध के बीच मध्य मार्ग का अनुसरण करना हो या सभी व्यक्तियों को अपनी बात रखने की इजाजत देनी हो यह आज के पीठासीन सभापतियों को सीखने की जरूरत है। जिसमें एक कुशलतापूर्वक लोकतांत्रिक नियम-कानून का पालन करते हुए सच्चे अर्थों में अभिव्यक्ति की आजादी को बरकरार रखा जा सकता है।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद के लिए यह संतुलन इतना महत्वपूर्ण था कि उन्होंने राजनीतिक संघर्षों और दबावों के बावजूद अपने आदर्शों को बनाए रखा। उनका मानना था कि नेता को यथार्थवादी होना चाहिए, लेकिन उसे नैतिकता और न्याय की भावना को कभी भी नहीं छोड़ना चाहिए। यही संतुलन उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाता है।
4.लोकतांत्रिक मूल्यों और गांधीवाद का समन्वय
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का दृष्टिकोण यह स्पष्ट करता है कि गांधीवादी मूल्य और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ एक साथ चल सकती हैं। उनकी रचना “भारत का संविधान और लोकतंत्र” में उन्होंने लिखा है कि लोकतंत्र में निर्णय लेते समय सत्य, न्याय और नैतिकता का पालन अत्यंत आवश्यक है। इसके साथ ही, राजनीतिक यथार्थ को ध्यान में रखकर निर्णय लेने की क्षमता भी जरूरी है।
उनके लिए लोकतंत्र केवल कानून का पालन नहीं था, बल्कि सामाजिक न्याय और नैतिक जिम्मेदारी का माध्यम भी था। राष्ट्रपति के रूप में उनके व्यवहार ने यह दिखाया कि गांधीवादी आदर्शों का पालन करते हुए भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुचारू रूप से लागू किया जा सकता है। उनका यह दृष्टिकोण आज भी यह सिखाता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और नैतिक नेतृत्व दोनों को संतुलित रखना आवश्यक है।
5. नैतिकता और राजनीतिक निर्णय
डॉ. राजेंद्र प्रसाद की वैचारिक स्थिति में नैतिकता और राजनीतिक निर्णयों का संतुलन सबसे महत्वपूर्ण पहलू था। उन्होंने समझा कि एक नेता को यथार्थवादी होना चाहिए, लेकिन नैतिक मूल्यों से समझौता नहीं करना चाहिए। उनकी आत्मकथा और राजनीतिक जीवन की घटनाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि उन्होंने कई अवसरों पर व्यक्तिगत लाभ या राजनीतिक दबाव को नज़रअंदाज़ कर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा। कई बार उनके गांव घर से सिफारिशें आती थी वे इसे सिरे से नकारते हुए विनम्रता पूर्वक जवाब देते थे। वह संपूर्ण देश को अपना परिवार मानते थे और इसी का परिणाम रहा की अपनी संपूर्ण राष्ट्रपतित्व काल के बाद पटना के सदाकत आश्रम में रहने लगे। जिस सादगी एवं सरलता का उन्होंने परिचय दिया है वह वास्तव में आज की भारतीय राजनीति की गतिहीनता पर एक सबक भी है, और संदेश भी‌।
उदाहरण के लिए, स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई कठिन निर्णयों में उन्होंने गांधीवादी विचारों को अपनाया और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की बजाय राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी। यही कारण है कि उन्हें गांधीवादी आदर्शों और व्यावहारिक राजनीतिक समझ के बीच संतुलन का प्रतीक माना गया।
6. स्वतंत्रता संग्राम के अनुभव और संघर्ष
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान अत्यंत उल्लेखनीय है। वे बिहार के एक प्रतिष्ठित नेता थे और कांग्रेस के सक्रिय सदस्य के रूप में उन्होंने ग्रामीण और शहरी दोनों स्तरों पर आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने किसानों और ग्रामीण जनता को संगठित किया और गांधी के सत्याग्रह आंदोलनों में उनके मार्गदर्शन में भाग लिया।उनकी आत्मकथा में उन्होंने अपने संघर्षों का विवरण देते हुए लिखा है कि कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने नैतिकता और धैर्य बनाए रखा। उनके दृष्टिकोण में संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि यह सामाजिक न्याय, शिक्षा और नैतिक सुधार का माध्यम भी था।
निष्कर्ष: आदर्श और यथार्थ का संगम
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जीवन यह प्रमाणित करता है कि गांधीवादी निष्ठा और व्यावहारिक राजनीति का संतुलन संभव है। उनके आदर्श उन्हें सत्य और अहिंसा के मार्ग पर स्थिर रखते थे, जबकि व्यावहारिक दृष्टिकोण उन्हें राजनीतिक परिस्थितियों का सामना करने और राष्ट्रहित में निर्णय लेने में सक्षम बनाता था। उनके जीवन और कार्य से यह शिक्षा मिलती है कि राजनीति में नैतिकता और व्यावहारिकता का संतुलन अत्यंत आवश्यक है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद न केवल स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने, बल्कि भारतीय राजनीति और नैतिक नेतृत्व के महान आदर्शों के प्रतीक भी बने। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अपनी आत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ में राजेंद्र बाबू के बारे में लिखते हैं कि “वे एक ऐसे सच्चे देश सेवक थे जिन्होंने चंपारण सत्याग्रह के बाद अनेक ऐसे अवसरों पर रचनात्मक कार्यक्रमों को सफल करने में अपनी प्रमुख भूमिका निभाई”
उनके जीवन से आज भी यह शिक्षा मिलती है कि नेतृत्व केवल सत्ता नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, अहिंसा और समाज सेवा का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। यही कारण है कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद का योगदान भारतीय इतिहास में अमूल्य और प्रेरणादायक है। वास्तव में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने आज़ादी के पहले, आजादी के बाद एवं भारतीय संविधान के निर्माण के दौरान जिस प्रकार से अपनी भूमिका निभाई है। वे सच्चे अर्थों में गांधीवादी मूल्यों के साथ-साथ उनकी अपनी रचनात्मक विचारधारा एवं वैचारिक स्थिति के बीच सामंजस्य स्थापित करते हुए, स्पष्ट करते हैं कि भारत की बहुलता आबादी संस्कृति एवं सर्व समावेशी पद्धति को आत्मसात करते हुए सादगी के साथ अपने कर्तव्यों को पूरा किया जा सकता है। उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व से भारत भूमि सदैव सकारात्मक ऊर्जा से प्रेरित रहेगा।
संदर्भ सूची
1. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद – मेरी आत्मकथा – 1946
2. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद – बापू के चरणों में – 1955
3. डॉ. बी. पट्टाभि सीतारमैया – डॉ. राजेन्द्र प्रसाद : एक जीवनी – 1962
4. Publication Division (Govt. Of India) – भारत के प्रथम राष्ट्रपति : डॉ. राजेन्द्र प्रसाद – 1964
5. संविधान सभा सचिवालय – Constituent Assembly Debates (Vol. XI) – 1950
6. सत्य के साथ मेरे प्रयोग- महात्मा गांधी

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